Wednesday, 14 January 2026

लहर - लहर - सम्पूर्ण पुस्तक

 

 

  ✣ ऐसे पूज्य गुरुदेव स्वर्गीय श्री मदनलाल जी वर्मा को

                    यह कृति समर्पित करता हूँ


लहर - लहर







अर्घ्य

कहते हैं सागर की छोटी छोटी लहरें मिल कर बड़ी लहर बनाती है। ये लहरें सागर का अभिन्न अंग है। लहरें उत्साह, गति, विचलन, प्रचलन के माध्यम से मनुष्य जीवन का प्रतीक बन जाती हैं। वे जन्म लेती हैं जीती हैं, उछलती - कूदती हैं, अवसाद - प्रतिसाद में पड़ती हैं, थपेड़े सहती है और फिर मर जाती हैं। ये छोटी छोटी लहरें कुछ देर जी कर बहुत कुछ कह जाती है। इसी चिन्तन से मेरे अन्तस में उभरे इन लहरों के स्वरों में मैंने जो सुना उसे लिखने का प्रयास यहाँ किया है। हर कथ्य के अन्त में उसका निहित उद्देश्य है। इसमें पचास नन्हीं नन्हीं लहरें नव शाविकाएँ हैं। मेरा यह एक प्रयोगात्मक प्रयास है।

मुझे याद आती है सुमित्रानंदन पंत की रचना 'सागर की लहर लहर'। वे कहते हैं

"सागर की लहर लहर में

है हास स्वर्ण किरणों का,

सागर के अंतस्तन में

अवसाद अवाक् कणों का।

यह जीवन का है सागर,

जग-जीवन का है सागर,

प्रिय-प्रिय विषाद रे इसका

प्रिय प्रिय आह्लाद रे इसका।

उक्त पंक्तियाँ मेरी प्रस्तुत कृति "लहर-लहर" में प्रतिबिम्बित है। वस्तुतः झरझराता झरना, झक्क सफेद बर्फ, रंगीन पुष्प, वृक्षों को आलिंगन करती लताएँ, भंवरें की गुन गुनाती गुंजन, प्रभात में खिली उषा की स्वर्णिम किरण, शीतल मन्द सुगन्धित बहती पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब संक्षिप्त से इन लघु आलेखों में अनायास ही आ गये हैं। प्रकृति के इन उपादानों के संग जीवन-सागर और जग-जीवन के भीतर सुख-दुःख की छाया में उभरता पलता तरल जीवन आप इन छोटी छोटी लहरों के साथ तरंगित महसूस करेंगे।

उपनिषदों के अनुसार इस सम्पूर्ण प्रकृति में ईश्वर की सर्वव्यापकता के स्पष्ट संकेत है। जिस प्रकार पुष्पों में सुगन्ध, दूध में घृत, तिल के दानों में तेल छिपा रहता है, उसका प्रत्यक्ष दर्शन तो  नही होता किन्तु उसके स्वरुप की अनुभूति अवश्य होती है, ठीक उसी प्रकार प्रकृति के कण-कण में ईश्वर की शक्तियाँ समायी रहती है। अर्थात् "यह सम्पूर्ण विश्व और प्रकृति ईश्वर की ही अभिव्यक्ति है।" वह इसी में व्याप्त है। देश, काल और प्रकृति आदि परमात्मा के बनाये ही आवरण है।

वस्तुतः प्रकृति को उसके नैसर्गिक स्वरूप के साथ आध्यात्मिक स्वरूप का विमर्श देखा जावे तो वह समग्र रूप से विशुद्ध भारतीय जीवन दर्शन प्रस्तुत करता है। इसलिये सागर की इन छोटी छोटी लहरों के साथ हमारे जीवन की लहरों का तादात्म स्थापित कर के देखें कि वे अपने आचरण और व्यवहार से जीवन के कुछ महीन सूत्र कह जाती हैं। इस छोटे से कटोरे में इन चंचल सी लहरों का उपादान अपने प्रिय पाठकों को सादर सस्नेह समर्पित है।

रामनारायण सोनी


अनुक्रम

लहर-लहर खण्ड

1

अद्वैताभास

2

प्रथम गुरू का प्रथम आशीष

3

भरोसे का भरोसा

4

प्यार की पुण्यगन्ध

5

जिस्म और रूह

6

बड़े से बड़ा

7

उस 'कौन' को जानें

8

मैं समुन्दर हूँ। 

9

तान दो मस्तूल

10

वर्तमान चल रहा है'

11

खुद के संग जरूर रहना

12

अन्तःकरण से जुड़े लोग।

13

मन का बोझ

14

कोई आ जाता है कहीं से

15

बहारें फिर भी आएँगी

16

अनुमान, अनुभव और संभावनाएँ

17

नन्ही की पगडण्डी

18

मैं बस मैं ही हूँ

19

जिन्दगी तेरी मेरी कहानी

20

विकास, वैभव और विकार

21

अपना हाथ जगन्नाथ

22

यही एक पल है

23

जीवन के अभीष्ट

24

क्या और कितना जरूरी है?

25

"प्रेम पूर्णता ही में है"

26

मन की शक्ति और संकल्प

27

मन में लगी फाँस

28

जीवन सवाँरें 

29

मेरा परिवार समग्र है

30

मुझे खुशी है

31

जरा अपनी भी सुनो

32

बाहर भीतर का रूपान्तरण'

33

बड़ा बनना आसान नहीं

34

प्रेम अद्वैत की उपासना है

35

भरोसा भारी है

36

परमात्मा का अनुशीलन

37

प्रार्थना के स्वर

38

जिन्दगी तुम से पूछेगी

39

बीच में खड़े रहना सीख लो

40

आईना देखो तो सही

41

चुनाव तुम्हें करना है

42

सिद्धार्थ से बुद्ध तक

43

सभी आईना पहन लें

44

प्रकृति रंगों ख़ज़ाना है

45

जड़ में चेतन का आविर्भाव

46

हार-जीत, जीत-हार

47

"गुनगुनाहट"

48

आपके मालिक आप हैं

49

अपना अपना क्षितिज

50

जीवन चलने का नाम

51

डर और उसका निवारण

52

जाफरी वाली शाला का पहला दिन

53

जरूरी क्या है?

54

अभी में जियें

55

एक नदी बहता जीवन

56

आत्मानुसन्धान

57

हमारे आँगन मे

58

तरंगें (प्रथम)

59

तरंगें (द्वितीय)

60

तरंगें (तृतीय)

च्यवनिका  खण्ड

61

हिन्दी  शब्दकोश में ‘च्यवन’

62

वे प्रश्न जागरण के

63

च्यवनिकाएँ

64

गुरूसत्ता

65

बूँद-बूँद बूँद

66

कौन है जो क्षितिज के पार गया है?

67

नदिया चले चले है धारा!

68

दर्पण का साक्षीभाव

69

मन हारा तो सब हारा

70

मौन व्रती


1

अद्वैताभास

सागर शान्त था, बल्कि कहें कि सागर प्रशान्त था। सतह को छूती हुई तेज हवा चली और एक लहर खड़ी हो गई, यह लहर चल भी पड़ी क्योंकि अगर खड़ी रह गई तो लहर तुरन्त मर भी जाएगी। लहर के खड़े होते ही एक अहंकार खड़ा हो गया कि मैं लहर हूँ। लहर कहती है कि मैं सागर नहीं हूँ , पानी नहीं हूँ और उसका अहंकार उसे यह मानने नहीं देता कि वह असल में पानी है। अहंकार खड़ा होते ही  रिश्ते  खड़े हो गये। रिश्ता सागर से,  दूसरी लहर से, रिश्ता बहते हुए पवन से, रिश्ता गति से, रिश्ता अपनी स्थिति से। और भी कई जाने अनजाने बेनामी रिश्ते खड़े हो गये लहर के चारों ओर। रिश्ते की इस भीड़ में उसे अपनी एक पहिचान याद नहीं रही कि लहर केवल एक अनित्य आकार है। असल में वह पानी ही है और लहर में से लहर हटा ली तो जो बचेगा वह पानी ही होगा। लेकिन लहर में से पानी हटा लिया तो कुछ भी नहीं बचेगा। पास खड़ी लहर भी पानी है, सागर भी पानी है सब ओर पानी ही पानी है। यही पानी कभी सागर है, कभी एक लहर है, कभी एक और लहर है, कभी यह पानी बूँद है, कभी वाष्प है, कभी बर्फ है, कभी बादल है, कभी नदी है, झील है, सरोवर है तो कभी नदी नाले की धार है। ये सब के सब एक अहंकार ले कर बैठे हैं, एक 'मैं' ले कर बैठे हैं। ये जितने भी नाम हैं सब अनित्य है। ये नाम अस्थाई रूप से मिले हैं। ये आकार के, प्रकार के, स्थिति के, अवस्था के कारण हैं और परिवर्तन होते ही वे नाम खो जाते हैं। नदी जब बहती है तो नदी है, पानी की नदी। सागर में जा कर मिली तो नाम खो गया पर पानी नहीं खोया। नदी ने स्वीकार किया अपने मैं के खोने का तो बस वह पानी हो गई। एक अकेले 'मैं' के मिटते ही पानी का आभास प्रकट हो जाता है। रिश्ते गल जाते हैं, न तू 'तू' रहता है न मैं 'मैं' रह पाता हूँ। सब तरफ, सब में, मुझ में केवल वह एक अद्वैत है। जैसे पानी की व्यापकता का बोध प्रकट हो जाता है तो द्वैत का बोध चला जाता है। वह जो 'वह' है वह भी मैं ही हूँ। यही ब्रह्मत्व है।

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचिद्जगत्यां जगत।

तेन त्येक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।। ईशावास्योपनिषद्।।१।।

2

प्रथम गुरू का प्रथम आशीष

अंकुरण से ले कर विशाल वृक्ष होने तक की यात्रा में सब से महत्वपूर्ण समय है- प्रथम अंकुरण से उस नन्हे पौधे तक का विकास। अंकुरण के भी दो प्रभाग है- पौधे का ऊपरी भाग आकाश और निचला भाग पाताल की ओर चल पड़ता है। जन्मते ही उसकी जड़ें धरती में अपना जमाव और नमी खोजने निकल पड़ती है और ऊपरी भाग हवा और प्रकाश ढूँढने चल पड़ता है। जड़ें मजबूत हों, वृक्ष का जब तना पुष्ट हो और शाखाओं, फूलो, फलों से वह लदा हो तब वह वृक्ष स्वयं को सर्वाइव कर लेता है। नन्हे पौधे को संरक्षण, संस्कार और अत्यधिक संभालने की जरूरत होती है। ठीक इसी तरह मनुष्य को बचपन में यह सब आवश्यक होता है। इसलिये प्राथमिक स्तर और आयु में ही सम्यक शिक्षा की जरूरत है। मैं इन्हें गुरुजी मानता हूँ। मैं यह इसलिये भी कह रहा हूँ कि जब मैं अपने गांव जाता था तो अपने शिक्षकों के प्रति मेरा सम्बोधन होता था गुरूजी प्रणाम! और मैं उनके चरण स्पर्श करता था उस समय उनके चेहरे पर नितान्त सौम्य और आशीष के भाव आते थे, उसमें मुझे अलौकिक दिव्यता दिखाई देती थी। इन महत्वपूर्ण घटनाओं को मैं जीवन भर कभी यह नहीं भूला। बाद की शिक्षा में जो शिक्षक रहे वे सभी आदरणीय हैं पर वे गुरूजी सदैव मेरे लिये पूज्यनीय रहे हैं। मैं उन्हें प्रणत भाव से नमन करता हूँ।

मुझे अच्छी तरह याद है उस बाँस की जाफरी वाली उस पाठशाला का वह पहला दिन। जूट की टाटपट्टी पर माँ ने ले जा कर बैठा दिया था। हाथ के बने सूत के कसीदे वाले झोले में थी बस एक स्लेट और खड़िया की कलम। फिर माँ उँगली छुड़ा कर चली गई एक पूर्ण आस्था और विश्वास के साथ पाठशाला को और मेरे पूज्य गुरू को सौंप कर।

माँ के कहे अनुसार मैने अपने प्रथम गुरुदेव पूज्यपाद श्री मदनलाल जी वर्मा के श्रीचरणों में षाष्टांग प्रणाम किया। वह एक रोमांच भरा क्षण था। मैं आज भी अपने भाल पर उन पावन चरणों का स्पर्श महसूस करता हूँ और मैं श्रृद्धा भाव से लबालब भर जाता हूँ। इस तरह से मैं अपने कुल से गुरुकुल में प्रविष्ट हो गया।

मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ और धन्यवाद करता हूँ कि मैं शिक्षा के उस मन्दिर में प्रतिष्ठित हुई उन प्रथम जड़ो और गुरू के उस प्रथम आशीष को कभी नहीं भूलूँ।


3

भरोसे का भरोसा

भरोसा न हो तो दुनिया अभी के अभी थम जावेगी। कितने अनजान लोग अनजान वाहनों के संग संग या क्रास कर के हमारे चारों ओर से गुजर रहे हैं पर इतना तो भरोसा है कि वे हमसे टकराएँगे नहीं। अगर भरोसा न होता तो हम सड़क पर कदापि नहीं जाते। भरोसा है कि भले ही मैं सोता रह जाऊँ तो भी सूरज उगेगा, दूध वाला दूध ले कर आवेगा। भरोसा है कि मेरे आसपास जो जो रिश्ते बन गए हैं वे कायम रहेंगे। मुझे जीने के लिये साँस लेते रहना है, तो मुझे यह भरोसा है कि अगर मैं यह भूल भी जाऊँ तो भी मेरा यह जीवन चलता रहेगा। भरोसा है कि मौसम और ऋतुएँ समय पर आवेंगी, जावेंगी। रात और दिन इसी तरह अपने क्रम में चलते ही रहेंगे।

यह भी पक्का भरोसा है कि कहीं न कहीं आज के इस दिन मेरे खाने का इन्तज़ाम हो ही रहा होगा। प्यास बुझाने के लिये पानी मिलेगा ही। मेरे दिन भर के श्रम मिटाने के लिये रात आएगी। भरोसा शायद मेरे जीवन का अनजाने में ही मीत हो गया है। बहुत सारे ऐसे भरोसे हैं जिन्हें मैं प्रत्यक्ष में जानता तक नहीं।

"हर पल कोई न कोई भरोसा मेरे साथ चलता है, शायद मैं इसीके आसरे पर जिन्दा हूँ।


4

प्यार की पुण्यगन्ध

प्यार की अपनी एक पुण्य गन्ध होती है, जिसे विज्ञान में केरेक्टरिस्टिक स्मेल कहते हैं। जैसे गुलाब की, चमेली की, मोगरे की, लकड़ी की, पसीने की, मिट्टी की उनकी अपनी अपनी गन्ध है । प्यार की खुशबू प्यार के आगमन से पहले ही महकने लगती है। प्यार की सुगन्ध भीनी भीनी सी होती है। प्यार में शोर नहीं सागर जैसी प्रशान्ति है। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर तुम्हें एक अपनत्व भरी सुगन्ध महसूस हो रही है तो समझो एक प्रीति का सागर तुम्हारे आसपास ही कहीं मौजूद है। इसका आनन्द लेना हो तो वहाँ चले जाओ, उसमें डूब कर देखो।

बारिश में भींगने का अपना मजा तो है पर देखो उस बादल को भी जो बरस रहा है। बहुत दूर से तुम तक चल कर आया है तुम्हें तरबतर करने को। यह मत सोचो कि कौन लाया है? कहाँ से आया है? बस देखो कि वह तुम्हारे सामने है। यह जरूरी नहीं है कि बादल रोज रोज आवेंगे। अब की बार चूके तो फिर न जाने कब मिलेंगे। तन भिंगोने के लिये तुम नकली शावर में रिमझिम बरसात सी तैयार तो कर लोगे पर उसके साथ मन भिंगोने के लिये वे बरसते सुहाने बादल नहीं होंगे। इसलिये चूक मत जाना।

"चलो! यही सुअवसर है, सुसंयोग है।"


5

जिस्म और रूह

जिस्म के इतिहास में एक भूगोल भी है, जिस्म की एक लम्बी सी कहानी होती है जिसे तुम जिन्दगी कह सकते हो। जिन्दगी के रोजनामचे में रोज कुछ न कुछ लिखा जाता है। हर दिन के पन्ने के आखिर में बारीक अक्षरों में नियति अपनी ओर से परिणाम लिखती है और उसकी समरी भी वही जोड़ती चली जाती है। इसे तुम 'लेखा-जोखा' कह सकते हो। इस समरी में तुम एक शब्द भी नहीं जोड़ सकते न ही घटा सकते हो पर तसल्ली और समझ से इसे पढ़ सकते हो। इसमें दिल्ली दूरदर्शन के "पाया-खोया" प्रोग्राम जैसा विवरण भी लिखा होता है।

कुछ रूमानी मायनों में हमारा जिस्म एक मकान भर है जिसमें जीवधारी किरायेदार जैसा रहने आता है। हमने इस मकान को बिगाड़ा तो यह सस्ते में जल्दी ही चला भी जाता है। जिन्दगी से प्यार करने वाले इसे करीने से रखते हैं, मेन्टेन करते हैं। जिस्म में लगी कर्मेन्द्रियाँ इसके कल पुर्जे हैं और पुरुषार्थ के संसाधन हैं। इसका इंजिन कमाल का है और ईंधन तो और भी गज़ब का है। जाने क्या क्या खा जाता है। वेज-नॉनवेज, भक्ष्य अभक्ष्य, पक्वान्न, कच्चान्न।

परन्तु मजेदार बात तो यह है कि जिस्म न हो तो रूहें कहाँ रहेंगी? वहीं दूसरा अनिवार्य पहलू यह भी है कि रूह नहीं रहे तो यह दो कौड़ी का भी नहीं। 

"जिस्म और रूह, दोनों हैं तो हम, तुम और सब हैं। इसे सम्हालो जरा।"


6

बड़े से बड़ा

तुम शायद यही सोचते हो कि संसार में बहुत भीड़ है। आदमियों की भीड़, रिश्तों की भीड़, अपनों परायों की भीड़, चारों तरफ बस भीड़ ही भीड़ । परन्तु तुम इसे भीड़ समझ कर बड़ी भूल कर रहे हो। ध्यान से देखो  इसी भीड़ में तुम्हारी संस्कृति, सोहार्द्र, आत्मीयता और प्रेम पल रहा है, और यह सब केवल इस धरा पर ही मिलेगा। तुमने सोचा मैं इससे बड़ा होना चाहता हूँ, इनसे ऊपर उठना चाहता हूँ, इन पर शासन-प्रशासन करना चाहता हूँ। शायद इसलिये तुम किसी एक मंच पर चढ़ गये या तुम्हें कोई पद मिल गया, तब तुम थोड़े बड़े हो गये हो। तुम्हारे साथ वहाँ कुछ स्वार्थी लोग ही बचे हैं। चढ़ते चढ़ते तुम पहाड़ पर चढ़ गये यानी कि कुछ और बड़े हो गये। वहाँ जा कर तुम उन जमीनी लोगों से ऊँचे और बड़े लग रहे हो, लेकिन तब से तुम बिल्कुल अकेले हो गए हो। तब जमीन पर खड़े वे तुम्हारे अपने ही सब लोग तुम्हें बहुत छोटे दिखने लगे। शायद उनसे संवाद करने में भी उन्हें अब अपनापन नहीं लग रहा होगा।

बड़े होते होते एक दिन तुम सूरज हो गये। अगर तुम सचमुच सूरज हो गये हो तो तुम्हें दूसरों के लिये जीना और जलना होगा। दूसरों के लिये तपना होगा। दूसरों के लिये अपना समर्पण तैयार करना होगा। इस सब से बड़े 'बड़प्पन' के साइड इफेक्ट भी समझ लो। यहाँ तुम अपने मैदानी रिश्तों और अपनों से बहुत दूर आ गये हो। वे सब भी तुम्हारे ताप और प्रभुत्व के कारण तुमसे डरे डरे से हैं। यहाँ तुम न चाहते हुए भी बिल्कुल ही अकेले हो। क्यों? क्योंकि तुम सूरज बनना चाहते थे और तुम बन गये हो। तुम चाहते थे कि सारे ग्रह उपग्रह तुम्हारे इर्द-गिर्द चक्कर लगाएँ। सारे मौसम और ऋतुओं के तुम नियन्ता हो जाओ। लो! तुम यह भी हो गये पर नोट करो कि "तुम उन सभी अपनों के लिये किसी निर्जन में खो गये हो!" तुम उनसे इन परिस्थितियों में घुलने मिलने की सोच भी नहीं सकते। इसलिये सुनो!

"जमीन पर छूटे हुए उन लोगों और रिश्तों को फिर से पाना है तो दूरियाँ, अहं और ताप छोड़ना पड़ेगा, बड़ा होने का अहसास भी।"


7

उस 'कौन' को जानें

यह संसार कैसा संसार है? यह सब कुछ भाग रहा है, सब ओर परिवर्तन है, यहाँ ठहराव कुछ नहीं है। सुबह हुई, थोड़ी देर में बदल गई। बरसात आई बरस कर चली गई, बचपन आया चला गया। जो हमेशा से है और रहेगा वह है 'परिवर्तन'। यह नैसर्गिक नियम है। यहाँ सब दौड़ रहे हैं कोई तेज तो कोई धीरे। कोई जीवन ले कर अभी अभी आया है, वह आते ही चल पड़ा है, याने जीवन चल पड़ा। कोई अभी अभी गया वह भी चलते चलते ही गया। ऐसा लगता है कि 'जन्म' स्वयं मृत्यु ले कर पैदा हुआ है। गिन कर साँसें या है, रोज उन्हीं में से कुछ खर्च कर रहा है। हम रोज नई माँग लेकर सोते हैं और जब अगली सुबह जागते हैं तो उसकी आपूर्ति में दौड़ने लगते है। पेट की आग, शरीर की माँग, और कभी मन में घुली भाँग हमें बैठने नहीं देती। यह माँग भी परिवर्तनशील है जब एक पूरी होती है तो यात्रा के मील का पत्थर बन कर पीछे छूट जाती है और लगता है कि वह हमसे पीछे दूर भाग रही है। हम आगे भाग रहे हैं। फिर कुछ दूसरी माँगें सामने मुँह बाये खड़ी हैं। "बेहिसाब हसरतें न पालिए, जो मिला है पहले उसे सम्भालिए।"

समस्त चर अचर और ब्रह्माण्ड का कण कण चलायमान है। किसी ने कहा यह पहाड़ तो अचल है, पर अन्तरिक्ष में जा कर देखो यह धरती पर सवार हो कर सूर्य के चारों तरफ परिक्रमा में लगा है।

तो स्थिर क्या है? कौन है? नित्य कौन है? अपरिवर्तनीय कौन है? कौन है जो काल अर्थात् समय की सीमाओं से परे है? जो सब बदलता है पर खुद नित्य एक रस है। जो अपरिमेय है। जो निर्माण में भी है और ध्वंस में भी है। जो अनन्त है।

जो कभी खाली नहीं होता ऐसा पूर्ण, जिसमे कुछ भरा नहीं जा सकता ऐसा पूर्ण, जो वहाँ भी है, यहाँ भी है। जिसमें सब है, जो सब में है। बनता भी है, बनाता भी है। इस सृष्टि के लय प्रलय के पहले भी था, है भी, रहेगा भी।

"चलो उस 'कौन' को जानने का प्रयास करें।"

उपनिषद् कहता है..

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।


8

मैं समुन्दर हूँ

मैं खारा जरूर हूँ पर जगत के कल्याण और जग-जीवन के लिये मीठे पानी के बादल भेजता हूँ। मेरी सतह पर शोर है पर मुझ जैसी नीरवता कहीं नहीं। तुम मेरे किनारे आओ मैं तुम्हारे पद प्रक्षालन करूँगा। तुम थोड़ा सा आगे बढ़े और तैरना नहीं जानते हो तो तुम्हें वापस किनारे पर फेंक दूँगा। जो नदियाँ मुझे अपना जल देती है, मैं वापस बादल भेज कर जो लिया उससे भी अधिक हर बरस लौटा देता हूँ। मैं बेरंग हूँ पर तुम्हें अच्छा लगूँ इसलिये नीला दिखाई देता हूँ। मैं जीवों और वनस्पतियों से बहुत प्यार करता हूँ इसलिये उन्हें अपने घर में रखता हूँ। तुम उछलते भले ही उसे ज्वार भाटा कहो पर वह मेरा चाँद के लिये उमड़ता हुआ प्यार है। मैं बस देता ही देता हूँ। मुझे मथ कर देखो मुझ में रत्न भरे पड़े हैं। मेरा स्वभाव अभेद है याने सब के लिये एक जैसा। मुझे बंधन की जरूरत नहीं इसलिये अपने खुद के बनाए तटबन्धों में स्वानुशासित रहता हूँ। केमिस्ट्री की भाषा में मेरी देह दो गैसों से मिल कर बना एक रसायन है। हाइड्रोजन जो सारणी का प्रथम तत्व और ऑक्सीन जो तुम्हें जीवित रखने वाला तत्व है।

मुझ से अध्यात्म जानो! मैं सागर हूँ पर झूम इन करके देखो अन्तिम रूप से मैं एक बूँद हूँ। मेरी इस बूँद का विराट विस्तार ही समुन्दर रूप में दिखाई देता है। इस बूँद की शक्ल में मैं हर जीव, जड़ और वनस्पतियों में और हे मानव तुम में भी मौजूद हूँ। मैं यहाँ भी हूँ और वहाँ भी हूँ। "महसूस करो, तुम्हारे भीतर भी हूँ और बाहर भी हूँ।" मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ।

"हो सके तो तुम भी सागर बनो!


9

तान दो मस्तूल

सूरज ने जुगनुओं को कभी चमकते हुए नहीं देखा। उसने कभी घोर अन्धकार भी नहीं देखा। वहीं जुगनू ने अँधेरा देखा भी है और उसमें वह रहा भी है। जुगनू उसकी अपनी दुनिया का शहंशाह है क्योंकि अपनी राह ढूँढने के लिये उसने सूरज के उजाले का इन्तजार कभी नहीं किया और न तारों के टिम टिम करते प्रकाश के भरोसे रहा। प्रकृति ने उसके साहस को देखते हुए उदात्त हो कर उसे बिना ईंधन का लालटेन दे दिया है। उसे सुलगाने की चिंगारी भी नहीं चाहिये। प्रकृति ने एक और वरदान उसे दिया है कि वह बिना ताप बढ़े उजाला कर सके। ऐसा लगता है कि प्रकृति उसे यह कह रही है कि तुम मेरी तरफ दो कदम साहस के चलो तो देखो मैं तुम्हारी तरफ चार कदम चल कर आई हूँ।

एक नन्हा दीपक भी इसी श्रेणी का योद्धा है। वह साहस से भरा हुआ, निर्भय हो कर समर्पण के लिये तैयार है। वह कहता है ''भले ही मैं अपने तले का अन्धकार दूर न कर पाऊँ, मैं अपने चारों ओर उजाला करने के लिये तैयार हूँ।

नचिकेता कठोपनिषद् का महानायक है जो मत्यु के देवता के सामने सहज भाव से अदम्य साहस ले कर खड़ा हो जाता है। उसका यह साहस यमराज को कोई चुनौती नहीं है पर उसे वहाँ भी भय कदापि नहीं है। फिर जो घटित हुआ वह अद्भुत था। नदी किनारे के बड़े मजबूत विशाल वृक्ष बाढ़ में बह जाते हैं पर बेंत का नन्हा सा साहसी पौधा साबुत खड़ा रह जाता है। एक साहस और उत्साह भरा नाविक अरब सागर पार करने के लिये मस्तूल बाँध कर निकल पड़ता है। फिर तो हवाएँ भी यही कहती हैं कि हम तुम्हारी नाव को हमारी शक्ति से चलावेंगी।

"साहस शक्ति का आमन्त्रण और कर्म का आधान और सफलता का प्रथम सोपान है।"


10

वर्तमान चल रहा है

कब से ढूँढ रहे हो रत्न? तुमने उम्र के कई पड़ाव देखे, कई अवसर मिले पर तुम हो कि और बेहतर संभावनाओं के द्वार खोजने में लगे रहे। खोजते खोजते तुम रत्नों की खदान के अन्तिम छोर तक निकल आए हो। तुम्हें कई रत्न मिले भी पर तुम उन्हें बस परखने में लगे रहे, निरस्त करते रहे पर और अधिक बेहतर की खोज में उन्हें रास्ते में ही छोड़ते चले गये। इसलिये कहता हूँ कि अभी भी वक्त है कि जो मिल रहा है उसे अपनी गिरह में रख लो।

जिन्दगी जुआँ नहीं है कि हारते जाओ तो भी बेहतर जीत के चक्कर में खेलते ही रहो। देखो! जितने जुआरी हैं वे कब धनपति हुए हैं? जो क्षण आया है वह अवसर है चूक गये तो समझो तुम चुक गये, जो बीत गया है वह इतिहास है इसे बदलने का सामर्थ्य स्वयं ब्रह्मा में भी नहीं है, जो आनेवाला है वह अन्धे की रेवड़ी है तुम्हारे हाथ लगे न लगे।

हर पल कुछ न कुछ सौगात ले कर आता है और वह तुम्हारे पुरुषार्थ, पराक्रम, समझ और क्रियात्मकता को चुनौती देता है। ये चुनौतियाँ अपने गर्भ में तरह तरह की संभावनाएँ और उपलब्धियाँ भर कर लाई हैं यदि इन चुनौतियों को आफत समझ लिया तो बैठे रह जाओगे। पहली बरसात हुई, अगर किसान बीज लिये खेतों के किनारे बैठा रहा और फिर बीज बोने का वक्त आया वह आसमान तकता रहा तो उसके लिये अवसर लौट कर नहीं आता है। एक बात और है यदि वह फसल बोने से चूक गया तो खरपतवारों को उगने को मौका मिल जावेगा। फसल गई सो गई खेत की सफाई अलग माथे पड़ गई।

"इस उपयोगी वर्तमान को कोरे अतीत के अन्धे गर्त में मत फेंको।"


11

खुद के संग जरूर रहना

सम्पूर्ण संसार गतिमान है। यहाँ कोई आ रहा है, कोई जा रहा है। कोई ला रहा है, कोई छोड़ रहा है। कोई कुछ कदम साथ चला फिर कहीं छूट गया। लोग मिलते गये, रिश्ते बनते गये। इस आपाधापी में सदैव जो तुम्हारे संग रहा वह तुम स्वयं थे परन्तु कई बार तुम्हें लगा होगा कि तुम्हारे साथ कोई भी नहीं है तुम गहन शून्य में हो पर निश्चित रूप से जब जब भी ऐसा हुआ होगा वह तुम्हारी आत्मविस्मृति थी। एक और सच महसूस हुआ होगा कि जैसे ही कोई विपत्ति आयी तो कुछेक को छोड़ कर बाकी सब अगली बगली झाँकते नजर आयेंगे।

आत्मविस्मृति की यह भूल अर्जुन को भी हुई थी। महाभारत के समरांगण में उसके सामने लोग खड़े थे, रिश्ते खड़े थे, दुविधाएँ खड़ी थी, और एक संशय खड़ा था। इन सब का जो सम्मिलित मध्यम प्रभाव था वह 'विषाद' था। ऐसा तो सारा निर्मित परिदृश्य था पर इन सब के बावजूद सबसे विचित्र तो यह था कि विषाद का अन्तिम प्रभाव अर्जुन की "आत्मविस्मृति" होना था।

उसे पता ही नहीं रहा कि वह कौन है? क्यों समर में आया है? उसका कर्म-अकर्म क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर उसे खोजना नहीं था अपितु उसे इनका स्वयं बोध होना चाहिये था। यह तो स्पष्ट था कि अर्जुन उस प्रांगण में "वह सबके साथ खड़ा था पर खुद अपने ही साथ नहीं खड़ा था।" कर्म का सबसे बड़ा साधन तो पुरुषार्थ है और आत्मबोध के बगैर न धर्म होगा, न अर्थ मिलेगा, न कामना की आपूर्ति होगी, फिर मोक्ष की बात तो बड़ी दूर की है। न मार्ग का पता होगा न मंजिल का। यह जरूरी नहीं कि जैसे हनुमान जी को जामवन्त मिले तुम्हारे जीवन में कोई मिल ही जावेगा, हर ग्वाले को चाणक्य मिल ही जावेगा।

श्रीमद्भगवद्गीता अर्जुन के विमोहन और आत्मविस्मृति के निक्षेप से शुरू होती है और "स्मृतिर्लब्ध्वा" अर्थात् आत्मबोध पर जा कर पूर्ण होती है। वह कह उठता है "यथेच्छसि तथा कुरू" अब आप जैसा चाहेंगे वैसा करूँगा।

यह पक्का है की तुम खुद को भूले तो तुम्हारे अन्तःकरण के सब द्वार बन्द हो जावेंगे।

सब से बड़ा सच तो यह है कि "तुम से अधिक तुम्हें कोई और नहीं जानता।" 


12

अन्तःकरण से जुड़े लोग

"भद्रं पश्येमाsक्षभिर्यजत्रा"। - अपनी आँखों से अच्छा देखो।

आँखों की पुतलियाँ एक गेट वे है जरूर पर हर किसी को दिल तक जाने नहीं देती। वह सक्षम इतनी है कि इस एक बारीक से छेद में पूरी दुनियाँ समा लेती है। तुमने कभी ध्यान नहीं दिया इस फर्स्ट गेट के आगे कॉमन हाल है जहाँ तक वे लोग पहुँचते हैं जो तुम्हारे साथ कोई न कोई रिश्ता रखते हैं या वहाँ पर ठहरने के लिये अपना स्थान बना लेता है। यह बहुत बड़ी जगह है जहाँ बहुत सारे लोग समा सकते हैं, रुक सकते हैं, बाहर भी निकल सकते हैं। इस कामन हॉल में कभी कभी बहुरूपिये, मुखौटेबाज, छलिया, और शरारती लोग भी पहुँच जाते हैं और विप्लव मचाते रहते हैं। इन्हें बेदखल करना बहुत मुश्किल होता है। उन्हें सम्हालने में बहुत सारी ऊर्जा खर्च हो जाती है। ये वायरस की तरह हमारे इम्यून सिस्टम पर ही अटेक कर देते हैं। ये बहुत बलशाली हैं और किसी भी एन्टीवायरस से भी मरते नहीं है पर इनके लिये क्वारन्टीन करने की जगह इसी हाल में रखना पड़ती है। यह हॉल भरता और खाली होता रहता है। फिर इसके आगे एक सिट आउट है यहाँ तक वे लोग आते हैं जो तुम्हारी इजाजत के इन्तेजार में रहते हैं। ये वे लोग है जो तुम्हारी मनोवृत्ति, रुचि अथवा पसन्द की कसौटी पर खरे उतरते हैं। यह सिट आउट इसलिये भी जरूरी है कि यहाँ फिर एक छ्ननी लगानी है। यहाँ से आगे का मार्ग बहुत महत्वपूर्ण है अन्यथा डेमेजकन्ट्रोल सम्भव नहीं होता है। ये वे लोग हैं जो तुम्हारे जीवन को, विकास को, गिरावट को, मन मस्तिष्क को पूरी तरह प्रभावित करते हैं। इस सिटआउट के बाद एक लिविंग रूम हैं जहाँ तुम इन चहेते लोगों के साथ रह सकते हो, व्यवहार कर सकते हो, आदान प्रदान कर सकते हो। इनके साथ पूरा जीवन साझा कर सकते हो।

सिटआउट से सँटा हुआ सबसे अलग थलग एक गलियारा है जो सीधे तुम्हारे अन्तःपुर में पहुँचता है। अन्तःपुर तुम्हारा अपना अन्तःकरण ही है इसमें जो लोग पहुँच गये उन्हें तुम जन्म जन्मान्तरों का भूल नहीं सकते। ये वे लोग हैं जो तुम्हें और तुम इन्हें अच्छे लगते हो। जरूरी नहीं कि दुनियाँ जान सके कि ये कौन कौन लोग हैं। कभी कभी इसमें रहने वाले सक्ष भी नहीं जानते कि तुम उन्हें एक तरफा पसन्द करते हो। यहाँ देवत्व उतर आवे तो तुम भक्त बन जाते हो, दानव उतर आवे तो विध्वंसकारी हो सकते हो और यहीं अनन्त संभावनाएँ निर्मित होती हैं जो तुम्हारे भीतर बाहर की तमाम गतिविधियों और सम्पूर्ण जीवन को नियन्त्रित करती हैं। यह गलियारा तुम्हारे अपने नियन्त्रण में है। यहाँ पहुँचने और रहने वाले लोग सब रिश्तों को लाँघ कर आते हैं और किसी भी प्रकार के बन्धनों-अनुबन्धों से मुक्त रहते हैं। ये इस तरह साथ रहते हैं जैसे आँखों से कान और मुँह सिले हुए हों। ये अगर बाहर निकल भी जावें तो इनकी अमिट स्मृतियाँ वहीं परमानेन्ट बनी रह जाती हैं और तुम इनके वर्चुअल इफेक्ट में रहते हो चाहे वह तुम्हारा गुरू हो, प्रेमी हो अथवा आदर्श हो। इनमें से भी कोई एकाध तुम्हारे संग दूध में घुली मिसरी की तरह रहता है। जिसे वह भी जानता है और तुम भी। वह अलेप है, लोभ आदि सभी विकारों से रहित है। चाहे वह पुरुष हो, स्त्री हो, प्रकृति हो या परमात्मा हो। इसे तुम से जुदा कोई नहीं कर सकता।

" तुम्हारा अपना अन्तःपुर सिर्फ तुम्हारा है इसे तुम ही अच्छी तरह सम्हालो"।

13

मन का बोझ

मन अमूर्त है, अभौतिक है, अदृश्य है, अश्पृश्य है लेकिन इन्द्रियों का सुरवाइजर, सुपरकन्ट्रोलर है और सुपरसोनिक स्पीड से भी तेज चलता है। करता कुछ नहीं पर करवाता सब है। जलेबी का स्वाद इसे चाहिये तो हाथ, दाँत और जबान को काम में लगा देता है। बेचारी इन्द्रियाँ नाचती है इसके इशारे पर। "नाच नटी इव सहित समाजा।" शरीर का सबसे जिद्दी, सबसे बलवान, सब से कमजोर प्रत्यंग भी यही है, नियन्ता भी यही है। कभी कभी यह बुद्धि को भी परास्त कर देता है, विवेक की भी नहीं सुनता है। कभी एवरेस्ट पर चढ़ा देता है, कभी रस्सी से पंखे पर लटकवा देता है, कभी आँख वाले को अन्धा बना देता है तो कभी आनन्द विभोर कर देता। लेकिन कुछ विशेष गुणों के चलते इसकी चार बड़ी विशेषताएँ ये हैं - वेग, आवेश, आवेग और संवेग।

जरा इन्हें विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में देखें -

वेग- इसे आप गति कह सकते हैं। समय के सापेक्ष्य में किसी की स्थिती के परिवर्तन को 'वेग' कहते हैं। साधारण बोल चाल की भाषा में कहें तो अभी यहाँ तथा कुछ पलों बाद कहीं और। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की गति ही वेग है इसी गुण के कारण इसे वेगवान कहते हैं।

आवेश- इलेक्ट्रीफाइड अर्थात् अपनी न्यट्रल पोजिशन से शिफ्ट हो जाना। जब इसमें कोई नया विचार तेजी से प्रवेश करता है तो इसमें उस विचार के अनुसार प्रबल ऊर्जा संचरित हो जाती है और यह उन्मत्त हाथी की तरह व्यवहार करने लगता है।

आवेग- बाढ़ की तरह बहना। आवेशित हो कर किसी भी दिशा में बेतहाशा दौड़ लगाना आवेग है।

संवेग- इसे मोमेन्टम कहते है। इस स्थिति में मात्रा और गति दोनो एक साथ काम करते हैं।

वेग, आवेश और आवेग को आसानी से समझा जा सकता है लेकिन संवेग इनका समन्वित फल है। एक बार गति पकड़ने के बाद नहीं रुक पाना संवेग है जैसे मोटर सायकल में एक्सीलेटर छोड़ देने पर भी गाड़ी चलती रहती है। और गतिशून्य हो कर न चल पाना भी संवेग है जिसे मोमेन्ट ऑफ इनर्शिया कहते हैं जैसे पार्किन्सन में होता है।

“मन में शुभ संकल्प न हों तो ये विकृतियाँ संभव है।“


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कोई आ जाता है कहीं से

जीवन को उत्सव रूप में परिवर्तित करने के लिये कुछ लोग कहीं से आ जाते हैं। जैसे दीपावली, होली में दीपक, रंग और पटाखे आ जाते हैं।

दीपावली उत्साह ले कर आती है। रांगोलियाँ सजती हैं, दीप जलते हैं, पटाखे चलते हैं। दीपावली एक संवत्सर की तिथि तो है पर उसे उत्सव बनाने वाले ये दीप, रंग और पटाखे अपना सर्वस्व लगाने को तत्पर है। दीप अपना तैल और बाती समर्पित करता है, रंग मनोरमता परोस जाते हैं, पटाखे फूट जाते हैं और दीपावली को एक उत्सव में परिवर्तित कर देते हैं। इनके बगैर दीपावली एक पर्व तो है पर "उत्सव" नहीं हो सकता। इन्होन हमें उत्सव के द्वार पर ला कर खड़ा कर दिया है। पटाखे फूट गए , रंग बिखर गया और दीपक तेल खत्म होते ही बुझ गया। उनकी अपनी कर्म रेखाएँ तो बची रहती हैं, इनसे हमारे संबंध भी टूटते नहीं हैं। एक सुखद संदेश यह है कि वे उनके अपने अपने निहित दायित्वों का इमानदारी से निर्वहन करते रहे हैं।

इनके पावन उत्सर्ग में उल्लास के दर्शन होने चाहिये न कि किसी हताशा के। यहाँ उनकी समस्त ऊर्जा का रूपान्तरण है। वस्तुतः हमें पटाखों, रगों और दीपों का कृतज्ञ होना चाहिये।

"जो अपना कुछ खो कर भी हमें खुशी देते है हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिये।"


15

बहारें फिर भी आएँगी

सूरज चुपचाप आता है जीवन और जीवनी देकर शाम को चला जाता है। चाँद आता है शीतल चाँदनी में नहला कर चला जाता है। ऋतुएँ दबे पाँव आती है अपना दायित्व पूरा कर चली जाती है। परन्तु यह सब क्यों होता है?

एक ऋतु इसलिये जाती है कि दूसरी को आना है। नदी, तालाब, झरने, पेड़ पौधे, वनस्पतियाँ सब चुपचाप हैं सब अपनी अपनी लय में हैं, सिर्फ सेवा में लगी है। ये सब समय के साथ बदलते रहते हैं। युवराज इसलिये नियुक्त होना है कि राजा के जाते ही उसे राजा बनना हैं। नदी अपनी धारा लिये बहती है ताकि ऊपर से आने वाले पानी को आने का मार्ग देना है। सूखे पत्तों को शाखा रिक्त करनी है ताकि वहाँ पत्तों की अगली पीढ़ी जन्म ले सके। बीज अंकुरित हो जाने के पश्चात अपना उत्सर्ग करता है ताकि अपने वंश की वृद्धि कर सके, उनकी जगह अगले बीज आ सकें।। ध्वंस, ह्रास, विनाश, क्षरण, परिवर्तन आदि इसलिये भी आवश्यक हो जाता है कि वहाँ अगला सृजन आने वाला है। मिट्टी को इसलिये जलना है कि उसे ईंट हो कर अगला भवन निर्माण करना है। यह विकास क्रम और प्रक्रिया अनन्त काल से अनवरत चल रही है। पशु पक्षी जीव जन्तु सब अपनी अपनी जद में हैं।

इनके परिक्रमण को देख कर निश्चित लगता है कि बहार के बाद भले ही पतझड़ आता हो "बहारें फिर भी आएँगी।"


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अनुमान, अनुभव और संभावनाएँ

बड़े आश्चर्य की बात है कि पतंजलि योगसूत्र में अनुमान को प्रमाण माना गया है।

अनुमान का सामान्य अर्थ है अन्दाजा लगाना। यह अन्दाजा अतीत अथवा भविष्य के किसी आयाम से उठा कर लाया गया संभावित उत्तर है। यह उत्तर अनुभव की आधारशिला पर खड़ा होता है। अनुमान भूतकाल की किसी वास्तविक घटना के समानान्तर रख कर आकलन करता है जैसे नदी में आयी बाढ़ यह बताती है कि नदी की उद्गम दिशा में कहीं तेज बरसात हुई है। वहीं वर्तमान में चल रहे परिदृश्य को देख कर काल्पनिक अथवा वास्तविक अनुभवों के आधार पर की गई गणना भविष्य की किसी संभावित घटना का पूर्वाभास है जैसे कि जिस डाल पर खड़े हो कर उसी डाल को तने की तरफ से काटने पर स्वयं गिर जाना तय है। परन्तु जो घोषणा की गई है वे अपने समग्र अनुभवों का परम्यूटेशन कॉम्बीनेशन ही है। जितने अनुभव परिपक्व होते है घोषणाएँ उतनी ही सच्चाई के निकट होती है।

अनुभव तुम्हारी चेतना में परिरक्षित और संचित कोष है। हम, तुम और सभी लोग प्रत्येक क्षण किसी न किसी घटना के साक्षी होते हैं। कुछ घटनाएँ हमें प्रभावित करती हैं, कुछ हम नजर अंदाज करते हैं लेकिन कुछ घटनाएँ हमारे अन्तस में जाकर बैठ जाती है जिन्हें हम चाह कर भी भूल नहीं सकते। अनुभव इन्हीं घटनाओं और उनसे जन्य परिणामों का कोष है। पूर्वानुमान इस अनुभव से पकाई गई खिचड़ी है जो पक्वान्न की तरह है। वह पक्वान्न जो दाल, चावल, नमक, सब्जियों आदि कई इनग्रेडियेन्ट का समुचित अनुपात में मिलाया गया भेल है। इसे रुचि अनुसार चटखारों से भी तैयार किया जा सकता है। गलत अनुपात अथवा अपरिपक्वता इसे खराब भी बना सकते हैं। खैर जो भी हो हम अपने दैनिक जीवन में यह खिचड़ी रोज बनाते हैं जो हमारे जीवन को, जीवन शैली को और परिणाम को प्रभावित करती है।

"अपने अनुभव और अनुमान से अच्छी संभावनाएँ तलाशें"


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नन्ही की पगडण्डी

बड़े अजीब थे ये लोग। इन्हे मैं जिद्दी नहीं धुनी कहता हूँ। ये वे लोग थे जो थार के मरुस्थल की ओर चल पड़े गन्ने की फसल उगाने, शैल शिखर को उँगली पर उठाने, तिल को ताड़ बनाने।

तुलसी जो रागी से वीतरागी हो गया। आततायी मुगलों की छाती पर रामचरितमानस लिखने का अद्भुत कार्य किया है जिसने। जैसे मन्दिर में पूजा ओर पुजापा रखा होता है वैसे हमारे घरों में यह पावन, अमर ग्रन्थ रख गया। जैसे वनाञ्चलों में ऋषियों ने ऋचायें गाई वैसी भक्ति की, ज्ञान की, वैराग्य की त्रिवेणी जन जन के हृदय में उतार गया। उपकृत हैं हम सब।

मन्दिरों में भजन सबने सुने होंगे। राजमहल और रंगमहल के भोग विलास में डूबे वातावरण में भी गोपाल के अनन्य प्रेम में पगी वह योगिनी मीरा करताल ले कर गाने लगी "मैं तो साँवरे के रंग राची।" जिसकी श्रद्धा और भक्ति के प्रताप से ही विष भी प्रिय का अमृतमय प्रसाद बना होगा। उसकी गिरधर के विरह में की गई पुकार जन जन की अभ्यर्थना और अर्चना का मन्त्र बन गई। वह तरी और कईयों को तार गयी।

वह रैदास मरी खाल को सीते सीते कह गया कि हे परमेश्वर "तुम चंदन हम पानी" और घुल कर अपनी वह खुद ही घुल कर सुवास जन जन में छोड़ गया।

उस कबीर ने तो हद ही कर दी। उपनिषदों में वर्णित तुरीय को अपने करघे में लगे तानों बानों में बुन गया। ऐसी चादर बुनी कि बेदाग-बिंदास जैसी की तैसी धर गया। सत्य का निर्भीक पुजारी था वह।

और वह सूर बिन आँखों के ही विराट का दर्शन करते करते भक्ताकाश का सूरज बन कर चमक गया। उसकी प्रज्ञा तो चर्म चक्षुओं से परे मनश्चक्षुओं से ऐसा देखती थी कि कोई आँख वाला भी क्या देखेगा। उस धुनी ने असंख्य पद ऐसे गाये कि जिसके 'सूरसागर' में डूबने को मन करता है।

ये वे लोग थे जो पानी की उल्टी धार में टूना मछली की तरह तैरे और मिसाल छोड़ गये। उन्हें पता ही नहीं होगा कि जिन पगडण्डियों पर से गुजरे वे इस संसार के जन जन के लिये पुण्यशील राजपथ हो गये हैं।

"हो सके तो तुम भी ऐसी एक नन्ही सी पगडण्डी ढूँढ लो!"


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मैं बस मैं ही हूँ

हमारे मन को कौतुहल पसन्द है। यह सीधे सरल पानी में जैसे जोंक टेढ़ी चलती है मन वैसा टेढ़ा टेढ़ा चलता है। इसलिये ही शायद आज़ाद रिश्तों में हम बन्धन ढूँढते हैं और बंधे रिश्तों से आज़ादी चाहते है। है न बड़े आश्चर्य की बात? हम बाजार से चमचमाती जंजीर ले आते हैं तो हमें उससे मोह होना स्वाभाविक है। फिर तो इन जंजीरों से मोहब्बत होने से हमें कोई छुटकारा नहीं दिला सकता।

एक आदमी ने तोते का चूज़ा पाला उसे सुनहरे पिंजरे में रखा बड़े प्यार से उसे पिंजरे में खाना पानी देने लगा। धीरे धीरे तोता बड़ा हो गया। एक दिन तोता पिंजरे से बाहर आ गया। आसपास कोई नहीं था, दरवाजा खुला था। वह चल कर दहलीज पर आ कर देखता है। बाहर खुला आसमान है। आम, अमरूद, सेब पेड़ों पर लटके हुए हैं। उसे लगा यह सब नकली है क्योंकि फल तो पिंजरे में ही पाये जाते हैं। वह केवल यही जानता था कि सारी असल वस्तुएँ पिंजरे में ही पायी जाती है। वह फिर पिंजरे में लौट आया। जैसे तोता पेड़, पौधे, आकाश आदि से अपने मूल रिश्ते को अनावश्यक और बन्धन के रिश्तों को जबरजस्ती अपना मूल रिश्ता समझ लेता है। हम भी सब वही कर रहे हैं। ऐसे में हमें हमारी इसी प्रवृत्ति के लोग मिल जाते हैं, जैसे करेला नीम पर चढ़ गया हो। 

बन्धे को बन्धा मिले, छूटे कौन उपाय।

कर संगति निरबन्ध की, पल में लेय छुड़ाय॥

जंजीरों में वह भी बँधा है और मैं भी। हमें निर्बन्ध चाहिये?

यह मनोयोग नहीं मनोदशा है, भटकन है। हम न तो हल ढूँढते हैं और न आज़ादी।

हम अपने भीतर के पावन रिश्तों से आजादी चाहते हैं क्योंकि हम भीतर के वास्तविक रिश्ते से बेखबर घूम रहे हैं। हम जगत में अपने बनाए कई रिश्तों के बन्धन स्वीकारते हैं पर भीतर के आज़ाद रिश्ते नहीं पकड़ते। भीतर के रिश्तों की अनुमति किसी से नही लेनी पड़ती इसलिए ही इस रिश्ते को आज़ाद कहा है।

"मैं जो हूँ बस मैं ही हूँ"।


19

जिन्दगी तेरी मेरी कहानी

जीवन अनगिनत छोटी छोटी कथाओं का एक चलता फिरता उपन्यास है। वक्त के कई मोड़ आते हैं, लोग मिलते हैं बिछुड़ते हैं, फिर फिर मिलते हैं। हर एक के साथ कोई न कोई कथानक, कोई संवाद, कोई याद जुड़ जाती है। कोई कुछ लेता है तो कोई कुछ देता है पर इनमें से कोई खास सक्ष ऐसा भी जीवन में आ जाता है जो न कुछ लेता है, न देता है। जो अटूट नाता जोड़ कर दूध में मिसरी के तरह हमारे दिल दिमाग में बैठ जाता है। रिश्ते हम बनाते हैं पर नाता ऊपर वाला बनाता है। यह खास नातेदार जब आसपास होता है तो मन आनन्द विभोर हो जाता है, दूर जाता है तो लगता है तो जैसे शरीर से कोई अंग कट गया है। इन नातों के बिना क्या अपने जीवन की कहानी पूरी हो सकती है? ये अध्याय हमने नही जोड़े हैं पर अगर ये जुड़े नहीं होते तो पूरा जीवन व्यर्थ हो जाता। इसलिये जीवन इसी समग्रता का कन्सोलिडेटेड पैकट है। इसे खोल कर देखेंगे तो दिखेगा हम इनके कारण क्या से क्या हो गए हैं।

बचपन में हम दादी माँ से कहानी सुनने की जिद करते थे तो उनका मूड न हुआ तो वह एक संक्षिप्त वाक्य की कहानी सुनाती थी- "एक था राजा एक थी रानी, दोनो मर गए खतम कहानी।" अगर खूबसूरत नाते ना जुड़े होते तो हमारी सुनी उस दादी माँ की संक्षिप्त कहानी की तरह जीवन को ही छोटा सा ही रह जाता।

"चलो याद करें हमारी अपनी वह कहानी जो अपने जीवन के मूल्य समझाती हो।"


20

विकास, वैभव और विकार

विकास का सामान्य अर्थ है 'बढ़ना'। बेहतरी की ओर बढ़ना। पर हमने केवल आराम के संसाधनों के इकट्ठा हो जाने को विकास मान लिया है और इनसे इतना अधिक घिर गये कि इन के मेनेजममेन्ट में ही सब से अधिक व्यस्त रहते हैं।

विभव

और तो और हम इन संसाधनों के उपयोग के लिये जबरजस्ती दौड़ते फिरते हैं जैसे कि - गाड़ी खरीदी तो चलाना है, टीवी खरीदा तो देखना है, साउण्ड सिस्टम खरीदा तो सुनना है, फ्रिज में शर्बत ला कर रखा है तो पीना है।

इनकी ऐशगाही से बचने का एक बहुत ही सरल सा उपाय है-'अपरिग्रह' अर्थात् जीवन के लिये जितनी कम से कम आवश्यकता है उससे अधिक इकट्ठा नहीं करना है। एक अजीब सी मानसिकता हम में घर कर गई है कि मेरे पड़ोसी के स्टेटस से मेरा स्टेटस बड़ा हो। यह एक बड़ा मानसिक विकार है। इकट्ठे किये गये इस माल-असबाब को हम 'वैभव' कह रहे हैं। ये सब हैं तो हम विकसित और वैभवशाली हैं।

विकार

विकार को अध्यात्म की दृष्टि से देखें तो यह एक नैसर्गिक नियम है। किसी भी वस्तु के मूल स्वरूप में अच्छे या बुरे 'परिवर्तन' को ' विकार' कहते हैं लेकिन स्वभाव और व्यक्तित्व के ऋणात्मक परिवर्तन को प्रायः हम 'विकार' कहते हैं। यह विकार उत्पन्न ही न हो इसका पक्का उपाय है। आपके जीवन का विकास, विभव और विस्तार सम्यक् हो इसका मूल मन्त्र है - 'तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु'। अपने संकल्पों को जिस दिशा में ले जाएँगे हमारा जीवन और व्यक्तित्व धीरे धीरे उसी दिशा में चलता जाएगा। "कभी नहीं तो अभी सही,"  अर्थात् इसी क्षण से अपनी दिशा में आवश्यक सुधार कर के शुभ संकल्पों का प्रारंभ करें। तो चलो! आज की सुबह फिर नया अवसर ले कर आई है।

"संकल्प ही जीवन की दिशा है, जो हमारे अन्तःकरण का फैसला है।"


21

अपना हाथ जगन्नाथ

मैं अगर मुट्ठी बन्द रखूँ तो न किसी को कुछ दे सकता हूँ, न ही कुछ भी ले सकता हूँ। मन में कुण्ठा बसी हो तो भी ऐसा ही होता है। बँधी हुई मुट्ठी संख्या में तो एक है पर जब मुट्ठी को खोल कर देखता हूँ तो मुझे खुली खुली नर्म और लचीली पाँच उंगलियाँ दिखाई पड़ती है। उनके पोर पोर दिखते हैं, हाथोँ की रेखाएँ दिखाई पड़ती है। ध्यान से देखता हूँ तो आश्चर्य होता है कि ये सब मेरी अपनी मुट्ठी में ही बन्द था। मुट्ठी खुलने पर एकदम से लगता है अपने इस हाथ में अब काम करने की क्षमता आ गई है। जैसे कर्मक्षेत्र के बहुत से द्वार खुल गये हैं।

ये बात अलग है कि बन्द मुट्ठी और खुले हाथ

अलग अलग बातों के प्रतीक हैं। बन्द मुट्ठी संकल्प का संकेत है, शक्ति का आह्वान है, प्रतिज्ञा का बोध है, दृढ़ता का प्रदर्शन है और अगर बन्द मुट्ठी आकाश की ओर ऊपर उठ जाने तो वह "महा उद्धोष" है। वहीं खुले हाथ कर्म का संसाधन है, जुड़ने का साधन है, आत्मीयता का आह्वान है। हाथ किसी की पीठ पर रख दें तो उसमें उत्साह और ढाढस पैदा हो जाती है। यही हाथ टोकनी से फूलों को उठा कर किसी को दे देता है तो खुद भी महक उठता है। यही हाथ किसी और हाथ से मिलेगा तो "मैं से हम" हो जावेगा। मैं से हम की यात्रा व्यष्टि से परमेष्ठि की यात्रा है। तब मेरा यह हाथ राष्ट्र का निर्माण करेगा, चरित्र का निर्माण करेगा, पुरुषार्थ के नये नये तीर्थों का सृजन करेगा।

"बँधी मुट्ठी और खुले हाथ संकल्प और श्रम के प्रतीक हैं।"


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यही एक पल है

पहले मुर्गी आयी कि अण्डा? प्रश्न नहीं है पहेली है। पहेली बूझी जाती है। शायद यह पहेली अबूझ है। अगर ये प्रश्न होते तो उत्तर की संभावना होती मगर यह तो पहेली है। पहेलियाँ खेल है, कौतुहल है, समय बिताने का जरिया भर है।

एक बार इस अण्डे और मुर्गी वाली पहेली पर लम्बी चर्चा हुई। एक कुटिया में ज्ञानियों में बहस छिड़ी तर्क हुए, वितर्क हुए कुछ कुतर्क भी हुए। लम्बी बहस में कोई नहीं जीत सका, सब के सब हारे। पास ही मुर्गियों के चूजे घूरे के ढेर पर नाच-कूद रहे थे, आनन्द मना रहे थे। उन्हें पता नहीं था कि ये सारे ज्ञानी लोग मिल कर हमारी ही उत्पत्ति की गंभीर चर्चा में खोये रहे। पर चूज़े जीवन के उन पलों को गवाँना नहीं चाहते थे। चर्चाकार यदि उन अण्डों की चर्चा को छोड़ कर उनसे उत्पन्न इस वास्तविक जीवन का दर्शन करते, उसे दौड़ता-भागता, अठखेलियाँ करता हुआ देखते तो वे भी धन्य हो जाते।

ऐसे अतीत के सूखे पहाड़ को खोदने में बस गार्बेज ही निकलना है। तुम्हें पता नहीं है कि वर्तमान सरपट दौड़ रहा है। जो भी है, बस यही एक पल है। क्यों इसे उस खाई में धकेल रहे हो। इन पलों प्रकाश भी है अँधेरा भी है, आनन्द भी है आहें भी हैं, चुनाव तुम्हें करना है। विकल्प कई हैं इनमें से संकल्प एक ही हो सकता है। दशाएँ जो भी हों दिशा तुम्हें ही चुनना है।

ये पलों के चूजे कह रहे हैं –

"इससे पहले कि यह पल बीत जाए, इसे उत्सव बना लो।"


23

जीवन के अभीष्ट

कहते हैं पानी को स्वतन्त्र छोड़ दिया जावे तो वह खुद अपना तल ढूँढता है पर इसके लिये नीचे की ओर ही बहता है। इसमें पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण काम करता है। परन्तु इसका अपवाद भी मौजूद है। पौधे में यह नीचे जड़ों से ऊपर चढ़ता है। दिये की बाती में तेल ऊपर चढ़ता है। बरसात में जब नदियाँ तेज बहती है तो हर चीज दौड़ कर सागर की ओर जाती है परन्तु मछलियाँ सागर से उल्टी धार में चढ़ कर आ जाती हैं। कहने को तो हम यह कहते हैं कि पंछी आकाश में उड़ते हैं पर वास्तव में तो वे हवा में उड़ते हैं। ये पंछी चाँद पर नहीं उड़ सकते क्योंकि वहाँ आकाश तो है पर हवा नहीं।

परन्तु ध्यान से देखें तो जो स्थितियों और परिस्थियों के साथ बिना प्रयास चलता है वह सिर्फ बहता है। वहीं जब पुरुषार्थ इसके साथ जुड़ जाता है तो परिणाम बदल जाते हैं। पौधे में पानी ऊपर उठता है तो पौधे का जीवन चल पड़ता है। दिये में तैल ऊपर बढ़ता है तो दिये के जीवन के उद्देश्य को सार्थक करता है। मछलियों का खारे पानी से निकल कर मीठे पानी का घर मिल जाता है। पंछी उड़ कर चले तो अपनी आजीविका और चर्या के लिये आधार पा लेते हैं।

"पुरुषार्थ से प्रकृति की विषम परिस्थितियों पर विजय पा सकते हैं।"


24

क्या और कितना जरूरी है?

यह प्रश्न जीवन के आधारभूत प्रश्नों में से एक है। लेकिन इसी प्रश्न को थोड़ा व्यापक बनाना होगा। जरूरतें न हो तो जीवन की कल्पना व्यर्थ है पर 'क्या क्या जरूरी है?' कितना जरूरी है? इस पर थोड़ा चिन्तन करना चाहिये।

क्या जरूरी है?’ यह जीवन की आवश्यकता है पर आवश्यकता की परिधि को पार कर जाना मरुस्थल में भागते हुए उस हिरन की तरह है जो उस पानी के लिये दौड़ता है, जो वास्तव में पानी ही नहीं है। उसकी वह दौड़ सिद्ध कर देगी कि तुमने प्यास बढ़ाई है, प्यास बुझाई नहीं।

मटेरियलिज्म अर्थात् दुनिया का बाजार यह कहता है कि अपनी आवश्यकता को सीमित करने का विचार तो मानव जाति का विकास रोकता है पर यह डिमान्ड एण्ड सप्लाय का शाश्वत तथ्य है। परन्तु आवश्यकता कम रखने का सिद्धान्त इसे कहाँ मना करता है। आवश्यकता की आपूर्ति के लिये कतई मनाही नहीं है पर जब हमें पता है कि "अल्टीमेट रिक्वायरमेन्ट दो गज जमीन है" तो फिर अन्धी दौड़ में हर कोई क्यों लगा है? उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद क्यों? इस थोथे महावाक्य के पीछे डिटर्जेन्ट बेचने वाले का बाजारवाद छिपा है। बाजार आपका इमोशनल एन्केशमेन्ट चाहता है।

प्रकृति का हर अंग न तो प्रतिस्पर्धा करता है न प्रतिघात ही करता है। एक पेड़ ने कभी नहीं चाहा कि बगल का पेड़ उससे ऊँचा न हो। बड़ी नदियाँ छोटी नदियों से कहती हैं आओ हम साथ मिल कर चलते हैं अपने उस गन्तव्य सागर की ओर। पवन कहती है आओ हम  खुशबुएँ लेकर चलें और संसार को सुगन्धमय बनाते हैं। सारे ग्रह उपग्रह अपने सूरज के परिवार में जुड़े है अपने अपने संयम से। कोई भी अतिक्रमण नहीं करता। पंछी आज सुबह उड़ेगा और जब घोसले में लौटेगा तब उसके अपने संग कोई संग्रह नहीं होगा। कल वह फिर अपनी भूख के अनुसार फिर अपना पेट भर लेगा।

हम न वक्त की चाल रोक सकते है, न शरीर की यात्रा और न ही जन्म और मृत्यु के क्रम को ही। विज्ञान ने हमें सुख तो कई दिये हैं पर संतोष नही। उल्टे हमें तेज और तेज दौड़ना सिखा दिया। जीवन तमाम आवश्यकताओं से भरा पड़ा है पर इसकी आपूर्ति के बीच संतोष तक सीमित रहे तो ही बेहतर होगा।

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।     ।।श्रीमद्भगवद्गीता।।

इतनी वस्तुएँ तो हमने आज प्राप्त कर ली इससे अपने मनोरथ को प्राप्त कर लेंगे।

"थोड़ा है थोड़े की ही जरूरत है, जिन्दगी खूबसूरत है।"


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प्रेम पूर्णता ही में है

क्या एक दिन का प्रेम 'प्रेम' है ?, तो क्या दिन गया तो प्रेम गया ?, लव इज गॉड तो क्या बन्धन टूटते ही गॉड..? नहीं प्रेम है ही नहीं यह। प्रेम के लिये शास्त्र चाहिये ? अवसर चाहिये ? या कि कुछ और ? यदि ऐसे प्रश्न खड़े हों तो जरूर हम से कहीं चूक हो रही है।

प्रेम करते हो तो थोड़ा या अधिक नहीं होता। प्रेम का परिमाण भी नहीं हो सकता। प्रेम करते हो तो बस प्रेम करते हो। जिस व्यक्ति से प्रेम करते हो उसे सम्पूर्ण रूप से स्वीकारते भी हो, उसमें ऐसा नहीं हो सकता है कि अमुक बात ठीक है इसलिये ही प्रेम करते हो। यदि आंशिक रूप से स्वीकारते हो तो "प्रेम" नही कोई और नाम ही दे देना।

प्रेम करो तो दूध और पानी के मिलन सा, मछली और पानी जैसा, जल से कमल जैसा, फूल से गन्ध जैसा। बस गड्ड-मड्ड हो कर। अपनी कामना, यहाँ तक कि चाहना भी प्रेमी पर आरोपित नहीं की जा सकती। "प्रेम नैसर्गिक एकत्व का पर्याय है। इसलिये प्रेम करो तो बस प्रेम करो। प्रेम में तर्क नहीं तमीज़ चाहिये। प्रेम में बस प्रवेश का मार्ग है, इसमें एक्जिट नहीं है। यदि एक्जिट हो गया तो वह प्रेम नहीं है। इसे अपनी सुविधा से कुछ और नाम दे लेना। प्रेम आवेग, आवेश, नशा अथवा अन्धत्व तो कतई नहीं है। इनमें से कोई एक भी लक्षण दिखाई दे तो वह प्रेम नहीं है। प्रेम बन्धन और मुक्ति दोनों नहीं है क्योंकि इसमें परिधि अथवा सीमा नहीं है इसलिये बन्धन का प्रश्न ही नहीं है। प्रेम अपने आत्मिक आनन्द से सीधा सीधा जुड़ा है इसलिये प्रेमी और प्रिय आत्मानुभूति से सीधे अद्वैत ही हो जाते हैं। अद्वैत में दूसरा होने का स्थान नहीं है।

लोग प्रेम की परिभाषा में जीवन खपा देते है जबकि कुछ लोग ऐसा प्रेम करते हैं कि उनका नाम ले कर प्रेम का परिचय देते हैं। इसलिये प्रेम में पड़ोगे तो वह आत्मानुभूति में आ जावेगा, जान जाओगे प्रेम क्या होता है। गुड़ की मिठास पोथियों से नहीं चखने से पता होगी। क्या तुमने चखा नहीं है ? अपने व्यसन के लिये यदि मैने फूल को डाली से तोड़ा नहीं है तो मैं फूल से प्रेम करता हूँ क्योंकि मैं उसके सौन्दर्य से, सुवास से, उसकी वहाँ उपस्थिति से और उसके जीवन से प्रेम करता हूँ।

"प्रेम करो तो विशुद्ध, विशद प्रेम करो।"


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मन की शक्ति और संकल्प

कलाकार, कवि, लेखक अपने सृजन के समय हमेशा अकेला होता है। लेकिन इस अकेलेपन में वह अपनी कल्पना, घटना के देश, काल और परिस्थिती में एकात्म भाव प्राप्त कर लेता है।

शिल्पकार के हाथ में हम केवल छैनी हथौड़ा देखते हैं, उसका शारिरिक श्रम देखते हैं, आड़ी तिरछी, हलकी भारी चोंट देखते हैं और उस पत्थर का उलटता पलटता देखते हैं लेकिन हमें वह दिखाई नहीं देता जिससे वह पत्थर के भीतर जा कर इच्छित आकार ढूँढ कर लाता है। उसके उस ढूँढते हुए मन को हम नहीं देख पाते। कवि, लेखक कलम उठाता है, लिखता है तो कागज, कलम और उसकी भाव भंगिमाओं तक ही हम देख पाते हैं परन्तु उसके मन में उठती गिरती संकल्पनाओं को हम देख नहीं पाते। एक कुम्हार मिट्टी का लौंदा उठाता है, चाक पर रखता है, चाक घुमाता है। उसके हाथों को कोई अदृश्य अनुदेश मिलते हैं और मिट्टी आकार लेने लगती है। ये अनुदेश कुम्हार के मन में बने आकार का प्रतिरूप लेने लगता है। चाहे वह घड़ा हो, चिलम हो या गमला हो। यह बात तो तय है कि आदमी का मन दूर दूर कहीं जाता है और बिना अपनी आँख उसके साथ भेजे भी वहाँ देख कर आ जाता है। सृजन के लिये फिर एक संकल्प करता है और एक कृति का जन्म होता है।

वेद कहता है-

यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति। दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१॥

अर्थ:- जो मन जागते हुए मनुष्य से बहुत दूर तक चला जाता है, वही द्युतिमान् मन सुषुप्ति अवस्था में होते हुए मनुष्य के समीप आकर लीन हो जाता है तथा जो दूरतक जाने वाला और जो प्रकाशमान स्रोत आदि इन्द्रियों को ज्योति देने वाला है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

स्पष्ट है कि हिमालय का विहंगम चित्र कैनवास पर उतारने के पूर्व मन वहाँ संकल्पना में जाता है और तब कलाकार उसका प्रतिरूप कैनवास पर उकेरता है। शिल्पी फूल पत्तियों का शिल्प तैयार करने के पूर्व मन को वहाँ आकार ढूँढने भेजता है और उसका डुप्लीकेट पत्थर में से ढूँढ लाता है। कवि परकाया में प्रवेश करता है। अगर पुरुष नायक की तरह लिखता है और नायिका का सौंदर्य चित्रण करता है तो अपने मन के माध्यम से उस देश, काल, परिस्थिति में तादात्म्य स्थापित करता है और ऐसा शब्द-चित्र तैयार करता है कि पढ़ने वाला पाठक यह समझ नहीं पाता है कि यह सब उसे कोई बता रहा है या वह साक्षात् स्वयं देख रहा है।

यह जो मन है न, यह अद्भुत शक्ति और सामर्थ्य वाला है। विचार कर देखो हम आज वैसे ही हैं जैसा जैसा मन ने चाहा है। जिसने अपने मन को जो दिशा दी, जो संकल्प लिये हमारे कृतित्व और व्यक्तित्व उसी दिशा में चल पड़े।

"अपने शक्तिशाली मन को शुभसंकल्प प्रदान करें।"


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मन में लगी फाँस

काँटे पैरों में लग जाए तो निकाल दोगे पर उनकी नोंके टूट कर वहीं रह जाए तो वे 'कीलें' बन कर शरीर का हिस्सा बन जाती है। अब वे सफ़र के अलावा भी चिर संगी हो गईं हैं। पहले किसी और साबुत काँटे से यह फाँस निकल सकती थी पर अब निकालना है तो इसे अब आपरेशन कर के निकालना पड़ेगी।

तुम्हारे लिये सब तरफ राजपथ या पेरिस की तरह काँच की सड़क नहीं बिछी पड़ी है। यह मत सोच लेना कि सुख ही सुख आवेंगे, दुःखों से बचे रहोगे। दिन है तो रात भी है, प्रकाश है तो अन्धकार भी है, उल्लास है तो क्षोभ भी है।

जिन्दगी एक सफर है। यह सफर पहली से अन्तिम साँस के बीच लगातार चलते रहने का है। बिना चले रहा नहीं जा सकता। यहाँ रास्ते में कुछ फूल भी हैं, पर काँटे अधिक हैं।

आदमी तो आखिर आदमी ही है। सफ़र जिंदगी है काँटे दुःख है, उसके आस-पास दुनिया के रिश्ते ही रिश्ते हैं। कुछ भले रिश्ते हैं पर कुछ रिश्ते जिन्दगी की राह में काँटे बिखेरते रहते हैं।

गोस्वामी जी ने तो रामकथा लिखने के आरम्भ में दोनों रिश्तों को प्रणाम किया है-

"बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना।।"

"उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं।।

सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू।।"

कुछ काँटे पैर में चुभ कर निकल जाते हैं पर टूटी हुई फाँसें भीतर घर कर जाती हैं। ये फाँसें पड़ी पड़ी 'कील' बन जाती है। चलते-चलते ऊँची नीची जगहें आती है तो पाँव में पड़ी 'कील' दर्द करने लगती है उसी तरह विषमताओं में कष्ट उभर आते हैं।

लेकिन एक स्थित इससे भी विचित्र है। काँटा लग जाने पर जो कष्ट होता है वह तो ठीक है लेकिन जब काँटा लगा ही नहीं है तब उसकी आशंका में जीना उधार का दुःख है। वह दुःख जो अभी दुःख आया ही नहीं है उसके संशय को मन तक गहरा ले जाना स्वयं के साथ अन्याय है और इसके लिए कोई दूसरा जिम्मेदार नहीं है। "संशयात्मा विनश्यति"।

हर हाल में चाहे जो भी हो यह समझ लो कि - "संसार में कई दुःख हैं पर उन्हें मन की फाँस मत बनने दो।"


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जीवन सवाँरें

उस बड़े कुम्हार का चाक चल रहा है। हम इसे चलना कहते हैं असल में तो चाक घूम रहा है। सदा से घूम रहा है। घूमता ही रहेगा। हम सुबह घूमने जाते हैं तो वास्तव में हम घूमते नहीं है वहाँ चलते हैं। परन्तु इन दोनों में एक बात तो पक्की है कि हम जहाँ से चलना शुरू किये थे वहीं फिर लौट कर आते हैं।

इस जीवन के चाक पर चढ़े हम भी घूम रहे हैं। तुम भी घूम रहे हो, सभी घूम रहे हैं अर्थात् चल रहे हैं। सम्पूर्ण प्रकृति चल रही है, आदमी चल रहा है, जीव जन्तु चल रहे हैं। पेड़ अंकुरण से चल कर आया है और बढ़ता जा रहा है, नदी अपने उद्गम से चल कर आयी है और समुद्र की ओर मुँह कर के बह रही है, आज सुबह दिन भी रात के गर्भ से निकल कर आया है और अस्ताचल की ओर चल रहा है।

हम सब उस सबसे बड़े चाक चलाने वाले कुम्हार की चाक पर चढ़े हैं और चल रहे हैं, चलते ही जा रहे हैं। भूख प्यास ले कर चल रहे हैं, नींद और जाग ले कर चल रहे हैं, कर्म और धर्म लाद कर चल रहे हैं। इनमें से  कोई कोई तो जीवन को सिर पर ढो कर चल रहे हैं। घर से चल कर फिर घर लौट रहे हैं।

तो सुनो! चलाने वाला कोई भी हो, तुम्हें चलना है यह पक्का है। चलना एक अभिक्रिया है। तुम  खुद को चाक पर चढ़ी हुई मिट्टी की तरह जान लो। यह अच्छी तरह समझ लो कि तुम्हें गलना है, कुम्हार की चेतना और उसकी उँगलियों के इशारों से ढलना है, फिर धूप में बैठ कर अपनी संचित नमी को आलस्य की तरह छोड़ना है और फिर अपने आकार को बरकरार रखने के लिये तपना है। अगर यह सब नहीं हो सका तो कुम्हार तुम्हें वापस उसी मिट्टी में डाल देगा पूरी प्रक्रिया दोहराने के लिये अन्यथा तुम्हें मटका, सुराही, दीपक जैसा कोई नाम नहीं मिलेगा। तुम अगर ठीक बन गये तो वही कुम्हार रंगों से खूबसूरत बना देगा। तुम खुद को भले नहीं देख पाओ यह जगत तुम्हें बड़े प्यार से देखेगा, अपने माथे पर बिठा लेगा। मिट्टी से चल कर आज तक के आकार में आने का नाम ही संस्कार है। बिना संस्कार के कोई अच्छा आकार नहीं मिल सकता। बिना समिधा के हवन नहीं होते। समिधा पुरुषार्थ है, आहुतियाँ कर्म है, करते रहना धर्म है। चलना ही अभिक्रिया है।

"तो क्या तुम तैयार हो इस सम्पूर्ण अभिक्रिया से सहर्ष गुजरने के लिये?"


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मेरा परिवार समग्र है

परिवार वृक्ष की तरह की एक नैसर्गिक प्रणाली है। इसे समझने के लिये हमें शुरू से आखिर तक देखना होगा।

वृक्ष एक बीज का व्यवस्थित विस्तार है। वह बीज अपने वंश के एक वृक्ष से आया है। वह अपने समस्त गुण-अवगुण, कर्म-अकर्म, अवस्था-व्यवस्था, रूप-अरूप आदि कई प्रतिमान साथ में ले कर चला है। जब वह जमीन में पड़ेगा, अंकुरित और विकसित होगा तो अपने पूर्वजों की तरह का स्वरूप को प्राप्त करेगा। साथ ही यह भी सच है कि चीड़ हिमालय पर उगता तो ठीक था वह मरुस्थल में उगा तो क्या कर पाएगा ? बबूल में गुलाब जैसे फूल नहीं आ सकेंगे। करेले की जड़ में गन्ने का रस डाला जावे तो भी वह अपनी मूल कड़वाहट को नहीं छोड़ पाएगा।

यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात हमें विशेष नोट करनी है कि "सम्पूर्ण पेड़ अपने अवयवों की एक दूसरे पर आपसी निर्भरता बनी हुई है।" जड़ वृक्ष को जमीन से जोड़ती है और भोजन-पानी देती है। जमीन के ऊपर तने से काट दें तो जड़ें जमीन में पड़ी पड़ी सड़ जावेगी। तना बाकियों को ले कर खड़ा है और भोजन प्रवाह का चेनल है।  शाखाएँ पत्तियों, फूलों, फलों को पकड़े खड़ी हैं और जीवन रूपी रस का संचार भी करती है। पत्तियाँ सब के लिये भोजन बनाती हैं और अन्त में फल पैदा होता है। फल में अपनी वंशावली के बीज अगली परिवार वृद्धि के लिये होते हैं। हरेक अंग स्वतन्त्र रूप से अपना अपना कार्य करता है।

अन्त में फल में बैठा बीज अणु से भी महीन अगली पीढ़ी के वृक्ष को अपने गर्भ में छिपा कर निकल पड़ता है।

इस प्रणाली को परिवार रूपी वृक्ष से जोड़ कर देखते चलें।

“स्वे स्वे कर्मणा संसिद्धि लभते नरः।“

जो जहाँ है वहीं से अपने अपने नियत कर्म करता रहे तो परिवार संपूजित यज्ञ हो जावेगा। जो जो इस परिवार के जीवन को सम्बल देते हैं वे हमारे ही परिवार के सदस्य हैं, मित्र हैं। इस एक वृक्ष का होना हर अंग का, हर सदस्य का अपने अपने स्थान पर से किये गये समग्र प्रयास का ही फल है।

"अपने समग्र परिवार में अपना योगदान देने को तत्पर रहें।"


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मुझे खुशी है

मेरी कुछ आदते बड़ी अजीब सी हैं। एक दिन मैं गडरिये की तरह हुर्र हुर्र करता हुआ यों ही एक उबड़ खाबड़ पहाड़ी से गुजर गया। मुझे अच्छा लगा तो फिर रोज रोज वैसे ही उसी जगह से गुजरने लगा मैंने देखा कि रोज रोज उसी राह से गुजरने से मेरी अपनी एक पगडण्डी तैयार हो गई है। मेरा तो यही राजपथ है। इसलिये भी कि इस पर चल कर मेरा अन्य लोगों पर ध्यान नहीं जाता, मैं खुद अच्छी तरह से देख पाता हूँ। आस पास मौजूद पेड़ पौधों को, कलरव करते पंछियों को, पोखरों के किनारे टिटहरियों को टिटियाते हुए देखता हूँ, सुनता हूँ। बड़ा सुकून महसूस होता है मुझे। तब से मुझे राजपथ से अधिक पगडण्डियाँ अच्छी लगती है।

मैं बहुत से दोस्तों को थोड़ा थोड़ा समय देने के बजाय अपने थोड़े से दोस्तों को बहुत सारा समय देना चाहता हूँ। मैं किसी में प्रेम को ढूँढना नहीं चाहता वरन् प्रेममय हो कर उस में ही खो जाना चाहता हूँ।

मेरे जीवन में कुछ वाक्य ऐसे सुनने को मिले जो वास्तव में बहुत छोटे-छोटे से थे पर उन्होंने मेरी जिन्दगी को अहम मोड़ दिये हैं।

राह के पत्थर से ठोंकर लगने पर मैं पत्थर पर गुस्सा करने के बजाय अपनी लापरवाहियों से रूबरू होना पसन्द करता हूँ। मेरी ठोंकर से आहत होने पर भी पत्थर के उस मौन रहने को प्रणाम करता हूँ। वह राह में चलने के लिये मुझे सावधानी बरतने का पाठ पढ़ाता है। इस तरह की किसी घटना का स्मरण कर के मैं रोमांचित हो जाता हूँ और फिर मैं उसके प्रति कृतज्ञ हो जाता हूँ।

मैं अपनी चलती हुई कलम को देख कर प्रसन्न हूँ कि यह अपने उगले हुए रंग से मेरी बातों को, भावों को, विचारों को कागज के सीने पर लिख डालती है। कलम युगों युगों से लिखती चली आ रही है। विलक्षण है कलम जो स्वयं को छोड़ कर सब कुछ लिख रही है, लिखती ही जा रही है। तलवार से तेज धार है इसकी। यह प्रेमी को पिघला सकती है, रोतों को हँसा सकती है। मेरी यह कलम आपके और मेरे बीच सेतु का काम कर रही है। मैं इसका भी कृतज्ञ हूँ।

"खुशियाँ यहाँ, वहाँ, कहीं भी मिल सकती है, तलाश जारी रहे।"

 


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जरा अपनी भी सुनो

किसी शायर ने कहा है--

ख़ुद ही बनाते हैं हम पेचीदा ज़िन्दगी को

वर्ना तो जीने के नुस्ख़े आसान बहुत हैं।

पानी का एक जीव होता है "जोंक"। एक तरह का पेरासाइट जो जानवरों की चमड़ी से चिपक कर खून चूसता है। जमीन के रास्ते राजपथ होंगे, गडार होगी, पगडंडियाँ होंगी, ऊँचे नीचे होंगे, टेढ़े मेढ़े होंगे पर एकदम सीधे नहीं होंगे लेकिन पानी में रास्ते सीधे हैं, सपाट हैं। जोंक इस पानी में भी सीधी नहीं चलती। रामायण की पात्र मंथरा ऐसी ही थी। उसके इस स्वभाव ने एक विचित्र चरित्र गढ़ दिया। पूरी रामचरितमानस में उसके जैसा अन्य कोई पात्र नहीं। वह मात्र एक परिचारिका थी। पर उसके इस चरित्र ने एक सशक्त राजतंत्र की चूलें हिला कर रख दी, एक परम आदर्श परिवार की इकाइयों को खण्ड खण्ड करने का सारा ताम-झाम इकट्ठा कर दिया। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। विदूषी महारानी कैकेयी ने मंथरा की कही बातों पर विश्वास कर लिया। कैकेयी का चरित्र ममता, त्याग, कूटनीति, धर्मनीति की गहनता का चरम था इसके बावजूद रानी भरम में आ गई।

हमारा मन और बुद्धि एक लय में न हो तो ऐसा हो जाना संभव है। हमारा पेचीदा मन संकल्पनाओं, सम्भावनाओं, संवेदनाओं का अपरिमित संसार ले कर चलता है। जैसे रथ का सारथि लगाम के माध्यम से घोड़ों को नियन्त्रित करता है उसी तरह हमारी बुद्धि तर्क, विश्लेष्ण, संस्लेषण और चुनाव के माध्यम से मन को ताकत और दिशा देती है। बोल चाल की भाषा में हम इसे सूझ बूझ से काम लेना कहते हैं।

हमारे इस मानव शरीर में देव भी बसते हैं और दानव भी। दानव सारे विस्फोटक हैं परन्तु इन्हें बाहर की आग सुर्रियों से ही पहुँचती है। कहते है पराखे में एक सुर्री होती है। आग इसी के माध्यम से पटाखे में पहुँचती है और विस्फोट भी तभी होता है।

"अपने अन्तर की आवाजें ध्यान से सुनो तब कोई निश्चय करो।"


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बाहर भीतर का रूपान्तरण

कुछ बच्चे खाली खेतों के मैदान में खेल रहे थे। अलमस्त, स्वाभाविक, निश्चिन्त हो कर। रास्ते से नौटंकी की नाटक खेलने वालों की एक बैलगाड़ी गुजरी। रास्ते में उसमें से कुछ सामान गिर गया। गाड़ी आगे निकल गई। उन सामानों में एक मुकुट, एक गदा, कुछ तलवारें और कुछ धनुष-बाण थे। ये माल असबाब मिलते ही बच्चों का खेल बदल गया। किसी ने क्या, तो किसी ने क्या उठा लिया।

एक बच्चे ने मुकुट पहन लिया। वह देखते ही देखते साधारण प्रजा से राजा हो गया। वे बच्चे जिनके हाथ में रबर और कपड़े की गेंदें थी उन्होंने इन्हें फेंक कर तीर, तलवार और गदा हाथ में थाम ली।

अभी तक जिन खिलौनों से खेल रहे थे वे उन्हें गुदगुदा रहे थे। अब जिसने जो सामान उठा लिया उसके अनुसार बड़ा परिवर्तन देखा गया। शस्त्रों ने खुद के गुणधर्मों और उनकी पहचान के अनुसार उन बच्चों पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लिया। देखते ही देखते कुछ ही पलों में बच्चों के आचरण बदल गए।

हमारा बाहरी संसार हमारे भीतरी संसार को बदल सकता है। हमारे व्यवहार, आचरण, जीवन शैली और हमारा व्यक्तित्व बदल सकता है। पहले बाहर का वातावरण हमारे भीतर को बदलता है फिर हमारा भीतर हमारे चारों ओर वही पसन्द करता है। एक कहानी सुनी थी कि कुछ सियार बस्ती से एक बच्चे को उठा कर ले गये। उसका लालन पालन किया। बच्चा बड़ा हुआ। उसकी भाषा में केवल दो अक्षर का एक शब्द था 'हू-हू'। वह सियारों की तरह चारों हाथ पैरों से चलता था। याने बाहर का संसार भीतर गया और भीतर उसके अनुरूप बाहर का वैसा ही संसार खड़ा हो गया। लोहा जिसके संग रहता है उसके जैसा ही काम करता है।

"एक लोहा पूजा में राखत इक घर बधिक परो।"


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बड़ा बनना आसान नहीं

एक होता है दहीं बड़ा। इस बड़े के बड़ा बनने की यात्रा कौतुहल भरी है। क्रमशः उड़द के दानों को पीस कर दाल बनी, छिलके अलग किए गए, उसे गलाया गया इतना कि जब तक खमीर न उठ जाए। फिर एक बार और पीसा गया, टिकिया बना कर उबलते तैल में तला गया वहाँ से निकाल कर एकदम ठन्डे पानी में डाला गया। अब बाहर निकल कर उस पर दहीं और चटनी डाली गई। तब जाकर आपको यह बड़ा दिखा है।

यह प्रक्रिया बड़ा बनाने की आपको रेसिपी नहीं बताई जा रही है बल्कि यह कर्म और क्रिया के अद्भुत सम्मिश्रण का संवाद है। दलहन से लेकर बड़े बनने तक कितनी लम्बी और कठिन-कठिन वेदनाओं से, तप से, धैर्य से और क्रियाओं से उसे गुजरना पड़ा है। बनने के बाद लोग इसे बड़ा कहते है। इस बिम्ब और आधार को व्यक्तित्व निर्माण के सापेक्ष में देखें।

हर कामयाब आदमी का जीवन ऐसे ही कठिन कर्म और क्रियाओं से भरा होता है। इसका संस्कार देने वाला रसोइये की तरह गुरु और माता-पिता है। दाल की तरह आदमी का जीवन है, कृमिक क्रिया तप है और उत्पाद व्यक्तित्व है। एक बात और, साध्य और साधन पता न हो तो साधक कैसा। हर कामयाब आदमी अपनी तरह का पहला नहीं है। उसका आदर्श व्यक्तित्व जाने अनजाने में कोई है, प्रणेता कोई है। उसकी कर्म की, तप की, सृजन की अपनी स्वयं की शैली होती है जो बाद में उसकी पहचान बन जाती है।

इसलिये स्पर्धा, निष्ठा, चुनौती, श्रम और साधना के बीज लेकर अपनी फसल खुद खड़ी करो। दिशा अपने विवेक से चुनो। हर व्यक्ति अपने आप में मौलिक है इसलिये यह पक्का है कि सृजन भी मौलिक होगा। नकल करने वाले लोग असली नहीं हो सकते। ध्यान रखो बिना मेहनत के फसल नहीं खरपतवार उगते हैं।

"महान जीवन का मार्ग कभी सुगम नहीं होता।"


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प्रेम अद्वैत की उपासना है

प्रेम द्वैत से अद्वैत की ओर जाने का मार्ग है। एकत्व की यात्रा है। अलगाव का बहिष्कार है। समस्त के प्रति समरसता का संचारीभाव है। किसी अन्य में हो रही पीड़ा की स्वानुभूति करता है प्रेमी।

धूप में, लू में जल रहे नन्हे पौधे की जलन अगर तुम्हें भी जलाने लगती है और तुम उसके समाधान में दौड़ते फिर रहे हो तब समझो तुम्हें पौधे से प्रेम हो गया है क्योंकि उस घड़ी तुममें और पौधे से द्वैत भाव समाप्त हो चुका है। प्यास से व्याकुल हिरण जंगल में पानी की तलाश मैं दौड़ता है और उसे देख कर तुम उतने ही व्याकुल हो रहे हो तो तुम उसे अलग समझना ही छोड़ देते हो। उसकी पीड़ा तुम्हारी अपनी पीड़ा हो जाती है तब तुम्हारा प्रेम और भी प्रगाढ़ हो जाता है।

तुम शायद जानते ही नहीं हो या तुम्हारा ध्यान उस ओर कभी नहीं गया कि प्रकृति और परमात्मा तुमसे कितना प्रेम करता है? तुम्हारी भूख का अहसास करके इन्होंने तुम्हारे लिये आहार तैयार किये हैं। तुम्हें प्यास लगेगी इसलिये समुन्दर से उठा कर बादल भेजे हैं, नदियाँ बहाई हैं, धरती के उदर में पानी भरा है। यह आहार और पानी तुम्हारे भीतर जा कर तुमसे भिन्न होने का, द्वैत होने का भाव स्वयं ही समाप्त कर देगा, तुमसे एकाकार कर लेगा। सुबह सुबह से आ कर सूरज अपनी ऊर्जा से तुम्हें सराबोर कर देता है और तुम अपनी दैनन्दिनी पूरी कर पाते हो, तुम्हें पता ही नहीं चलता कि कौन तुम में मिल कर अद्वैत का भाव समाप्त कर देता है और तुममें एकात्म हो कर हर क्रिया प्रक्रिया में शामिल हो जाता है। यह प्रकृति और परमात्मा का तुम्हारे प्रति प्रेम ही है। वह तुमसे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अभिन्न है।

"प्रेम संसार भर से द्वैत का भाव तिरोहित करने में समर्थ है।"


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भरोसा भारी है

क्या आप जानते हैं बूढ़ा लकड़ी की बेजान लाठी लेकर उसके सहारे से क्यों चलता है? इसके दो कारण समझ में आते हैं।

पहला कारण तो यह है कि उसके आसपास ऐसा कोई और मौजूद नहीं है जो उसके चलने में सहायक हो। दूसरा कारण यह है कि वह लाठी को टेक टेक कर चलता रहता है और उस पर पूरा भरोसा भी करता है कि यह लाठी उसे कम से कम गिरने-फिसलने नहीं देगी। बड़े मजे की बात यह है कि बूढ़ा लाठी को लेकर चल रहा है, न कि लाठी बूढ़े को ले कर चल रही है। पर बूढ़े को आभास होता है कि वह लाठी उसे हर खतरे से बचा कर अपनी मंजिल तक ले जाएगी, गिरने पड़ने से बचाएगी। उसी तरह जब हमें नदी के पार जाना है तो मल्लाह और नाव दोनों पर भरोसा करना ही पड़ेगा। हवाई जहाज में बैठने से पहले पायलट और हवाई जहाज दोनों पर भरोसा करना ही पड़ेगा। ऑपरेशन टेबल पर पहुँचने के साथ ही डॉ और उसके हुनर-इल्म पर भरोसा करना होता ही है, इतना भरोसा कि अपने किसी भी सगे पर भी नहीं किया होगा। हमारे जीवन में किसी न किसी रूप में कदम कदम पर हम भरोसा ढूँढते रहते हैं।

यही भरोसा ले कर सद्गुरू के चरणों में जावें और खुद को उसके बताए गए मार्ग पर चलना शुरू कर दो। भरोसा इतना पक्का होना चाहिये सद्गुरु पर कि वह हमारी नैया पार लगा देगा। एक बार भरोसा कर के देखो उसकी गुरुतापर, उसमें उपलब्ध गुरु सत्ता पर, उसकी उर्मियों में बसी चेतना पर। फिर हमने अगर छोड़ भी दिया तो वह हमें पकड़े रहेगा क्योंकि गुरू एक व्यक्ति नहीं वह एक चेतन सत्ता है। जीव जब अपनी सुधि खोने लगता है तब तो गुरू का काम और महत्वपूर्ण हो जाता है। वही मार्ग और मंजिल तक ले जाता है। जैसे कि ईश्वर की सत्ता कभी प्रत्यक्ष नहीं दीखती पर धृति अथवा धर्म के रूप में सृष्टि का कण कण उस परमात्मा के कड़े अनुशासन में चलता है, चाहे जानो या अनजान ही बने रहो।

"इसलिये भरोसा करो और चलो उस ओर अपने कल्याण के लिये।"


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परमात्मा का अनुशीलन

क्या तुमने कभी किसी फूल के परागकणों को तितलियों का आह्वान करते देखा है? क्या तुमने मन्दिर के शिखर पर उस ध्वज को हवा के परों पर थिरकते देखा है? क्या तुमने गुनगुन करती मधुपरियों के शिल्प में विश्वकर्मा के सृजन का आभास किया है? क्या तुमने कभी दीवार पर चढ़ती चीटियों के पदचाप में कर्मवीरा की आहट सुनी है? क्या रुई जैसे हलके फुलके उड़ते फिरते बादलों को हजारों मील चल कर लाखों टन पानी ढोते देखा है? और फिर इन्हीं बादलों को सिंहनाद करते हुए पर्वतों, नगरों, वनस्पतियों का अभिषेक करते देखा है? क्या कभी किसी बीज के गर्भ से सफेद झक्क अंकुरण को झाँकते देखा है? क्या तुम जानते हो कि पानी में शीतलता क्यों है और वह सबसे निचला तल ढूँढता क्यों है?  अग्नि जलाती क्यों है? धरती, आकाश, अगन, पवन, पानी जैसे तत्व सख्ती से अनुशासन में रह कर अपने अपने धर्म का पालन क्यों करते हैं? प्रकृति के अधिकतर व्यवहार में हम कैसे होता है यह तो जानते हैं पर यह नहीं जानते कि इन नियमों को बना कर उनको पालन कौन करवाता है?

ये शबनम फूल तारे चाँदनी में अक्स किस का है?

सुनहरी धूप छाँव रौशनी में अक्स किस का है?

ये ढलती शाम ये क़ौस-ए-क़ुज़ह की रंग-आमेज़ी

ये नीले आसमाँ की दिलकशी में अक्स किस का है?

हाँ ये सारी क्रियाएँ और कर्म केवल संकेत मात्र के लिये गिनवाए गये हैं जबकि प्रकृति का अणु-अणु ऐसा ही कुछ न कुछ हर घड़ी हर पल कर रहा है। न तुमने कभी ध्यान से देखा, न तुम्हारे कान इन्हें सुन पाये, न ही तुम कोई संवेदना ही जागी हम पर इनके द्वारा किये गए अनन्त उपकारों के प्रति। ये सब करते हुए भी कभी थके नहीं, रुके नहीं, झुके नहीं।

देखो! तुम बस दौड़ रहे हो पर इस दौड़ में वे अनमोल पल छोड़ रहे हो। प्रकृति गा रही है, नाच रही है, तप रही है, खप रही है फिर भी हम सब के लिये विपुल आहार तैयार कर रही है, खेतों में, खलिहानों में, उपवनों में, चौगानों में। कोई तो है जो जानता है तुम्हारी भूख को, तुम्हारी प्यास को और शायद तुम्हारी हर छोटी बड़ी सभी जरूरतों को।

ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचिज्जजगत्यां जगत्।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।।

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् | हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ।।9/10।।

हम यह जरूर महसूस करें कि

प्रकृति माँ के, परमपिता परमेश्वर के इस उपकार को और उनके कृतज्ञ होवें।


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प्रार्थना के स्वर

दुःख की ऊपरी मंजिल है दर्द। दर्द एक संकेत है कि आप ज़िंदा है, यह आपकी महसूसियत है, आपके अन्तरतम को गहराइयों तक पहुँचने वाली संवेदना है। यह एक मेकेनिज्म है जो सीधे आपके शारारिक, मानसिक सिक्यूरिटी सिस्टम से जुड़ा होता है। उस अदृश्य सिस्टम से जो जीवित है, जो संवेदी है, जिसके पास केमिकल और मानसिक संसाधनों का ऐसा भण्डार है जो अपने दूत भेज कर डेमेज रिपेयर कर सकता है। हो सकता है कि आगे जा कर यह डेमेज हमारे शरीर ओर मानस को बीमार कर देता।

मानव ईश्वर की अनुपम कृति है, यूटिलिटी है। इस समस्त प्रक्रिया का एक आध्यात्मिक पहलू यह है कि हमारे दु:ख दर्द का सम्पूर्ण सिस्टम अपनी प्रार्थना के भाव सम्प्रेषण की संवाहिकाओं से सीधा जुड़ा होता है। समस्या एक टास्क है और संकेत है उन शिकायतों का, उन आशाओं-निराशाओं का जो मानव के व्यवहारिक जीवन की अंगभूत हैं। रोज-मर्रा के जीवन में हम ऐसे दुःख दर्दों से रूबरू होते ही रहते हैं परन्तु प्रार्थना के माध्यम से ये अपने इष्ट को संप्रेषित होती हैं। यह प्रार्थना एक ऐसा उपादान हैं जो आपको महसूस नहीं होने देती कि आप अकेले है। आपके साथ आपका इष्ट है जो आपकी आपसे अधिक चिन्ता करता है।

"आर्त पुकार जब प्रार्थना में सम्मिलित होती है तो वह दवा और दुआ बन कर लौटती है।"


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जिन्दगी तुम से पूछेगी

जिन्दगी कल तुमसे कुछ सवाल पूछ सकती है, हो सकता है उसे तुम कल इसका जवाब न दे पाओ। आज की इस सुबह कल के सवालों में से एक एक कर के जवाब देने निकल पड़ो वरना बहुत सारे सवालों का पहाड़ खड़ा हो जावेगा फिर शायद किसी एक का भी जवाब नहीं दे पाओगे। यह जरूरी नहीं है कि तुम सभी सवालों के उत्तर खोज लोगे पर यह उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि तुमने अपनी ओर से हर सवाल के उत्तर खोजने का प्रयास किया है कि नहीं? हो सकता है कि किसी सवाल का हल तुम्हारी अपनी क्षमता से भी परे हो, पर पूरी तसल्ली करो कि उसका हल करने की कोशिश तुमने प्राण पण से की है।

थोड़ी देर के लिये सोचो कि आज का यह दिन मेरी जिन्दगी का आखरी दिन हो सकता है परन्तु निश्चित रूप से यह भी मान लो कि आज की यह सुबह मेरी जिन्दगी की ही पहली सुबह है।

तुम्हें ऐसे जवाब खड़े करना है कि सवाल खुद गिरने लगें। सोचो कि उस महाप्रयाण के पूर्व तुम्हारे पल्ले में अधिक से अधिक तसल्ली बँधी हो। तुम्हारी जिन्दगी सिर्फ तुम्हीं से सवाल कर सकती है अन्य और किसी से नहीं। इसके हर सवाल का जवाब भी सिर्फ तुम्हें ही देना है। यहाँ उधार का आदमी काम नहीं आवेगा।

आज से, अभी से यह सोचना छोड़ दो कि लोग क्या कहेंगे? अपनी नाव की पतवार किसी और को क्यों पकड़ा रहे हो। अक्षम हो तो कोई बात नहीं पर सक्षम होते हुए भी ऐसा करते हो तो जिन्दगी तुम से, तुम्हारी बेचारगी से ही पूछेगी। थोड़ा पलट कर देखो; कहीं ऐसा तो नही है कि जिन्दगी की बेहतरी के लिये जो तुम कर सकते थे और नहीं किया। अगर कोई चूक हुई भी हो तो आगे से ऐसा कोई वाकिया फिर न दोहरोओ।

निश्चय करो कि "आज से मेरे सवालों के जवाब मेरे ही होना चाहिये।"


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जिन्दगी तुम से पूछेगी

इधर कुआँ उधर खाई बीच रहना सीख भाई। घट्टी के दो पाटों के बीच रहना है तो कील-मकड़ी के पास रहो, वरना पिसना पक्का है। नदी को बहना है तो दो किनारों के बीच से गुजरना है। गुलाब को खिलना है तो काँटों के बीच रहना ही है। पगडण्डियों को घने जंगल और टेढ़े मेढ़े स्थान के बीच से ही गुजरना है। हमारे शरीर में सबसे नर्म सी जबान को सबसे कठोर बत्तीस दाँतों के बीच रहना है।

भूत और भविष्य के बीच में वर्तमान को साध कर कर्म रत रहना जरूरी है। याद रखो पतझड़ और ग्रीष्म के बीच बसन्त उपस्थित होता है। जन्म और मृत्यु के बीच जीवन खड़ा रहता है। कलाकार द्वारा कलाकृति के निर्माण के क्षणों में अपने आप को कृति और कर्म के आनन्द में निमग्न रह कर कार्यरत रहना इस तथ्य का प्रमाण है।

फल की चिन्ता का अर्थ है भविष्य की चिन्ता और भविष्य की चिन्ता में रहने का अर्थ है वर्तमान को खोना, अपने नियत कर्म के प्रति उदासीन होना है। यह जानते हुए भी कि जो बीत गया वह पुनः लौटेगा नहीं फिर भी भूत काल के क्षणों में खोये रहने का मतलब है अपने वर्तमान को कर्म-शून्य रखना।

दो विपरीत ध्रुवों के बीच में सम-स्थित रहने का अर्थ है स्फूर्त जीवन का आनन्द वर्तमान के प्रत्येक क्षण में प्राप्त करना। सफलता और विफलता, ऊँच-नीच, सुख-दुःख, मान-अपमान, हानि-लाभ के बीच भी कर्म में स्थित रहना समत्व योग है।

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।

सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।। 2/48।। श्रीमद्भगवद्गीता।।


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खाली

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आईना देखो तो सही

आईना अपना कुछ नहीं बताता, तुम्हारा सच बोलता है। कभी कभी वह आभासी सच बोलता है जैसे कि बायें गाल पर लगे तिल को दायें गाल पर बताता है। तुम सामने रहते हो तो वह केवल तुम्हें बताता है और तुम्हारे हटने के बाद दूसरों को तुम्हारी कोई बात नहीं बताता है। आईना सच बोलता है पर चुगलखोर नहीं है। यह उम्मीद कभी मत करना कि तुम मैला परिधान पहने हुए हो तो वह साफ कर के बता देगा। तुम्हारी रोती शक्ल को आइना मुस्कुराता हुआ नहीं बता पाएगा। तुमने अगर मुखौटा पहन लिया तो तुम्हें अपनी असलियत को वह तो क्या कोई और भी नही बता पाएगा। तुम साफ साफ दिखो इसके लिये समय समय पर उस पर लगी गर्द को साफ करते रहना जरूरी है।

आईने में दिखा सच असल में वह रूप है जो लोगों को उस तरह दिखाई देगा। तुम्हारा सच है तुम्हारी अन्तरात्मा बताएगी। आईना तुम्हारे सिद्धान्त नही, आचरण और व्यवहार बताता है। आईना तुम्हारा इतिहास नहीं वर्तमान बताता है। उसके पास इतिहास होता तो वह तुम्हें तुम्हारा बचपन दिखा देता। वह रीयल टाइम कमेन्ट्री है। तुम्हारे आँसुओं से आईना गीला नहीं होगा। तुम्हारे आँसू तुम्हारे हैं।

तुम्हारे आसपास अथवा अँधेरे कमरे में वह मौन है पर तुम्हारे उजाले वह तुम्हें लौटा देता है। अपने वर्तमान काल का संज्ञान जानना हो तो आईने की साफगोई से सीखो। भविष्य भी वह नहीं दिखा सकता।

अपना आईना टूटने मत दो वरना तुम टुकड़े टुकड़े दिखाई दोगे। अपने खुद के सच से डर कर आईना देखना छोड़ मत देना वरना हो सकता है तुम फिक्टीशियस वर्ल्ड में जीते रहोगे। आईना तुम्हारा जितना स्पष्ट सच बताएगा उतना दुनिया में कोई नही बता सकता। तुम खुद भी खुद से झूँठ बोल लेते हो पर आईना नहीं।

आईना तुम्हारे लिये है, तुम आईने के लिये नहीं हो इसलिये “आईने में अपना सच देख कर अपने काम पर चल पड़ो।“


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चुनाव तुम्हें करना है

फर्ज करो की तुम में पंख लगे हैं, बताओ तुम्हें सोने का पिंजरा चाहिये या खुला खाली आसमान? पिंजरे में तुम्हारे लिये तैयार खाना पानी मिलता है। हो सकता है की पिंजरे का मालिक तुम्हारा परिचय बड़े बड़ों से करावे, तुम्हारे परिचय के साथ वह अपना रौबदाब भी बतावेगा। लेकिन दूसरी तरफ वहाँ आसमान में तुम्हारी अपनी अलग ही दुनिया है, रिश्तेदार हैं, प्रकृति ने तुम्हारे लिये ताजे व्यंजन परोस रखे हैं। तुम वहाँ सरोवर में छपाक छपाक करके नहा सकते हो। वहाँ छोटे बड़े पंखों वाले, कई तरह की मधुर बोली बोलने वाले और भी कुनबे हैं। वहाँ झरने गाते हैं रात दिन, वहाँ धूप भी है और सुहानी छाँव भी है, तिनकों और प्राकृतिक रेशों से बने वातानुकूलित नीड़ हैं। वहाँ तुम्हें प्रभात में ऊषा की अरुणिम आभा और ढलती शाम में परिन्दों से भरा आकाश उपलब्ध होता है। यहाँ पिंजरे की सलाखें तुम्हारे पंखो को अर्थहीन कर देंगी वहाँ पवन तुम्हें अपनी पीठ पर बिठा कर दुलारेगा। यहाँ कटोरियों में बासी पानी भरा है पर वहाँ तुम्हारे लिये बारिश की झिरमिराती बूँदें मिलेगी। और बहती नदी का ताजा नीर चौबीस घण्टे, सातों दिन तैयार है। यहाँ तुम्हें ये कंक्रीट के जंगल पर उड़ते हुए तुम्हें मकान की छतें, आग उगलती सड़कें और परकोटे नीचे दिखाई देंगे। पर वहाँ पेड़ों से झड़े पत्तों और नर्म नर्म घास के बिछौने मिलेंगे।

तुम्हें बस्ती के ऐशो आराम चाहिये या प्रकृति का अखूट वैभव। अब चुनाव तुम्हारा है।

कहीं तुम वह मछली तो नहीं हो जो नदी में बाढ़ के समय समुन्दर छोड़ कर तैरती हुई शहर में बने घाटों के किनारे पर आ गई हो? यहाँ पानी तो मीठा है पर संभवतः कुछ लोग काँटों में केंचुआ उलझा कर तुम्हें फँसाने की ताक में ही बैठे हैं। उलझ गई तो तुम्हारी इहलीला समाप्त भी हो सकती है। अगर इन से बच भी गई तो, तुम्हें पता नहीं है, लोग इस नदी को मोटरों में भर भर कर उलीच रहे हैं। एक दिन सारा पानी खत्म हो जावेगा। सूखने के बाद गीली रेत ही बचेगी तब बड़े बड़े डम्पर आ कर रेत भी भर ले जावेंगे। बिना पानी के तुम अपने अस्तिव को कायम कैसे रख सकोगी। अब यह चुनाव तुम्हारा है कि तुम्हें खारे पानी का अपना वह घर पसन्द है या मीठे पानी की वह अधमरी नदी? चुनाव तुम्हारा अपना है। कहाँ रहना चाहोगे? यहाँ कि वहाँ?

"क्या चाहिये? बस्ती का विश्राम या प्रकृति का विलास? चुनाव तुम्हें करना है"


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सिद्धार्थ से बुद्ध तक

दिशाएँ दस हैं। पथ कोई सीधे नहीं है। हर एक के जीवन में छोटे बड़े, आड़े-तिरछे मोड़ ही मोड़ है, दोराहे, तिराहे, चौराहे हैं। किसी के आगे बढ़ते हुए कदम दस दिशाओं में से किसी भी दिशा में मुड़ सकते हैं। हर मोड़ व्यक्ति को कहीं न कहीं पर ले जाता है। सीधा सादा मोड़ जीवन की दिशा तो बदलता है पर मार्ग नहीं बदलता। जीवन में परिवर्तन लाने वाले हर तिराहे, चौराहे पर बँटने वाले रास्ते में से एक का चुनाव करना अपने अपने विवेक, क्षमता और ध्येय पर निर्भर है। जीवन-रथ के पहिये कहीं रुकते नहीं है।

एक व्यक्ति यदि सन्यासी हो जाता है फिर अगर वह इस जगत में वापस लौटता है तो निर्लिप्तता का भाव लेकर लौटता है। सच मानें तो ऐसा लौटना ग्यारहवीं दिशा का 'एलीवेटेड यू टर्न' है। युवराज सिद्धार्थ के सामने भविष्य में राज्य का वैभव प्राप्त होना तय था लेकिन वे वीतरागी हो कर सन्यास की ओर मुड़ गये।

सन्यासी अक्सर युगान्तर के बाद युगबोध को प्राप्त होते हैं वे संसार की उठा पटक को छोड़ कर सन्यासी होते हैं पर भगवान बुद्ध सन्यास के उपरान्त लोक-कल्याण के हेतु से फिर संसार में लौटे। इतिहास गवाह है कि भगवान बुद्ध युगान्तर के बाद युगबोध को फिर प्राप्त हुए और पीड़ित संसार को बोधिसत्व की उपलब्धि हो गई। उनकी यह यात्रा पहले एक नगर से अरण्यक की ओर हुई फिर उस अरण्यक से एक अप्रतिम अभयारण्य की ओर। उनकी यह यात्रा भय से अभय की ओर की गई यात्रा थी। भय जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधियों का भय और अभय होने का अर्थ स्वयं मुक्ति ही है।

हम जानते हैं कि क्षोभित मन से छूटे संसार में निक्षेप के अतिरिक्त क्या मिल सकता है? परन्तु इस दशा में अगर दिशा बोध और दृढ़ निश्चय हो तो जीवन ही परिपूर्ण हो जाता है।

सम्बोधि का मार्ग शोर से शान्ति की ओर का मार्ग है, स्वयं के त्याग और तप से लोकोपकार का मार्ग है। भगवान बुद्ध के महाप्रयाण के पहले घटित हुआ था एक पावन महाप्रस्थान जो नव ज्योतिपुञ्ज लेकर संसार में लौटा और उस प्रकाश से जगत आलोकित हो गया। यह था युवराज सिद्धार्थ का व्यक्ति से चल कर भगवान बुद्ध होने का पथसंचलन।

"सन्यास का यह एक अनोखा अवतरण था"


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सभी आईना पहन लें

आओ सभी आईना पहन लें

मुझे मैं न दिखता मेरी आँख से ही

न तू देख पाया तेरी ही खुदी को

है सारा नगर देखता दूसरों को

किसी ने न देखा खुद में खुदी को।

अब हर गले में, टँगा आईना हो

नकली मुखौटे चलो सब उतारें

देखूँ मैं मुझको तेरे आईने में

जानें स्वयं को, स्वयं को पुकारें।

जगते में सपना है सोते में सपना

सपना हुआ ना कभी कोई अपना

ना यह सच, ना वो सच, जानें जरा

पहचाने मिथ्या ओ निज रूप अपना।

ना तो ये सच है और ना वो सच है

चर में अचर में जो मौजूद रहता

सृष्टि के पहले, प्रलय के भी आगे

वही ब्रह्म था और वही शेष रहता।

चलो आँखों में ऐसा अंजन लगाएँ

जगें नीद से और सब को जगाएँ

छह शत्रु खुद में छिपे हैं जो बैठे

खुद के ही पौरुष से उनको हराएँ।

ये जमीं आसमां ये अगन ये पवन

ये बस्ती ये गलियाँ ये आँगन बुहारें

सब की है और है ये सब के लिये

चलो आज मिल के हम सब सुधारें।


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प्रकृति रंगों ख़ज़ाना है

रंग न होते तो प्रकृति अनभिव्यक्त रह जाती। रंग है तो उत्सव है। रंग है तो भेद है, विभेद है, प्रभेद है। रंग की अपनी सत्ता ही नहीं प्रभुसत्ता है। रंग एक विधा ही नहीं वह आयाम भी है।

रंगों का संसार बड़ा ही अद्भुत है। रंग हमारे जीवन के अभिन्न अंग है। रंग-बिरंगे फूल-पौधे, नीला आकाश, सोने जैसा उगता हुआ सूरज, सतरंगी इन्द्रधनुष ऐसे ही कई कई रंगों की भरमार है। पशु पक्षी, वनस्पतियाँ सभी रंग में डूबे हुए-से लगते हैं। ऊषा की लालिमा हो या खेतों की हरियाली, आसमान का नीलापन हो या मेघों का कालापन, बारिश की रिमझिम फुहार की अनोखी वह छटा, बर्फ़ की झक्क सफ़ेदी और भी ना जाने कितने ही ख़ूबसूरत रंगीन नज़ारे हमारे अन्तरंग को प्रफुल्लित करते हैं। इस आनन्द का राज है रंगों की रसानुभूति। मानव जीवन रंगों के बिना उदास और सूना है। रंग में रस है, रंग जीवन का उत्सव है।

रंग होली का मुख्य दूत है जो जन जन में उल्लास भरता है। होली के मौसम में प्रकृति अपने रंगों का पूरा ख़ज़ाना खोल देती है। रंग ही हैं जो होली को सांस्कृतिक पर्व में परिवर्तित कर देती है। ज़िंदगी में आनन्द की रसधार पूरे बरस बहती है।

रंग दृष्यमान है, बेरंग को कोई नहीं देख सकता जैसे प्रकाश में सब दिखाई देता है प्रकाश को कोई नहीं देख सकता। रंग है तो प्रकृति तथा इस सम्पूर्ण लोक का प्रत्यक्षीकरण है। तरह तरह के रंग का बोध में ही प्रकृति का बोध है।

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जड़ में चेतन का आविर्भाव

कभी कभी हम जो देखते है वह वास्तविकता में कुछ और ही होता है। इसे भ्रम भी नहीं कहा जा सकता। समुद्र के किनारे खड़े हो कर हम देखते हैं तो हमें केवल लहरें दिखाई देती है। अकेली ये लहरें समुद्र नहीं है। समुद्र के भीतर अगर गोता लगा कर देखें तो दिखाई देने वाला पानी, केवल पानी समुद्र नहीं है। आग लगने पर उठने वाला धुआँ कुछ दूर जा कर अदृष्य हो जाता है हमें लगता है वह आकाश में जा कर खो गया पर असल में वह वायुमण्डल की हवा के अणुओं के बीच छिप गया है। दुनिया में जिस जिस वस्तु के जो जो रंग दिखाई देते हैं वे उनके अपने नहीं हैं अपितु वे सूर्य के प्रकाश के वर्णक्रम के एक खास रंग को परावर्तित कर रहे हैं जैसे पत्ता हरा इसलिये दिखाई दे रहा है कि वह उस पर पड़ने वाली सूर्य की रोशनी में से केवल हरा रंग परावर्तित करता है। चाँदनी रात में तारे कहीं चले नहीं जाते है पर लगता है चाँदनी के उजाले ने उन्हें ढँक लिया है। मरुस्थल की तपती रेत पर से उठती गर्म हवा भी पानी की झील लगने लगती है पर वह पानी नहीं है। अर्थात् जो दिखाई पड़ रहा है उसकी वास्तविकता कुछ और ही होती है।

एक बीज जमीन में बोते हैं तो उसमें अंकुर फूटता है, वह बड़ा होते होते पौधा अथवा वृक्ष हो जाता है। हमें यह सारी प्रक्रिया भौतिक प्रकिया मालूम पड़ती है। हम इस बीज से वृक्ष बनने की प्रकिया के पूर्ण साक्षी हो सकते हैं। लेकिन जो दिखाई दे रहा है वह पूरी तरह वैसा नहीं है। इसकी एक चमत्कारिक घटना को हम देख नहीं सकते। बीज एक जड़ वस्तु है, ठीक एक कंकर की तरह। विज्ञान भी इस बात को सिद्ध कर चुका है कि पौधा, वृक्ष आदि अन्य वनस्पतियाँ जीवित है। बड़ा चमत्कार है कि जड़ बीज में से जीवन कैसे प्रस्फुटित हो गया। वस्तुतः जड़ बीज में से अंकुरण की भौतिक प्रक्रिया को हम देखते हैं पर सृष्टिकर्ता की चेतना का वह अंश हमें दिखाई नहीं देता जिसने अंकुर में जीवन का संचार होता है। वास्तव में बीज बोने से वृक्ष होने और फिर उसके सर्वांगीण विकास के प्रत्येक क्षण में चेतना अनवरत काम करती है। वृक्ष को काट देने अथवा आयु पूर्ण हो कर सूख जाने पर वृक्ष फिर वह जड़ रूप में परिवर्तित हो जाता है। हम कहतें हैं वृक्ष मर गया। लेकिन इस आद्योपान्त घटना में हमें उस परमचेतन और उसकी चेतना का आभास नहीं होता।

   "हम उस परम चैतन्य और उसकी चेतना का आभास करें"।


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हार-जीत, जीत-हार

क्या तुमने यही सोच रक्खा है कि तुम्हें हमेशा ही मनचाहा मिलेगा, अनचाहा कभी भी नहीं मिलेगा, यदि ऐसा है तो तो तुम गलत हो। तुम्हें बचपन से खेल खेलना सिखाया गया है जिसमें कभी जीत तो कभी हार होती है। तुम्हें दोनों तरह की आदत होनी चाहिये। तुमने यह शायद सोचा ही नहीं कि तुम्हारी हर जीत में किसी की हार छुपी होती है और तुम्हारी हर हार में कोई सीख छुपी होती है। सावधान! कुछ जीत जीवन को आघात कर सकती है, उसे ऊँचाइयों से गिरा सकती हैं जैसे रावण जीतता गया और एक दिन आततायी हो गया। बुद्ध एक दिन छोटी सी यात्रा में विह्वल हो कर हारे और वानप्रस्थी हो गये पर जब वापस लौटे तो जीत-हार की परिधि से बाहर निकल कर लोककल्याण के सूत्र ले कर जगत में लौटे।

जीवन में हार जीत का सम्मिश्रण है। याद रहे जीत में दम्भ न हो और हार में अवसाद न हो। ये तो रोज की छोटी-छोटी स्पर्धाओं के तात्कालिक परिणाम हैं जैसे चलती राह में मील के पत्थर होते हैं। हर सुबह अँधेरे पर जीत नहीं है, हर साँझ उजाले की हार नहीं है यह रात दिन के पड़ावों पर घटित होने वाला क्रम है। सुबह श्रम ले कर आती है और साँझ तारों भरी रात अथवा चाँदनी ले कर आती है। न तो यह संघर्ष है न ही द्वन्द्व अपितु यह एक क्रम है।

एवरेस्ट पर चढ़ कर झण्डा फहराना लोग एवरेस्ट को जीतना समझते हैं, क्या एवरेस्ट हारा है? वह तो आदिकाल से स्वानुशासन में खड़ा है। वस्तुतः एवरेस्ट के शिखर पर पहुँच जाना एक उपलब्धि है, किसी की हार-जीत नहीं।

एक और बड़ी अजीब बात है कि कभी कभी तुम किसी और की जीत को अपनी हार मान लेते हो, उसके विकास को, उन्नति को देख कर अपने को हारा महसूस करते हो वहीं अपनी किसी उपलब्धि में किसी पर अपनी जीत का आभास करते हो। ये दोनो स्थितियाँ अवाञ्छनीय हैं, आभासी हैं।

इसलिये ध्यान केवल खेल पर हो, खेल भावना से खेल हो। "खेलो बस खेल के लिये फिर परिणाम जो भी हो।"


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"गुनगुनाहट"

भँवरा पराग का रसपान करने के लिये फूलों तक जाता है इस दौरान एक ध्वनि स्वतः उत्पन्न होती है जिसे हम 'गुनगुन' कहते हैं। भाषा का यह शब्द प्रकृति ने स्वयं बनाया है। हम यह गुनगुनाहट सुनते हैं तो मन आनन्दित  हो जाता है। इस गुनगुनाहट के पीछे झाँक कर देखें तो पता चनेगा कि भँवरे को आनन्दानुभूति होती है। इसलिये एक लय की अनुभूति भँवरे के भी गुनगुनाहट के रूप में होती है। तात्पर्य यह कि उसके भीतर भी आनन्द है और बाहर भी आनन्द है।

ये गुनगुनाहट

बड़ी ही खूबसूरत चीज़ है,

शब्द और भाव तो भीतर रमते हैं!

और अनुनाद के स्वर

अपने अन्तस का

तरोताजा रेशमी अंकुरण है!!

माना कि महासंकट है अभी

इस सन्नाटे में भी,

प्रकृति किसी छोर से

गा रही है, नाच रही है

महसूस करो इसे,

सुनो! देखो!! गाओ!!

नाच सका तो झूम कर नाचो

तुममें एक बच्चा चुपचाप बैठा है। जगाओ उसे, उठाओ उसे। तुम्हारे इस छ्द्म अहंकार में उसका दम घुट रहा है। उसके जागते ही यह प्रकृति तुम्हें जैसी है वैसी दिखाई देने लगेगी, सरल, सहज ,सुन्दर।

"तन की आँखों के संग संग मन की आँखे भी खोलो।"


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आपके मालिक आप हैं

शायद खुद को उपस्थित सम-विषम परिस्थितियों से किसी तरह अपने आप को दूर ले जाना नशा है। सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक अथवा नैतिक मूल्यों और उनके संबधित समस्याओं प्रति अपने आप को अक्षम पाने पर आदमी भाग कर नशे की ओर मुड़ जाता है। नशे की स्थिति में आदमी के दिमाग की विचारणा शक्ति सिमट कर बहुत सीमित हो जाती है और उसे लगता है मैं उन समस्याओं से बहुत दूर आ गया हूँ।

एक पक्षी होता है शुतुर्मुग जो पक्षियों में सब से बड़ा होता है। वह चालीस किलो मीटर प्रतिघण्टा की गति से पैरों से दौड़ सकता है। जब कभी वह खतरा महसूस करता है तो अपना सिर कहीं छिपाने की कोशीश करता है और ऐसा होने पर वह अपने आप को सुरक्षित महसूस करता है पर आखिरकार शिकार हो जाता है। आदमी भी नशा इसी तरह करता है।

नशा फिर नशा है उतरते ही आम जिन्दगी में लौटना पड़ता है जब लौटता है तो कुछ लुटा कर ही लौटता है। जो गिरह में था उसे लुटा कर लौटता है तो वास्तविकता और अधिक भयावह हो जाती है। आश्चर्य की बात है कि इसके बाद वह और अधिक नशा करने लगता है। सोच लो उसके वे कदम किस ओर चलाना चाहिये? आदमी किसी और का मालिक हो न हो वह स्वयं का मालिक होता ही है। नशे की लत से उसे केवल वही बचा सकता है कोई और नहीं।

   "सब से पहले अपने मालिक खुद बनें।"


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अपना अपना क्षितिज

जिस प्रकार बरसात में अपना छाता, कछुआ अपनी कढ़ाईनुमा पीठ अपने साथ ले कर चलता है उसी प्रकार मैं भी अपना क्षितिज साथ ले कर चलता हूँ। इस विषय में तुम मुझसे अलग नहीं हो। कितनी ही तेज दौड़ लगाएँ, कहीं भी चले जाएँ वहाँ फिर वही नया क्षितिज नजर आएगा। इसे आज तक कोई पकड़ नहीं पाया।

इसी तरह हम मान्यताओं, अवधारणाओं और विचारों का अपना क्षितिज ले कर चलते हैं। हम जहाँ जहाँ जाते हैं अपना अपना यह क्षितिज पल्ले बँधा पाते हैं। नया क्षितिज चाहिये तो हमें मान्यताओं, अवधारणाओं और विचारों के परिष्कृत आयाम ढूँढने होंगे। इस बदलाव में सावधानी बरतनी होगी। अगर कोहरा है तो उसे छँटने का इन्तजार करना होगा अन्यथा कहीं गिर-पड़ सकते हैं।

 “तो चलो! एक बेहतर क्षितिज खोजते हैं।


50

जीवन चलने का नाम

जीवन इच्छाओं, लालसाओं की आपूर्ति और उपलब्धियों की परिधियों में घूमता ही रहता है। किसी की जरूरतें बड़ी तो किसी की छोटी पर अछूता कोई नहीं। किसी की प्यास को अंजुरी भर जल मिलता है तो किसी को पूरा घट। कोई और-और के चक्कर में दौड़ते दौड़ते उपलब्ध का भोग किये बगैर दुनिया से कूच कर जाता है कोई कहता है "थोड़ा चणा इतना ही घणा" लेकिन यह सच है कि बिना घूमे जीवन भी कहाँ जीवन है।

जिसमें विचलन नहीं वहाँ जीवन नहीं। चेतना है, तो चलना ही है। जल की परिधि है सागर से मेघ, मेघ से आकाश, आकाश से धरती, धरती से फिर सागर। सागर से बादल बन का पानी का उत्कर्षण है, आकाश बादलों का संचरण एक परिवहन है, बादल का बरसना हमें पतन लगता है पर वास्तव में वह धुएँ से बूँद के रूप में रूपान्तरण है, धरती पर पानी का चलना, बहना प्रचलन है। इन सभी स्तरों में हर कदम गति ही गति है, विकास ही विकास है। सम्पूर्ण यात्रा में गतिशीलता है, ठहराव कहीं नहीं। ठहरी हुई झीलें हैं, सरोवर हैं, कुएँ हैं पर उनका जल सदैव क्रम से बदलता ही रहता है। स्पष्ट है गति वहाँ भी भीतर ही भीतर है। हमने हर दम बदलने वाले पानी को यदि टंकियों में भर कर रखा तो उसका सड़ना निश्चित है। यही ठहराव मृत्यु है। जीवन का ठहर जाना मृत्यु ही है। पानी और हवा का स्वभाव चंचल है। अवस्थाएँ भले ही बदल जावें पर वे गतिमान रहते हैं।

नैसर्गिक गत्यात्मक गुणों का क्षय मृत्यु के समान ही है। वस्तुतः मेघों से जल का गिरना जल की अपनी परिधि में विकास के ही सारे क्रम है।

"जीवन चलने का नाम है, चलते रहो"


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डर और उसका निवारण

तुम डर से डरते हो, सहमते हो और सोचते हो कि डर से आमना सामना न हो पर तुम जानते नहीं कि इसी डर के कारण दुनिया में बड़े बड़े काम हो रहे हैं। मौसम के डर से तुमने मकान बनाया। बरसात के डर से छाता खरीद लाए। भूख के डर से बड़े बड़े गोदाम बनाए, भर लिये। गर्मी के डर से पंखे ले आए जो लम्बे समय से छतों में व्यर्थ ही टँगे हुए हैं। जरा देखो तुमने डर डर कर अपने इर्द गिर्द सामानों का कितना जखीरा इकट्ठा कर लिया है। इस डर ने कई कई खोजें संसार को दी है। अगर दीपक बुझने का डर न होता तो बिजली के लट्टुओं की चकाचोंध की ईजाद नहीं होती। सब से बड़ा डर तो मौत का है। इस डर ने कई कई अस्पताल खोल दिये हैं। डरना बुरा नहीं है पर डर के परमानेन्ट डर में रहना बुरा है। डर को बुलाओ मत पर आए हुए को धैर्य से परख कर उसका निवारण ढूँढ लो।


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जाफरी वाली शाला का पहला दिन

अंकुरण से ले कर विशाल वृक्ष होने तक की यात्रा में सब से महत्वपूर्ण समय है- प्रथम अंकुरण से उस नन्हे पौधे तक का विकास। अंकुरण के भी दो प्रभाग है- पौधे का ऊपरी भाग आकाश और निचला भाग पाताल की ओर चल पड़ता है। जन्मते ही उसकी जड़ें धरती में अपना जमाव और नमी खोजने निकल पड़ती है और ऊपरी भाग हवा और प्रकाश ढूँढने चल पड़ता है। जडें मजबूत हों, वृक्ष का जब तना पुष्ट हों और शाखाओं, फूलो, फलों से वह लदा हो तब वह वृक्ष स्वयं को सर्वाइव कर लेता है। नन्हे पौधे को संरक्षण, संस्कार और अत्यधिक संभालने की जरूरत होती है। ठीक इसी तरह मनुष्य को बचपन में यह सब आवश्यक होता है। इसलिये प्राथमिक स्तर और आयु में ही सम्यक शिक्षा की जरूरत है। मैं इन्हें गुरूजी मानता हूँ। मैं यह इसलिये भी कह रहा हूँ कि जब मैं अपने गांव जाता था तो अपने शिक्षकों के प्रति मेरा सम्बोधन होता था "गुरूजी प्रणाम!" और जब मैं उनके चरण स्पर्श करता था उस समय उनके चेहरे पर नितान्त सौम्य और आशीष के भाव आते थे, उसमें मुझे अलौकिक दिव्यता दिखाई देती थी। इन महत्वपूर्ण घटनाओं को मैं जीवन भर कभी नहीं भूला। बाद की शिक्षा में जो शिक्षक रहे वे सभी आदरणीय हैं पर वे गुरूजी सदैव मेरे लिये पूज्यनीय रहे हैं। मैं उन्हें प्रणत भाव से नमन करता हूँ।

मुझे अच्छी तरह याद है उस बाँस की जाफरी वाली उस पाठशाला का वह पहला दिन। जूट की टाटपट्टी पर माँ ने ले जा कर बैठा दिया था। हाथ के सिले जूट के झोले में थी बस एक स्लेट और खड़िया की कलम जिसे हम पेम-पट्टी कहते थे। एक पूर्ण आश्वस्ती के साथ  पाठशाला को और मेरे पूज्य गुरू को सौंप कर माँ अपनी उँगली छुड़ा कर चली गई।

माँ के कहे अनुसार गुरूदेव के कक्षा में आने पर मैंने अपने प्रथम गुरुदेव पूज्यपाद श्री मदनलाल जी वर्मा के श्रीचरणों में षाष्टांग प्रणाम किया। वह एक रोमांच भरा क्षण था। मैं आज भी अपने भाल पर उन पावन चरणों का स्पर्श महसूस करता हूँ और श्रृद्धा भाव से लबालब भर जाता हूँ।

इस तरह से मैं अपने कुल से गुरुकुल में प्रविष्ट हो गया। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ और धन्यवाद करता हूँ कि मैं शिक्षा के उस मन्दिर में प्रतिष्ठित हुई उन प्रथम जड़ों को और गुरू के आशीर्वाद को कभी नहीं भूलूँ।


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जरूरी क्या है?

यह प्रश्न जीवन का विस्तार के लिये जरूरी है पर 'क्या क्या जरूरी है?' यह एक बड़ी वितृष्णा को जन्म देने वाला है। क्या जरूरी है? यह जीवन की आवश्यकता है पर आवश्यकता की परिधि को पार कर जाना मरुस्थल भागते हुए उस हिरन की तरह है जिसके नसीब में सिर्फ दौड़ है। वह दौड़ जो सिद्ध कर देती है कि तुमने प्यास बढ़ाई है, बुझाई नहीं। इस से तो अच्छा था तुम आवश्यकता की उस परिधि के भीतर ही खड़े रहते। भौतिक सुखों की चाह और दुनिया का बाजार यह कहता है कि यह विचार तो मानव जाति का विकास रोकता है पर यह डिमान्ड एण्ड सप्लाय के सिद्धान्त को कहाँ मना करता है। अतः आवश्यकता की आपूर्ति के लिये मनाही नहीं है। जब हमें अच्छी तरह से पता है कि लास्ट रिक्वायरमेन्ट दो गज जमीन है तो फिर अन्धी दौड़ में हर कोई क्यों लगा है? "कबीर थोड़ा जीवना, मांडे बहुत मंडाण।"

प्रकृति का हर अंग न तो प्रतिस्पर्धा करता है न प्रतिघात। एक पेड़ ने कभी नहीं चाहा कि बगल का पेड़ उससे ऊँचा न हो। बड़ी नदियाँ छोटी नदियों से कहती हैं आओ हम साथ मिल कर चलते हैं अपने उस गन्तव्य सागर की ओर। पवन कहती है कि चलो खुशबुओं से संसार को और सुगन्धमय बनाते हैं। सारे ग्रह उपग्रह अपने सूरज के परिवार में जुड़े हुए चल रहे हैं अपने अपने संयम से। कोई अतिक्रमण नहीं करता अपनी स्वयं की बनाई आचार सहिता का। पंछी आज सुबह उड़ेगा अपनी भूख प्यास ले कर और लौटेगा एक परितोष भरी तृप्ति ले कर। उस के अपने संग कोई संग्रह नहीं होगा। अपनी भूख के अनुसार ही अपना पेट भरेगा।

हम न वक्त की चाल रोक सकते है, न शरीर की यात्रा और न ही जन्म और मृत्यु की आवृत्तियाँ ही। विज्ञान ने हमें सुख तो कई दिये हैं पर संतोष नही उल्टे हमें तेज, और तेज दौड़ना सिखा दिया। जीवन तमाम आवश्यकताओं से भरा पड़ा है पर इसकी आपूर्ति के बीच संतोष तक सीमित रहे तो बेहतर होगा।

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।

इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।। श्रीमद्भगवद्गीता १६/१३।।


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अभी में जियें

पतझर आया और सूख कर जर्द पात सब के सब झर गये। बिसर गई वह टहनी भी जिस पर उन्होंने पूरा जीवन जिया फिर इस करुणा भरी कथा को अब जग से क्यों कहनी?

इस करुणा के प्रस्फुटित बीजों में विगत का विरह और आगत का अन्तर्द्वन्द्व स्पष्ट देखा जा सकता है। नियति की तीखी तलवार इन सूखे पत्तों पर कच्चे धागे से लटकी दिखाई देती है।

ये कोपलें जो अभी अभी फूटी हैं उन विगत पत्तों की वंशज है।संसृति के पोषण हेतु सृष्टि का यह अनवरत क्रम है और आगे भी चलता ही रहेगा। सब के सब उस क्रम में ही गुजर रहे हैं। संसार में चल रहे ये सब के सब रंगमंच के कोई न कोई पात्र हैं और अपना किरदार निभा रहे हैं। कबीर कह गया -"आया है तो जायगा राजा रंक फ़कीर।" एक उजागर सत्य है कि नव पल्लव एक दिन पुराना पड़ेगा और वही का वही इतिहास फिर फिर दोहराया जावेगा जो अपने पूर्व के पत्तों ने निभाया है। अगर ऐसा है ही तो फिर इसे बार बार क्यों याद दिलाया जावे? याद रखना चाहिये कि जो अवश्यंभावी है उसका प्रतिरोध कैसा?

इस तथ्य को अपने दिल में धारण कर फिर इस कल कल करती जीवन सरिता में स्वच्छन्द बहने का आनन्द क्यों न लें। आओ! चलो! मिल कर बहें! खुल कर बहें! धारा के संग बहें! जीवन के इन रास्तों में कई खूबसूरत मोड़ होंगे, सुन्दर झरने होंगे, कल कल करते प्रपात होंगे, धीर गंभीर मन्थर गतियाँ होंगी, सुहाने तट मिलेंगे। हम अगर नाव की तरह नहीं बन पावे तो एक अदने से तिनके की तरह ही सहज बहें! विश्वास करें कि इस जीवन का वह प्रदाता अतुल्य है, वैभवशाली है तो उसकी बनाई यह जीवन सरिता भी भव्य ही होगी। हमे स्वयं ही यह बोध हो जाना चाहिये। यह भी याद रहना चाहिये कि "हम से बेहतर हमें कोई और नहीं जानता।"

महसूस करें कि एक आनन्द से परिपूर्ण अन्तर्प्रवाह हमारे भीतर ही भीतर अनवरत चल रहा है। जो पल बीत गये सो बीत गए, उन्हें कोई नहीं लौटा पाएगा। जो आने वाले कल में होना है वह कल का सूरज ही बताएगा। यह भी याद रहे कि समय बड़ा बलशाली है, नियन्ता है सब वही लाएगा और समेट कर फिर वही ले भी जाएगा। इसलिये कल कोई सा भी हो, कैसा भी हो चिन्ता कैसी?

"हमारा वर्तमान हमारी मुट्ठी में है। जियें जी भर कर। आज में जियें, अभी में जियें।"


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एक नदी बहता जीवन

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्त मध्यानि भारत।

अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।। 2/28।। श्रीमद्भगवद्गीता।।

बहती हुई उस नदी को ध्यान से देखो। हमारे जीवन में और इस नदी में कितनी बातें एक सी हैं यह नदी हमें अध्यात्म, दर्शन और जीने की राह बताती है।

नदी का जन्म नहीं होता है वह भूगर्भ से प्रकट होती है। नदी का अवसान भी नहीं होता है अपितु वह सागर में जा कर अदृश्य हो जाती है अर्थात् अप्रकट हो जाती है। बीच में ही वह बहती दिखाई देती है। हमारे जीवन की नदी भी हमारे जन्म और मृत्यु के दो सिरों के बीच बहती है। स्पष्ट है कि जन्म उद्गम है और मृत्यु अवसान। नदी के प्रवाह की तरह हमारे जीवन में भी गति है। यह 'गति' संकेत करती है उस चेतना और ऊर्जा की ओर जो सम्पूर्ण जीवन में साथ चलती है पर कहीं दिखाई नहीं देती है परन्तु इसी के कारण जीवन विद्यमान है। गतिमान होना ही जीवित होने का संकेत है। नदी का जीवन तात्विक रूप से देखा जाय तो उसकी देह का एक नैसर्गिक गुण है फिर यह नदी अन्त में सागर में समाहित होने के पूर्व मुहाने पर अन्तिम रूप से दिखाई देती है। किसी ने खूब कहा है-

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा,

मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा...!!

हमारे जीवन के सम्पूर्ण सर्ग के उपसंहार में जीवन का संकुचन मात्र ही तो है। यह संकुचन मुट्ठी भर राख के रूप में दिखाई देता है और अन्त में या तो जल में प्रवाहित कर दिया जाता है या उसे हवा उड़ा ले जाती है।

इस गतिमान जीवन के द्वारा पीछे छोड़ी गई रेखाएँ ही जीवन के अभिलेख हैं जिसे जाने अनजाने में तुम ने ही लिखे हैं। इस प्रक्रिया में जो कुछ भी पीछे छूट गया है उसके साथ जुड़ा रहेगा तुम्हारा नाम, कथानक, यश और अपयश।


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आत्मानुसन्धान

भण्डार में पड़ा अनाज का दाना मात्र एक दाना ही है पर जब तक उसे उगाने के लिए तैयार न किया जाए। जब उसे अपने मूल स्रोत की ओर यात्रा करना है तब वह "बीज" कहलाता है, उसकी संज्ञा बदल जाती है, पहिचान बदल जाती है, उद्देश्य बदल जाता है। फिर भी इस दाने की यात्रा वृक्ष तक की तब तक असम्भव है जब तक वह बीज होने की प्रक्रिया से न गुजरे। जब उसकी यह यात्रा प्रारंभ होगी तब इस दाने को शीत, आतप और अंकुरण की प्रसव वेदना से गुजरना होता है।

बीज अपनी देह से अंकुरण की प्राथमिक ऊर्जा का उत्सर्जन करता है और स्वयं को समाप्त कर लेता है। फिर आगे की तैयारी के लिये उसे दोनो दिशाएँ ढूँढनी होती है एक धरती की कोख की ओर और दूसरी आकाश के विस्तीर्ण आयाम। एक दिशा अन्धकार की है और दूसरी प्रकाश की। एक से स्थायित्व और जीवन का सत्व मिलता है और दूसरे से विकास। यही संतुलन उसे वृक्ष की संपूर्ण यात्रा भर तक चलता है। पहले उसे ऊँचा उठना है फिर गहराना है। पहला ऊर्ध्व विकास और दूसरा क्षैतिज; अंग्रेजी में कहें तो वर्टीकल और हॉरीजेन्टल डेवलपमेन्ट। जीवन भर एक संघर्ष उसे धरती के गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध करना होगा तभी वृक्ष में जल की आपूर्ति संभव होगी और दूसरा उसे अपना भोजन बहती हवा से निकालना है। बीज का उत्सर्ग इसलिये कहा जा रहा है कि जैसे आम का बीज बोया और उसका वृक्ष बन जाने पर न तो बीज शेष रहता है न उस बीज का मूल नाम ही। अपने शरीर और नाम दोनों का त्याग यहाँ अपने आप हो जाता है। बीज अब इन दोनों से मुक्त है। बीज के इस संपूर्ण प्रक्रिया से गुजर कर जिस वृक्ष से वह बीज आया था आज फिर वही अपने मूल रूप वृक्ष तक पहुँच गया है। "आम से चल कर आम होना एक खास बात है।"

वस्तुतः तुम अगर बीज हो सकते हो तो रूपान्तरित हो कर अपने मूल रूप "वृक्ष" रूपी आत्म को प्राप्त हो सकते हो क्योंकि "बीज होना वृक्ष का सूक्ष्म स्वरूप में स्थित होना ही तो है।"

तो अब समझ लो कि तुम्हें बीज हो जाना है। अगर मुक्त होना है तो अपने "स्व" के उत्सर्ग की तैयारी करो। उत्सर्ग करो अपने स्व का, अपने साथ चल रही संज्ञा का, उपाधि स्वरूप चल रहे अपने नाम का। तुम्हें प्राप्त होना है अपने आत्म स्वरूप को।

इसलिए संकल्प करो इनसे मुक्त होने का, अपनी नैसर्गिक दिशाएँ पाने का, अपने मूल स्वरूप को प्राप्त होने का। "तत्वमसि"।


57

हमारे आँगन में

मेरे घर के आँगन मेन वे पेड़ पौधे हमारे अतिथि हैं, मित्र है, सहचर हैं और हमारे ऑक्सीजन प्लान्ट हैं। अतिथी इसलिये कि ये सारे पेड़ पौधे कहीं न कहीं से हमारे आँगन मे पधारे हैं। ये सभी हमारे आँगन में बारी बारी से उतरे हैं। मित्र इस तरह कि वे हमारे सुख-दु:ख के साथी है। मौसमों के कोप से रक्षा करते हैं। सहचर इस तरह कि ये साथ ही रहते हैं।

देखो! यहाँ हारसिंगार हँसता है, पास ही सफेद अकउआ (आँक) वायव्य कोने में स्थित है जिसके सफेद पुष्पगुच्छ मेरे आराध्य देव शिव को परम प्रिय है। इसी के करीब में मीठा नीम अपनी केरेक्टर स्मेल और स्वाद ले कर खड़ा है और हमारे मनमोहन के रुचिरभोग के लिये अपनी सुगन्धित और स्वादिष्ट पत्तियाँ प्रदान करता है। फिर यह  बिल्व अपने त्रिदल से त्रिपुरारी शिव को बिल्वाष्टक सुनाता है। ये पत्र त्रयम्बकेश्वर को रात दिन लगा रहे हैं मानस-त्रिपुण्ड। मधुमालती स्वजन और अतिथियों के स्वागत में खड़ी है गुलाबी श्वेत पुष्पों की झालर लिये। क्यारी में दो महकते हैं मोगरे के फूल अपनी नैसर्गिक सुगन्ध से महकते हैं। यहीं पास में है तुलसाँ महारानी विराज रही है जो स्वामिनी है इस उपवन की पुण्य-प्रभा की। चीकू तो हमारे घर की पहचान बनी हुई है। इस पर मधुपरियाँ कभी कभी अपना घर बनाती रहती हैं। इसके पड़ोस में गिट्टेदार मोगरे का नन्हा पेड़ भी खड़ा है जो पावस में पुष्प देता है।

आँगन के केन्द्र में लंगड़ा आम खड़ा है जो हर बसन्त में अपनी आम्र-मंजरियों से महकाता है घर मोहल्ले को, कोकिला को मिठास भरी कुहक सुनाने के लिये निमन्त्रण देता है। हमने इसके आम कभी नहीं तोड़े, जो 'साग' बन कर गिरे वो हमारे बाकी सब पंछियों के होते हैं। इसकी एक डाल पर परमार्थ टँगा है, चिड़िया के दाने भर कर और साथ में एक सकोरा भी शीतल जल भर कर। गिलहरियों के चंचल दो जोड़े तिड़िप तिड़िप कर शोर करते रहते हैं। वहीं दाना, वहीं पानी और वहीं फल। नींबू का नन्हा सा पेड़ हमारे लिये विटामिन सी का प्रचुर भण्डार तैयार करता है। नैऋत्य कोण में द्वार से लगा हुआ रक्तपुष्प लिये गुड़हल माँ दुर्गा और गणाध्यक्ष के पूजन के लिये तत्पर है। समस्त संसार के कण कण को प्राण और ऊर्जा प्रदान करने वाले भुवन भास्कर अपनी सहस्रों किरणें ले कर छत पर उतरते हैं और बिजली के तार अनुप्राणि हो उठते हैं। दशहरी आम का पौधा अभी किशोर वय को प्राप्त कर चुका है। इन सभी पेड़ पौधों से हमारे मौन संवाद चलते ही रहते हैं। हम इनसे सिर्फ उतना ही लेते हैं जिससे हमारी पूजा-पुजापा संपन्न हो जावे। हम इनके ऋणी हैं इसलिये हम इनके सेवादार हैं।

कुछ इस तरह मैं "अपने बाहर के शहर में अपने भीतर का मेरा अपना गाँव ढूँढता रहता हूँ।"


तरंगें

(प्रथम)

1

ठहरे हुए पानी में कंकर फेंकते ही लहरें पैदा हो जाती है। यही कंकर पानी के अन्दरूनी हिस्से में ऐसा नहीं कर पाता। इसी तरह हमारे मन की ऊपरी तह में विचार तरंगें पैदा करते हैं जो हमें उद्विग्न कर देती हैं। हमारे मन की गहराई में असीम शान्ति का सागर है। आनन्द वहाँ नित्य निवास करता है। "आनन्द चाहिये तो मन के भीतर, और भीतर का अन्तर्नाद सुनें।"

2

हम एक मल्टीप्लेक्स जैसे हैं।  हम में क्रोध, शान्ति, संगीत, शोर, प्रेम, घृणा जैसे भिन्न भिन्न भाव भरे पड़े हैं। इनमें से केवल शान्ति ऐसा भाव है जो मानव मात्र में स्वभावतः मौजूद है और कई बार शोर, क्रोध, घृणा जैसे भाव कुछ समय के लिये ज्वार भाटे की तरह आते हैं और व्यक्ति अपने मूल स्वभाव की ओर लौट जाता है। कभी कभी इन विप्लवी भावों का रिमोट कन्ट्रोल किसी और के हाथ में चला जाता है और हम रोबोट हो जाते हैं। इसलिये तुम "जियो अपनी ही तरह से।"

3

जब जब मैं तुम्हें भूलना चाहता हूँ तब तब तुम और भी ज्यादा याद आने लगते हो। क्योंकि याद मिटाने का रबर हमारे पास नहीं है। यादें अतीत की गोपनीय कन्दराओं से निकल निकल कर आती हैं। उस समय तन बदन यहीं पड़ा रहता है और मन उन पुरातन गलियों में दौड़ दौड़ जाता है। उस आभासी रंगमंच में वे सारे परिदृश्य ऐसे सजीव हो उठते हैं जैसे सब वर्तमान में चल रहा हो। इसमें एक मजे दार बात यह भी है कि तुम्हारा मन बहुत सी यादों में से अच्छी और मधुर यादें चुनकर उनका आनन्द ले सकता है परन्तु आक्रान्त क्षणों में यह चुनाव संभव नहीं होता लेकिन इस आवेग के समाप्त होते ही फिर अपना चुनाव संभव है। "चलो स्वर्णिम अतीत से कुछ अच्छा सा ढूँढ लाएँ।"


तरंगें

(द्वितीय)

4

हम शायद कुछ देर के लिये खुश तो हो लिये पर सुखी होना भूल ही गये हैं। ठहाका मारने के पहले हम आस पास देखते हैं कि हमें देख तो वहीं रहा है। "लोग क्या कहेंगे?" एक ऐसा छोटा सा किन्तु बहुत बड़ा प्रश्न है जो हमारी नैसर्गिक चेष्टाओं में विक्षोभ पैदा कर देता है और हम अनैच्छिक औपचारिकता में उतर पड़ते हैं। हम अगर तथाकथित संभ्रान्त लोगों के बीच बैठे हैं और छींक आ गयी, खाँसी आ गई, उबासी आ गई तो हम 'सॉरी' कहते हैं।  क्यूँ भाई?

5

"सहनाववतु सह नौ भुनक्तु सहवीर्यं करवावहै, तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।" यह हमारी सामूहिकता की वैदिक प्रार्थना है जिसे छोड़ कर हम बच्चों को नं. वन आने के लिये तैयार कर रहे हैं। इसका सीधा सीधा मतलब उसे यह समझाना है कि बाकी सब तुम से नीचे हों, इन्फीरियर हों। तुम उन सब को पीछे छोड़ कर आगे निकलो। यह स्पर्धा की भावना बच्चों के अपने भीतर से निकल कर बाहर आ जाती है और वह अपने भीतर मौजूद श्रेष्ठ को निखारने के बजाय बाहर की प्रतिस्पर्धाओं में जूझने लगता है। नं. वन नहीं मिलने पर कई घातक परिणाम सामने आये हैं। इस स्पर्धा की प्रवृत्ति ने शिक्षा की रीति-नीति और पद्धति को बदल कर रख दिया है। कहाँ थे कहाँ आ गये हैं?

6

मेरे आने से पहले अनगिनत आये भी और चले भी गये। इनको मैने नहीं देखा। जाने के बाद भी आवेंगे और जाते भी रहेंगे उन्हें भी मैं देख नहीं सकूँगा। संसार एक रेलगाड़ी है। एक स्टेशन पर रुकती है तुम भी इसमें एक दिन चढ़े हो। कुछ लोग पहले से सफर में हैं, कुछ तुम्हारे संग बैठे हैं, अपनी अपनी तरह से सफर कर रहें है, कुछ स्टेशनों से चढ़-उतर रहे हैं। इनमें से कुछ लोग तुम पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। "क्या तुमने अपने किसी सहयात्री पर मधुर यादें छोड़ी हैं?

7

अगर कोई समझता है कि वह समय काट रहा है तो उसे ध्यान नहीं है कि असल में समय उसे काट रहा है। कुल उम्र में से तिल तिल कर क्षण घटा रहा है। यह एक दृष्टि है। दूसरी दृष्टि इसी बात के विषय में यह है कि समय ने ये क्षण हमें कुछ सकारात्मक और रचनात्मक कार्यों के लिये उपलब्ध कराये हैं जो अनुपयोगी छोड़ दिये तो ये फिर लौट कर नहीं आवेंगे।  

"समय का सदुपयोग जीवन के मूल्य बढ़ा देता है।"

तरंगें

(तृतीय)

8

एक मार्ग पर दो तरह की दौड़ चल रही है। एक हिरन की दूसरी शेर की। भय से हिरन जिस मार्ग पर भागता है वह वास्तव में शेर का 'विजयपथ' होता है। लेकिन शेर का शिकार झुण्ड में से केवल वही हिरन होता है जिसमें जिजीविषा की कमी होती है, जो जीवन की आस छोड़ देता है। इस दौड़ में जीवन उसी का शेष रहता है जो तेज दौड़ता है। शेर नहीं दौड़ा तो भूख से मर जावेगा, हिरन नहीं दौड़ा तो शेर का भोजन बन जावेगा। दूसरे शब्दों में "अपनी अपनी दौड़ जीवन की रक्षा की दौड़ है।"

9

एक मरीज जब किसी डॉक्टर के पास जाता है तो अपनी तकलीफें उसे बताता है। अधिकांशत: मामलों में वह डॉ को पूरी तरह नहीं जानता फिर भी वह अपना जीवन एक विश्वास के साथ डॉ के हाथ में सौंप देता है। इतना विश्वास कि डॉ उसे अमृत दे या जहर, वह पूर्ण निष्ठा के साथ उसके आदेश का पालन करता है। हो सकता है सर्जन उसका, सिर, हृदय अथवा किडनी खोल दे। गजब का विश्वास होता है मरीज में कि डॉ के सामने मृत्यु का भय भी कहीं फेंक देता है। ऐसे अधिकतर मरीज पुनर्जीवन और स्वास्थ्य पुनः प्राप्त करते है। यह उनके शरीर और तकनीक की ही नहीं एक परस्पर दृढ़ विश्वास की जीत है।

10

मेरे भीतर जो इच्छाएँ जन्म लेती है उसकी आपूर्ति मैं किसी संसाधन से अपने ढंग से करने लगता हूँ। इनमें से कुछ इच्छाएँ पूरी होती है और कुछ नहीं भी हो पाती है। यहाँ तक तो ठीक है परन्तु अगर मेरे आसपास बाजार के लोग कुछ सामान मेरी इच्छा पर जबरन लाद दें और मैं उसमें फँस जाता दूँ तो मैं बहुत बड़ा स्टुपिड हूँ। ऐसे समय में उस चौपाये की तरह हो जाता हूँ जिसे एक मालिक उसकी मर्जी से चारा खिलावे, बर्सिम खिलावे, भूसा खिलावे या भूखा ही रखे। आज कल "एक के साथ एक फ्री" भी इसी तरह का इन्द्रजाल है। श्याणे लोग इसमें ज्यादा फँसते हैं।

इसलिये "हम अपना जीवन अपने विवेक और अपनी शर्तों पर जियें।"

11

जिन्दा रहने के लिये माल असबाब जरूरी है? या माल असबाब जुटाने के लिये जिन्दा रहना जरूरी है? छोटे छोटे इन प्रश्नों का उत्तर यदि हम स्वयं से पूछ लें तो हमारी जीवन शैली में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ सकते हैं।

प्रथम दृष्टया शायद दोनों एक दूसरे के लिये जरूरी है। पर दोनों में से पहला चुनाव कौनसा और अन्तिम चुनाव कौनसा होना चाहिये? निश्चित रूप से पहला जवाब है "जिन्दा रहना जरूरी है'

तो आप सिर्फ माल असबाब के लिये जिन्दगी दाँव पर लगाओगे क्या?

च्यवनिका  खण्ड

बूँद 1

हिन्दी  शब्दकोश में च्यवन

च्यवन संज्ञा पुं० [सं०] १. चूना । झरना । टपकना । २. एक ऋषि का नाम । विशेषइनके पिता भृगु और माता पुलोमा थीं । इनके विषय में कथा है कि जब ये गर्भ में थे, तब एक राक्षस इनकी माता को अकेली पाकर हर ले जाना चाहता था । यह देख च्यवन गर्भ से निकल आए और उस राक्षस के उन्होंने अपने तेज से भस्म कर डाला । ये आपसे आप गर्भ से गिर पड़े थे, इसी से इनका नाम च्यवन पड़ा । एक बार एक सरोवर के किनारे तपस्या करते इन्हें इतने दिन हो गए कि इनका सारा शरीर वल्मोक ( बिमौट = दीमक की मिट्टी) से ढक गया, केवल चमकली हुई आँखें खुली रह गई । राजा शर्याति की कन्या सुकन्या ने इनकी आँखों को कोई अद्भुत वस्तु समझ उनमें काँटे चुभा दिए । इसपर च्यवन ऋषि ने क्रुद्ध होकर राजा शर्याति की सारी सेना और अनुचर वर्ग का मलमूत्र रोक दिया । राजा ने घबराकर च्यवन ऋषि से क्षमा माँगी और उनकी इच्छा देख अपनी कन्या सुकन्या का उनके साथ व्याह कर दिया । सुकन्या ने भी उस वृद्ध ऋषि से विवाह करने में कोई आपत्तिनहीं की । विवाह के पीछे एक दिन अश्विनीकुमार ने आकर सुकन्या से कहा—'बूढे पति को छोड़ दो, हम लोगों से विवाह कर लो' । पर जब वह किसी प्रकार समत व हुई, तब अश्विनीकुमारों मे प्रसन्न हेकर च्यवन ऋषि के बूढे से सुंदर युवक कर दिया । इसके बदले में च्यवन ऋषि ने राजा शर्याति के यज्ञ में अश्विनीकुमारों को सोमरस प्रदान किया । इंद्र ने इसपर आपत्ति की । जब इन्होंने नहीं माना, तब इद्र ने इसपर वज्र चलाया । च्यवन ऋषि ने इसपर क्रुद्ध होकर एक महा विकराल असुर उत्पन्न किया, जिसपर इंद्र भयभीत होकर इनकी शरण में आया ।


बूँद 2 - वे प्रश्न जागरण के

जितनी देर मैं जागता हूँ उस पूरे समय में मेरी आँखे, कान दूसरों को जानने, समझने और उनसे बातें करने में लग जाते हैं। हर प्रश्न में, हर व्यवहार में हर घड़ी उठते प्रश्न उन्हें ही देखने परखने के लिये होते हैं। मैं जब आईने के सामने खड़ा होता हूँ तो मैं किसी अन्य से तुलना करने में लग जाता हूँ जैसे वह मेरे साथ ही खड़ा हो।

यकायक कहीं से उड़ते हुए प्रश्न मेरे कानों में आ घुसते हैं- "तुम कौन हो, क्या हो, क्यों धरती पर आ टपके हो?" मैं चौंक जाता हूँ और दूसरे कान से वे प्रश्न बेजान हो कर गिर पड़ते हैं। जितनी देर तक के वे भीतर रहे मेरी छटपटाहट बनी रही। वे मेरी सहनशीलता के परे थे।

परन्तु ये प्रश्न मुझे मुझसे मिलवा सकते थे, मुझे मैं जानता ही नहीं हूँ वे मेरी पहचान से पहचान करवा सकते थे। वे समुद्र मन्थन के सुमेरू पर्वत थे जो मुझे मथने में सक्षम थे। वे चिन्तन के कच्छप जैसे आधार बन कर आये थे। मेरे भीतर बसे विष जैसे काले रत्न को बाहर निकाल फेंकने में सक्षम थे। अब मन्थन नहीं होगा। अस्मिता की पहिचान के अमृतत्व तक अब नहीं पहुँचा जा सकेगा।

क्या इस तू, तुम, वह और वे के महाजाल में "मैं" तक पहुँच पाना अलक्षित हो जावेगा। मेरा अवचेतन बस इन्हीं से भरा पड़ा है।

सुना है कि अन्धे कमरे से अँघेरे को हटाने के लिये अँधेरे का उलीचना उपाय नहीं है वरन् वहाँ अपना प्रज्जवलित दीप रखना पड़ेगा। आत्मदीप। दृष्टि को अन्तर्दृष्टि बनाना होगी। वे दिवंगत प्रश्न मैं कौन हूँ, क्या हूँ, क्यों जन्मा हूँ? के रूप में परिवर्धित होते ही परिदृश्य बदल जावेंगे, उधर ही जाना होगा। अच्छा! चलता हूँ।


बूँद 3 - च्यवनिकाएँ

वारिद याने बादल। वारिद याने पानी देने वाला। प्रकृति की यह अद्भुत संरचना है। इस बादल का पिता है सागर जो इसके जन्म का कारक है माँ इसकी पूरी धरती है जिसकी गोद में यह खेलता है। आकाश इसका रमणस्थल है। हवा के परों पर अठखेलियाँ करता है। सागर ने सूरज की आग को पिया है और अपने तन से शिबी की तरह का दान बादल के रूप में दिया है। सागर ने जन्म दिया पर अपना नाम इसको नहीं दिया अपितु इसे पानी के नाम पर 'वारिद' दिया है। निश्चित रूप से यह सागर का ही टुकड़ा है। यह 'बादल' उस पानी का ही बीच का नाम है जो चला था पानी फिर बन गया पानी।

यह जो बारिश है न, यह बादल की चुअन है। यही चुअन हम पर जीवन का छिड़काव करने आती है। बादल अगर चूता नहीं तो किसी पहाड़ पर स्वयं को उँडेल देता और धरती पर पानी नहीं केवल बाढ़ होती। यह उपकार है बादल का, उपकार है सागर का, उपकार है पवन का, उपकार है पानी का, उपकार है तेज का, उपकार है आकाश का। प्रकृति के पाँचों प्रखण्ड जी जान से लगे रहते हैं सागर से हम तक जीवन ढोने में। शायद हमने बादल को इस तरह कभी देखा ही नहीं।

बादल सागर के टुकड़े ला कर देता है हमें, जीवन ला कर देता है हमें। बादल की चुअन को संस्कृत में च्यवन कहते हैं। इस च्यवन में से हमारे हिस्से में जो आई है वह 'च्यवनिका' है। जो जीवन देता है वह अमृत है। इसलिये 'च्यवनिका' वह अमृत बिन्दु है जो उस अनन्त परमात्मा के सागर से चले बादलों की ही चुअन है।


बूँद  4 - गुरूसत्ता

टूटता हुआ तारा,  आकाश में चमकती बिजली कितनी ही क्षणिक क्यों न हो पर वह दृश्य तो हमारे अन्तर्पट पर लकीरें छोड़  जाती है। इसी तरह तुम आये कुछ पल के लिये मेरे जीवन में और देखो मैं कितना बदल गया हूँ। आकाश में तारा जो टूटा एक चमकती लकीर सी पगडण्डी बना कर छोड़ गया, मेरी मंजिल की राह बन गई है अब वह। बिजली जो चमकी बादलों में, मैंने इस गहन अन्धकार में भी देख लिया कि मैं कहाँ हूँ, कैसा हूँ ?

हाँ,  मेरा प्रियतम अथवा मेरा गुरू हो तुम। वह छूटी हुई चमक मुझ में गुरूसत्ता के रूप में विद्यमान है। तुम व्यक्ति नहीं हो सकते, तुम मेरे भीतर का प्रकाश बन कर बस गये हो। प्रकाश आत्मा का, प्रकाश जो मुझे तमस के महाब्धि में गिरने से बचायगा, प्रकाश जो जीवन में आने वाली निराशाओं से बचाएगा। यह प्रकाश मेरी जिजीविषा का उत्प्रेरण है। प्रकाश जो परमात्मा का ही है जो तुम्हारे दर्पण से हो कर मुझ तक सहज रूप से पहुँच रहा है।

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।श्रीमद्भगवद्गीता 13/18।।

मैं उस सद्गुरू को प्रणाम करता हूँ।


बूँद 5 -  बूँद-बूँद बूँद

सारा समुन्दर बूँद बूँद ही तो है, और बारीकी से देखें तो बूँद ही तो है। बूँद एक शब्द का महाकाव्य है। इसमें सारे सर्ग हैं, सारे सोपान हैं, सारे रस हैं, सारे भाव-विभाव-अनुभाव है। हाँ इसमें संचारीभाव भी है। बूँद व्याकरण भी है और रचना भी। बूँद अनगिनत पात्रों का एकांकी नाटक है। बूँद भीतर से नरम और बाहर से चमकीली है।

 बूँद कभी हवा में उड़ जाती है हवा जैसी हो कर, कभी जम जाती है पत्थर सी हो कर। कभी पत्तों की नोक पर ठहर कर मोती की तरह हो जाती है तो कभी दिल से नमक खींच कर लाती है और आँखों से बह कर जी हलका कर देती है। कभी बरखा बन कर धरती को तर बतर कर देती है तो कभी मेरी प्रियतमा की अलकों में ठहर कर श्रृंगार कर देती है। बूँद जो प्यास का समाधान है, बूँद जो पसीने का आधान है यही बूँद कहीं कहीं व्यवधान है। बूँद कभी घुल जाती है किसी में तो बूँद किसी को घोल लेती है खुद में। कभी पुतलियों में तैर जाती है तो कभी सूखी रेत में गिर कर खो जाती है। प्रपात में झरती है तो उसका निनाद लगता है जैसे प्रकृति गाने लगी है।

कुछ बूँदें जो द्रौपदी की आँखों से निकल कर लावा बनी तो अनगिनत लोगों को राख के ढेर में तबदील कर गई। बूँद बूँद बूँद मिल कर बाढ़ बन जाती है तब वह उच्छृंखल हो जाती है, विप्लव का पर्याय बन जाती है। जब ठहर जाती है तो सरोवर, झील, पोखर हो जाती है। बूँदें अपने प्रिय को अलविदा कहने लगती है तो लगता है वह मौन हो कर भी बिरहा गीत गा रही है। कभी इसमें विष घुल जाता है तो कभी नशा। कभी अमृत घुल जाता है तो कभी दवा। बूँद बदलियों के गर्भ में पलती है और जन्मते ही धरा की गोद में आ जाती है। अपनी ही जात के पानी में जब टप-टप टपकती है टिप-टिप का नाद उत्पन्न करती है। इसी बूँद को बरस भर के इन्तजार के बाद पपीहा पिऊ पिऊ कर आकाश में ही पी जाता है। एक लम्बी सी प्यास का छोटा सा प्यारा सा आत्मसात प्रखर प्रेम।

बूँद हमारे मुँह से प्रवेश कर खून में मिल जाती है फिर रग रग में घूमती है फिर एक दिन चिता पर लेट कर आकाश में कहीं गुम हो जाती है। कोई नहीं जानता। आते हुए देखा है उसे सब ने पर कौन देख पाया है उसे इस तरह जाते हुए।


बूँद 6 - कौन क्षितिज के पार गया

क्षिति का अर्थ है- जमीन, धरती, पृथ्वी। एक और अर्थ भी सुना है-निवास स्थान। जो धरती से जन्मा है वह क्षितिज है या हम जहाँ रहते हैं वहाँ से क्षितिज वह काल्पनिक किन्तु सत्य आभासित होने वाली परिधि है जिसके पार हमारी दृष्टि नहीं जा सकती है। क्षितिज के उस पार अथवा हमारे क्षितिज में रह रहे आदमी का भी अपना क्षितिज है। उसके क्षितिज से हमारा क्षितिज टकराता नहीं है। कमाल की बात है कि आदमी चलता है तो हाथ में पकड़े छाते जैसा अपना क्षितिज उसके अपने साथ साथ चलता है।

कभी कभी लगता है अगर परिधि का यह सीमांकन नहीं होता तो मीलों दूर तक हमें दिखाई देता। प्रकृति ने इस तरह की कई सीमाएँ तय की हैं जैसे अगर हम पूरे जोर से चिल्लावें तो यह आवाज कुछ दूर चल कर मर जाती है। अगर आवाज कुछ दूर चल कर न मरती तो यूक्रेन में बम्बार्डमेन्ट करने वाली मिसाइलों की गड़गड़ाहट यहाँ तक आ कर हमारे कान फोड़ देती। पूरी दुनिया को पूरी दुनियाँ की आवाज सुनाई देती। पानी समुद्र से चल कर आता है और बह कर फिर वहीं चला जाता है अगर बहता नहीं तो धरती पर पानी ही पानी होता। खुशबू और बदबू कुछ दूर चल कर मर जाती है नहीं तो समझ लो क्या हो जाता। मतलब हमारे आँख नाक, कान की प्रति रक्षा की और सृष्टि क्रम को व्यस्थित करने के लिये प्रकृति ने कठोर नियम बनाये है।

श्रीदुर्गासप्तशती के मन्त्र में आता है "या देवि सर्व भूतेषु स्मृति रूपेण संस्थिता" और "या देवि सर्व भूतेषु भ्रान्ति रूपेण संस्थिता"

हमारे शारीरिक संस्थान में स्मृति होने का वरदान है पर बचपन से अभी तक की सारी की सारी घटनाओं का रिकार्ड रहना नहीं होता है। अगर ऐसा होता तो हमारे दिमाग में एक ट्रेन्चिंग ग्राउन्ड होता। इसलिये भूलने का एक अभिशाप हमें वरदान के रूप में मिला हुआ है कि पूरे जीवन की कुछ घटनाओं के कुछ अंश ही हमें स्मृति में रहते हैं। सृष्टिकर्ता की अनगिनत ऐसी अनुकम्पा प्रकृति के माध्यम से अनुशासित ढंग से चल रही है। यह अहसास हमें होते रहना चाहिये।


बूँद 7 - नदिया चले चले है धारा!

तुम एक नदी हो। बस बहती ही बहती हो। तुमने कभी अपनी धार को देखा ही नहीं। धार एक प्रवाह है, गति है। तुम्हारी इस धार में विकास है क्योंकि तुम अपने घर से चली थी तब एक महीन रेखा थी और चलते चलते ही बढ़ी हो। धार जो कभी मन्थर है, कभी बावली होती है, कभी ऊपर से नीचे गिरती है। धार जो लहरा सकती है, मुड़ सकती है, पत्थरों से टकरा सकती है लेकिन अपने गन्तव्य तक जाने के लिये सदैव तत्पर रहती है।

नदी! तुमने अपनी धार को देखा ही नहीं। तुम धार ही से पर्वत के शिखर को समुन्दर से जोड़ती हो, शहरों को और गाँवों को जोड़ती हो, संस्कृतियों को जोड़ती हो, संस्कारों को पालती हो, लोगों को लोगों से जोड़ती हो।

यह जीवन एक नदी है। जीवन का प्रवाह ही धारा है। बहना और बहते रहना ही धर्म है। जीवन का प्रवाह ही धारा का प्रवाह है। नदी उद्गम से अवसान तक की समग्रता है। नदी का सबसे बड़ा गुण बहना है, गति है, निरन्तरता है।  उसमें जो बहाव है वही धारा है।


बूँद 8 - दर्पण का साक्षीभाव

एक दर्पण के पास अपना कुछ भी देने का नहीं है लेकिन उसे जैसे ही कोई बिम्ब मिला उसे वह पूर्ण रूप से लौटा देता है। रंगीन को रंगीन और रंगहीन को रंगहीन ही लौटाता है। रोते को रोता हुआ और हँसते को हँसता हुआ। एक खास बात और है कि गीली वस्तु का प्रतिबिम्ब गीला नहीं लौटाता है। वह केवल आकार ग्रहण करता है और वही लौटाता भी है। वह अपना कोई भी काम अँधेरे में किसी बिम्ब के सामने होते हुए भी वह कुछ नहीं कर पाता। उसे अपना काम करने के लिये उजाला चाहिये।

दर्पण कितनी ही कोशिश करे बिचारा मुखौटे के उस पार नहीं देख पाता है, काले चश्मे के पीछे की आँखों की नमी नहीं देख पाता है। आदमी की चालाकी को पढ़ नहीं पाता है।

चाँद भी एक बड़ा सा दर्पण है जो सूरज से आई रोशनी लौटाता है अगर ऐसा न हुआ होता तो धरती की रातें काली ही रहती। दर्पण और दर्पण बना चाँद बिम्ब को ले कर प्रतिबिम्ब लौटा देता है। पानी को देख कर गीला नहीं होता, आग को देख कर झुलसता नहीं। वह बिम्ब को एक क्षण भी अपने पास नहीं रख पाता। बिम्ब के हटते ही सब गायब।

दर्पण केवल साक्षी है, वह निर्लिप्त है विशुद्ध आत्मा की तरह। दर्पण से निकले प्रतिबिम्ब की तरह चेतना भी आत्मा की व्यापकता का ही स्वरूप है।

आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः ।

असङ्गो निःस्पृहः शान्तो भ्रमात्संसारवानिव ।।अष्टावक्र गीता १-१२।।


बूँद 9 - मन हारा तो सब हारा

जो कुछ तुम्हारे मन का हो तो अच्छा। तुम्हारा जो मन शिद्धत से चाहता हो लेकिन वह न हो पाया तो और भी अच्छा। थोड़ी देर के लिये तुम अवसाद में, पश्चाताप में, सकते में आ जाते हो और हताशा से घिर जाते हो। यह स्थिति दो प्रक्रिया और दो अलग अलग परिणाम की संभावना पैदा करती है। यातो तुम वह काम बन्द कर देते हो या फिर उसी पल एक रिव्यू चालू हो जाता है कि आखिर वे कौन कौन से कारण हैं जिनके रहते कार्य नहीं हो सका। पहली स्थिति में तुम थोड़े भी ठहर गये तो काम की इतिश्री समझो। दूसरी स्थिति में थोड़ी सी देर भी ठहर गये तो तुम्हारे उसी मन में ढेर से सुधारात्मक विचार, कई कई रचनात्मक विधियाँ जन्म लेने लगेगी। इसलिये यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मन काम न होना कई नई सम्भावनाओं को जन्म देता हैं।

"मन के हारे हार है मन के जीते जीत।" मन हारा तो सब हारा। लेकिन हारे हुए मन को वही मन वापस जिता सकता है। इसलिये मन को उसकी अपनी शक्ति से जीतने का अवसर प्रदान करो। बस इतना सा जान लो कि "बाधाओं के उस पार कामयाबी खड़ी है।"


बूँद 10 - मौन व्रती

इन पर्वतों को देखो इन पेड़-पौधों देखो, ये वनस्पति आदि को थाम कर वहीं के वही रुके हुए खड़े हैं, आदिकाल से। सागर को देखो वह चक्रवातों, तूफानों और ज्वारभाटों को अपनी अंक में समेटे अपनी सीमा खुद ही तय करके भी यह शान्त खड़ा है। सूरज स्वयं में निरन्तर विस्फोट झेलता है पर अपना मण्डल अर्थात् सौर परिवार को व्यवस्थित ले कर स्थिर है, अविचल है। और यह धरती ? इसे हमने धरती कह दिया पर शास्त्र इसे भू लोक कहता है। लोक अर्थात् एक सर्वांगीण व्यवस्था जो जीवन देती है, उसे पालती है और उपसंहार होने पर इसे आत्मसात् भी कर लेती है। इस लोक के प्रकट होने के पूर्व से ही इस धरा में मातृत्व प्रकट हो गया था। नदी, नाले, झीलें, सरोवर प्राणियों और प्रकृति लिये जल ले कर मुस्तैद खड़े हैं। हवा हजारों हजार अवरोधों के बावजूद प्राण और गन्ध ले कर निरन्तर चल रही है। देख सकते हो कि इसी प्रकार प्रकृति का प्रत्येक अंग स्वयं कष्ट में है फिर भी अपना धर्म कर्म कभी नहीं छोड़ता और परस्पर सदैव सेवा में रत है। हर कहीं कोई न कोई संकट चल रहा है इसके बावजूद सब चल रहा है।

हम भी थोड़ा विचार कर लें कि इनकी तरह हमारी अपनी जिजीविषा बनी हुई है कि नहीं?


रामनारायण सोनी


माता - स्व. श्रीमति दरियावबाई सोनी
पिता - स्व. श्री शंकरलाल सोनी
सहधर्मिणी - श्रीमति शकुन्तला सोनी
शिक्षा - बी.. (इले., एस.जी.आय.टी.एस. इन्दौर)
सेवा - .प्र. विद्युत् मण्डल से सेवा निवृत्त
कृतियाँ :- गद्य काव्य--पिंजर प्रेम प्रकासिया, जीवन संजीवनी, अन्तस की उर्मियाँ,

                       काव्य की अन्तर्धाराएँ (आलोचना), आत्मदीप

कविता संग्रह --ज़िन्दगी के कैनवास, बूँद बूँद अहसास, अनुष्का, विद्युल्लता, रजत रश्मि

प्रकाशन में – रजत रश्मि, माण्डूक्योपनिषद एक विहंगावलोकन, गीता सुगीता, शब्दधरा के बिम्ब, (इलस्ट्रेशन -            कविता/गद्य और अपना ही ग्राफिक्स), मुक्तोsहम्
संपादन - उपहार (कृति- डॉ. के.एस. रावत),

विशेष विधाएँअध्यात्म, जीवन दर्शन और इलेक्ट्रोनिक सामजिक माध्यमों में सक्रियता
पुरस्कार - तुलसी अलंकरण, साहित्य मनीषि आदि।