Tuesday, 16 May 2023

तिजोरी में पल

मेरे पास एक तिजोरी है पर बिना ताले की। वह एक हलके से हेंडिल से खुलती है। इसमें अलग अलग चौखाने हैं। एक तहखाना भी है। जब भी मैं खाली हो कर बैठता हूँ तो इसे खोल कर देखता हूँ। इस तिजारी में मैंने मेरे अपने, हाँ निखालिस अपने पल सिलसिलेवार खानों में करीने से जमा रखे हैं। खूबसूरत पल, आनन्द के पल, जिन्दगी के अलग अलग मोड़ के पल, मिलन के बिछड़ने के पल, सुख के पल-दुःख के पल। 

कुछ पल ऐसे भी हैं जिनका साया आज तक पीछा नहीं छोड़ रहे हैं और यह साया जिन्दगी के सफेद कागजों को भरने लगता है। जिन्दगी के इन पलों को भाग्य और प्रारब्ध ने मिल कर नौ रसों में अलग अलग डुबोया है। विधाता ने अपनी प्रकृति में छह रस बनाए पर धरती पर हमारा मन नौ रसों के ताप-शाप से गुजरता है। 

पलों के भिन्न- भिन्न खाने मेरी जिन्दगी और उम्र के रास्ते से मील के पत्थरों की तरह जुड़े हैं। मैं उन्हें आज फिर से याद कर  रहा हूँ , जहाँ जहाँ जिन्दगी ने मोड़ देखे हैं। एक अहसास हर मोड़ पर हुआ कि कुछ लोग जो मेरे अपने थे वे छूट गये और फिर एक नया समूह साथ जुड़ गया। लगभग हर मोड़ पर ऐसा ही हुआ। पर इन छूटे हुए लोगों के साथ बिताए वे पल मैंने इस तिजोरी में रख रखे हैं, चाहे वे किसी भी टेस्ट के हों। ये पल मात्र संस्मरण नहीं है अपितु जिन्दगी की चादर में धागों की तरह बुनावट में है।

आज मैं कुछ अन्तरंग पलों को अपने मित्रों, साथियों और पाठकों से शेयर करूँगा। तो चलो मैं शुरुआत करता हूँ उस पल से जिसका मुझे भान ही नहीं है। इस जगत में इस तरह के पल को देखने वाला तो हर सक्ष है पर उसे बोध बिल्कुल भी नहीं है। नौ दस मास गर्भ की अन्धेरी कोठरी में कैद रहता है और अचानक उस एक पल में आँख खोलते ही जगत देख लेता है। यह जिन्दगी का झीरो पॉइन्ट है। पर कैसा लगा होगा यहाँ यह किसी को भी याद नहीं। लोग कहते हैं तुम्हें उल्टा लटकाया गया, थाली पीटी गई और फिर रुलाया गया। तुम्हारे इस रुदन से लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई थी जैसे मैंने नहीं उनकी खुशियों ने जन्म लिया है। इस पल को मैंने लोगों के कथन के रूप में तिजोरी में रख रखा है। सब की तिजोरियाँ ऐसे पलों से आबाद है। जब तक हम होश सम्हालें तब तक हमें माँ-बाप अथवा परिवार के सम्पूर्ण दायित्व और लालन पालन में रहते हैं। हम में से ज्यादातर लोग इन पलों को लगभग भूल जाते हैं। अगर याद भी आये तो यह कह कर टाल देते हैं कि यह हजारों बरस से होता आया है, कोई नई बात नहीं है। लेकिन हमने ऐसी कल्पना कभी नहीं की कि यदि वैसा न हुआ होता तो क्या होता? हम कितने कृतघ्न हैं? बाद की जिन्दगी में इन पलों का की याद हमें अपनों के बहुत करीब ले जायगा। पर इन निर्बोध पलों में भी हम आत्मीयता और 'प्रेम' से पूर्णतया परिचित होते हैं। जीवन का यह कालखण्ड हमारी स्मृति में बहुत कम  रहता है। जिन्दगी के इस मील के पत्थर तक हम सबका अपना जीवन लगभग एक सा ही होता है। इसलिये मेरे पलों का विवरण यहाँ से आगे की ओर चलता है।



एक खाने में बचपन के बहुत थोड़े से उजले पल भरे हैं, मैं जब जब इन्हें उलट-पलट कर देखता हूँ तो आनन्द से भर हो जाता हूँ। इनमें से वे बारी बारी से उठाता हूँ। घर में प्यारी सी दादी 'सूरज' माँ है। मालवा में दादी माँ  सिर्फ 'माँ' कह कर बुलाया जाता है और माँ को 'जीजी' कह कर बुलाया जाता था। दादी का मैं बहुत लाड़ला था। बचपन अभी विदा भी नहीं हुआ था, माँ ने अलविदा कह दिया। पिता मेरे लिये शायद केवल कड़े अनुशासन वाले पालक ही थे। मेरा बचपन संयुक्त परिवार के घने वृक्ष की टहनी पर 'सूखे पत्ते' की तरह टँगा रहा और फिर वक्त बरगूले में घूमते-घूमते पता नहीं कहाँ जा गिरा। संयुक्त परिवार भी लम्बा नहीं चल सका। वह अकेलापन आज भी कटुदंश देता है। 


Friday, 12 May 2023

कनिष्ठिकाएँ

कनिष्ठिकाएँ

1

ठहरे हुए पानी में कंकर फेंकते ही लहरें पैदा हो जाती है। यही कंकर पानी के अन्दरूनी हिस्से में ऐसा नहीं कर पाता। इसी तरह हमारे मन की ऊपरी तह में विचार तरंगें पैदा करते हैं जो हमें उद्विग्न कर देती हैं। हमारे मन की गहराई में असीम शान्ति का सागर है। आनन्द वहाँ नित्य निवास करता है। "आनन्द चाहिये तो मन के भीतर, और भीतर का अन्तर्नाद सुनें।"


2
हम एक मल्टीप्लेक्स जैसे हैं।  हम में क्रोध, शान्ति, संगीत, शोर, प्रेम, घृणा जैसे भिन्न भिन्न भाव भरे पड़े हैं। इनमें से केवल शान्ति ऐसा भाव है जो मानव मात्र में स्वभावतः मौजूद है और कई बार शोर, क्रोध, घृणा जैसे भाव कुछ समय के लिये ज्वार भाटे की तरह आते हैं और व्यक्ति अपने मूल स्वभाव की ओर लौट जाता है। कभी कभी इन विप्लवी भावों का रिमोट कन्ट्रोल किसी और के हाथ में चला जाता है और हम रोबोट हो जाते हैं। इसलिये तुम "जियो अपनी ही तरह से।"

3
जब जब मैं तुम्हें भूलना चाहता हूँ तब तब तुम और भी ज्यादा याद आने लगते हो। क्योंकि याद मिटाने का रबर हमारे पास नहीं है। यादें अतीत की गोपनीय कन्दराओं से निकल निकल कर आती हैं। उस समय तन बदन यहीं पड़ा रहता है और मन उन पुरातन गलियों में दौड़ दौड़ जाता है। उस आभासी रंगमंच में वे सारे परिदृश्य ऐसे सजीव हो उठते हैं जैसे सब वर्तमान में चल रहा हो। इसमें एक मजे दार बात यह भी है कि तुम्हारा मन बहुत सी यादों में से अच्छी और मधुर यादें चुनकर उनका आनन्द ले सकता है परन्तु आक्रान्त क्षणों में यह चुनाव संभव नहीं होता लेकिन इस आवेग के समाप्त होते ही फिर अपना चुनाव संभव है। "चलो स्वर्णिम अतीत से कुछ अच्छा सा ढूँढ लाएँ।"

4
हम शायद कुछ देर के लिये खुश तो हो लिये पर सुखी होना भूल ही गये हैं। ठहाका मारने के पहले हम आस पास देखते हैं कि हमें देख तो वहीं रहा है। "लोग क्या कहेंगे?" एक ऐसा छोटा सा किन्तु बहुत बड़ा प्रश्न है जो हमारी नैसर्गिक चेष्टाओं में विक्षोभ पैदा कर देता है और हम अनैच्छिक औपचारिकता में उतर पड़ते हैं। हम अगर तथाकथित संभ्रान्त लोगों के बीच बैठे हैं और छींक आ गयी, खाँसी आ गई, उबासी आ गई तो हम 'सॉरी' कहते हैं।  क्यूँ भाई? 

5
"सहनाववतु सह नौ भुनक्तु सहवीर्यं करवावहै, तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।" यह हमारी सामूहिकता की वैदिक प्रार्थना है जिसे छोड़ कर हम बच्चों को नं. वन आने के लिये तैयार कर रहे हैं। इसका सीधा सीधा मतलब उसे यह समझाना है कि बाकी सब तुम से नीचे हों, इन्फीरियर हों। तुम उन सब को पीछे छोड़ कर आगे निकलो। यह स्पर्धा की भावना बच्चों के अपने भीतर से निकल कर बाहर आ जाती है और वह अपने भीतर मौजूद श्रेष्ठ को निखारने के बजाय बाहर की प्रतिस्पर्धाओं में जूझने लगता है। नं. वन नहीं मिलने पर कई घातक परिणाम सामने आये हैं। इस स्पर्धा की प्रवृत्ति ने शिक्षा की रीति-नीति और पद्धति को बदल कर रख दिया है। कहाँ थे कहाँ आ गये हैं?

6
मेरे आने से पहले अनगिनत आये भी और चले भी गये। इनको मैने नहीं देखा। जाने के बाद भी आवेंगे और जाते भी रहेंगे उन्हें भी मैं देख नहीं सकूँगा। संसार एक रेलगाड़ी है। एक स्टेशन पर रुकती है तुम भी इसमें एक दिन चढ़े हो। कुछ लोग पहले से सफर में हैं, कुछ तुम्हारे संग बैठे हैं, अपनी अपनी तरह से सफर कर रहें है, कुछ स्टेशनों से चढ़-उतर रहे हैं। इनमें से कुछ लोग तुम पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। "क्या तुमने अपने किसी सहयात्री पर मधुर यादें छोड़ी हैं?

7
अगर कोई समझता है कि वह समय काट रहा है तो उसे ध्यान नहीं है कि असल में समय उसे काट रहा है। कुल उम्र में से तिल तिल कर क्षण घटा रहा है। यह एक दृष्टि है। दूसरी दृष्टि इसी बात के विषय में यह है कि समय ने ये क्षण हमें कुछ सकारात्मक और रचनात्मक कार्यों के लिये उपलब्ध कराये हैं जो अनुपयोगी छोड़ दिये तो ये फिर लौट कर नहीं आवेंगे।   
"समय का सदुपयोग जीवन के मूल्य बढ़ा देता है।"

8
एक मार्ग पर दो तरह की दौड़ चल रही है। एक हिरन की दूसरी शेर की। भय से हिरन जिस मार्ग पर भागता है वह वास्तव में शेर का 'विजयपथ' होता है। लेकिन शेर का शिकार झुण्ड में से केवल वही हिरन होता है जिसमें जिजीविषा की कमी होती है, जो जीवन की आस छोड़ देता है। इस दौड़ में जीवन उसी का शेष रहता है जो तेज दौड़ता है। शेर नहीं दौड़ा तो भूख से मर जावेगा, हिरन नहीं दौड़ा तो शेर का भोजन बन जावेगा। दूसरे शब्दों में "अपनी अपनी दौड़ जीवन की रक्षा की दौड़ है।"

9

एक मरीज जब किसी डॉक्टर के पास जाता है तो अपनी तकलीफें उसे बताता है। अधिकांशत: मामलों में वह डॉ को पूरी तरह नहीं जानता फिर भी वह अपना जीवन एक विश्वास के साथ डॉ के हाथ में सौंप देता है। इतना विश्वास कि डॉ उसे अमृत दे या जहर, वह पूर्ण निष्ठा के साथ उसके आदेश का पालन करता है। हो सकता है सर्जन उसका, सिर, हृदय अथवा किडनी खोल दे। गजब का विश्वास होता है मरीज में कि डॉ के सामने मृत्यु का भय भी कहीं फेंक देता है। ऐसे अधिकतर मरीज पुनर्जीवन और स्वास्थ्य पुनः प्राप्त करते है। यह उनके शरीर और तकनीक की ही नहीं एक परस्पर दृढ़ विश्वास की जीत है।

10
मेरे भीतर जो इच्छाएँ जन्म लेती है उसकी आपूर्ति मैं किसी संसाधन से अपने ढंग से करने लगता हूँ। इनमें से कुछ इच्छाएँ पूरी होती है और कुछ नहीं भी हो पाती है। यहाँ तक तो ठीक है परन्तु अगर मेरे आसपास बाजार के लोग कुछ सामान मेरी इच्छा पर जबरन लाद दें और मैं उसमें फँस जाता दूँ तो मैं बहुत बड़ा स्टुपिड हूँ। ऐसे समय में उस चौपाये की तरह हो जाता हूँ जिसे एक मालिक उसकी मर्जी से चारा खिलावे, बर्सिम खिलावे, भूसा खिलावे या भूखा ही रखे। आज कल "एक के साथ एक फ्री" भी इसी तरह का इन्द्रजाल है। श्याणे लोग इसमें ज्यादा फँसते हैं। 
इसलिये "हम अपना जीवन अपने विवेक और अपनी शर्तों पर जियें।"

11
जिन्दा रहने के लिये माल असबाब जरूरी है? या माल असबाब जुटाने के लिये जिन्दा रहना जरूरी है? छोटे छोटे इन प्रश्नों का उत्तर यदि हम स्वयं से पूछ लें तो हमारी जीवन शैली में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ सकते हैं।
प्रथम दृष्टया शायद दोनों एक दूसरे के लिये जरूरी है। पर दोनों में से पहला चुनाव कौनसा और अन्तिम चुनाव कौनसा होना चाहिये? निश्चित रूप से पहला जवाब है "जिन्दा रहना जरूरी है'। 
तो आप सिर्फ माल असबाब के लिये जिन्दगी दाँव पर लगाओगे क्या?

12
केक्टस में कॉंटे भी होते हैं और फूल भी और गुलाब के पौधे में भी काँटे भी होते हैं फूल भी पर केक्टस की पहचान काँटे से और गुलाब की पहचान फूल से होती है। क्यों? क्योंकि केक्टस के काँटे और गुलाब के फूल ज्यादा खूबसूरत हैं। महलों के टूटे फूटे खण्डहरों में भी कोई न कोई खूबसूरत इतिहास होता है। सूरज में सिर्फ आग ही का नहीं क्या हमें उसमें से जगत को पालन करने वाली जीवनी उर्जा का निरन्तर प्रदान करने वाली शक्ति का आभास नहीं है? चाँद में अगर हमने दाग ही दाग देखे हैं उसकी शीतल चाँदनी का आनन्द हमें नहीं लुभाता। जैसे प्रकृति की हर संरचना में कोई न कोई खूबसूरती है हम उसे उस नजरिये से देखते ही नहीं हैं। हमारे भीतर भी एक से बढ़ कर एक एब हो सकती है पर "जिन्दगी कितनी खूबसूरत है" इसे हम देख नहीं पावें तो हम से बड़ी चूक हो रही है।


कनिष्ठिकाएँ (प्रथम) 
कनिष्ठिकाएँ (द्वितीय)
कनिष्ठिकाएँ  (तृतीय) 







Thursday, 11 May 2023

57

लहर-लहर
57
हमारे आँगन में

वे हमारे अतिथि हैं, मित्र है, सहचर हैं और हमारे ऑक्सीजन प्लान्ट हैं। अतिथी इसलिये कि ये सारे पेड़ पौधे कहीं न कहीं से हमारे आँगन मे पधारे हैं। ये सभी हमारे आँगन में बारी बारी से उतरे हैं। मित्र इस तरह कि वे हमारे सुख-दु:ख के साथी है। मौसमों के कोप से रक्षा करते हैं। सहचर इस तरह कि ये साथ ही रहते हैं।
देखो! यहाँ हारसिंगार हँसता है, पास ही सफेद अकउआ (आँक) वायव्य कोने में स्थित है जिसके सफेद पुष्पगुच्छ मेरे आराध्य देव शिव को परम प्रिय है। इसी के करीब में मीठा नीम अपनी केरेक्टर स्मेल और स्वाद ले कर खड़ा है और हमारे मनमोहन के रुचिरभोग के लिये अपनी सुगन्धित और स्वादिष्ट पत्तियाँ प्रदान करता है। फिर यह  बिल्व अपने त्रिदल से त्रिपुरारी शिव को बिल्वाष्टक सुनाता है। ये पत्र त्रयम्बकेश्वर को रात दिन लगा रहे हैं मानस-त्रिपुण्ड। मधुमालती स्वजन और अतिथियों के स्वागत में खड़ी है गुलाबी श्वेत पुष्पों की झालर लिये। क्यारी में दो महकते हैं मोगरे के फूल अपनी नैसर्गिक सुगन्ध से महकते हैं। यहीं पास में है तुलसाँ महारानी विराज रही है जो स्वामिनी है इस उपवन की पुण्य-प्रभा की। चीकू तो हमारे घर की पहचान बनी हुई है। इस पर मधुपरियाँ कभी कभी अपना घर बनाती रहती हैं। इसके पड़ोस में गिट्टेदार मोगरे का नन्हा पेड़ भी खड़ा है जो पावस में पुष्प देता है।
आँगन के केन्द्र में लंगड़ा आम खड़ा है जो हर बसन्त में अपनी आम्र-मंजरियों से महकाता है घर मोहल्ले को, कोकिला को मिठास भरी कुहक सुनाने के लिये निमन्त्रण देता है। हमने इसके आम कभी नहीं तोड़े, जो 'साग' बन कर गिरे वो हमारे बाकी सब पंछियों के होते हैं। इसकी एक डाल पर परमार्थ टँगा है, चिड़िया के दाने भर कर और साथ में एक सकोरा भी शीतल जल भर कर। गिलहरियों के चंचल दो जोड़े तिड़िप तिड़िप कर शोर करते रहते हैं। वहीं दाना, वहीं पानी और वहीं फल। नींबू का नन्हा सा पेड़ हमारे लिये विटामिन सी का प्रचुर भण्डार तैयार करता है। नैऋत्य कोण में द्वार से लगा हुआ रक्तपुष्प लिये गुड़हल माँ दुर्गा और गणाध्यक्ष के पूजन के लिये तत्पर है। समस्त संसार के कण कण को प्राण और ऊर्जा प्रदान करने वाले भुवन भास्कर अपनी सहस्रों किरणें ले कर छत पर उतरते हैं और बिजली के तार अनुप्राणि हो उठते हैं। दशहरी आम का पौधा अभी किशोर वय को प्राप्त कर चुका है। इन सभी पेड़ पौधों से हमारे मौन संवाद चलते ही रहते हैं। हम इनसे सिर्फ उतना ही लेते हैं जिससे हमारी पूजा-पुजापा संपन्न हो जावे। हम इनके ऋणी हैं इसलिये हम इनके सेवादार हैं।
कुछ इस तरह मैं "अपने बाहर के शहर में अपने भीतर का मेरा अपना गाँव ढूँढता रहता हूँ।"

रामनारायण सोनी
७.५.२३
 

Thursday, 4 May 2023

आत्मानुसन्धान 55

भण्डार में पड़ा अनाज का दाना मात्र एक दाना ही है पर जब तक उसे उगाने के लिए तैयार न किया जाए। जब उसे अपने मूल स्रोत की ओर यात्रा करना है तब वह "बीज" कहलाता है, उसकी संज्ञा बदल जाती है, पहिचान बदल जाती है, उद्देश्य बदल जाता है। फिर भी इस दाने की यात्रा वृक्ष तक की तब तक असम्भव है जब तक वह बीज होने की प्रक्रिया से न गुजरे। जब उसकी यह यात्रा प्रारंभ होगी तब इस दाने को शीत, आतप और अंकुरण की प्रसव वेदना से गुजरना होता है। 
बीज अपनी देह से अंकुरण की प्राथमिक ऊर्जा का उत्सर्जन करता है और स्वयं को समाप्त कर लेता है। फिर आगे की तैयारी के लिये उसे दोनो दिशाएँ ढूँढनी होती है एक धरती की कोख की ओर और दूसरी आकाश के विस्तीर्ण आयाम। एक दिशा अन्धकार की है और दूसरी प्रकाश की। एक से स्थायित्व और जीवन का सत्व मिलता है और दूसरे से विकास। यही संतुलन उसे वृक्ष की संपूर्ण यात्रा भर तक चलता है। पहले उसे ऊँचा उठना है फिर गहराना है। पहला ऊर्ध्व विकास और दूसरा क्षैतिज; अंग्रेजी में कहें तो वर्टीकल और हॉरीजेन्टल डेवलपमेन्ट। जीवन भर एक संघर्ष उसे धरती के गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध करना होगा तभी वृक्ष में जल की आपूर्ति संभव होगी और दूसरा उसे अपना भोजन बहती हवा से निकालना है। बीज का उत्सर्ग इसलिये कहा जा रहा है कि जैसे आम का बीज बोया और उसका वृक्ष बन जाने पर न तो बीज शेष रहता है न उस बीज का मूल नाम ही। अपने शरीर और नाम दोनों का त्याग यहाँ अपने आप हो जाता है। बीज अब इन दोनों से मुक्त है। बीज के इस संपूर्ण प्रक्रिया से गुजर कर जिस वृक्ष से वह बीज आया था आज फिर वही अपने मूल रूप वृक्ष तक पहुँच गया है। "आम से चल कर आम होना एक खास बात है।" 
वस्तुतः तुम अगर बीज हो सकते हो तो रूपान्तरित हो कर अपने मूल रूप "वृक्ष" रूपी आत्म को प्राप्त हो सकते हो क्योंकि "बीज होना वृक्ष का सूक्ष्म स्वरूप में स्थित होना ही तो है।" 
तो अब समझ लो कि तुम्हें बीज हो जाना है। अगर मुक्त होना है तो अपने "स्व" के उत्सर्ग की तैयारी करो। उत्सर्ग करो अपने स्व का, अपने साथ चल रही संज्ञा का, उपाधि स्वरूप चल रहे अपने नाम का। तुम्हें प्राप्त हाेना है अपने आत्म स्वरूप को।
इसलिए संकल्प करो इनसे मुक्त होने का, अपनी नैसर्गिक दिशाएँ पाने का, अपने मूल स्वरूप को प्राप्त होने का। "तत्वमसि"।

रामनारायण सोनी




Tuesday, 2 May 2023

3 posts

51
अंकुरण से ले कर विशाल वृक्ष होने तक की यात्रा में सब से महत्वपूर्ण समय है- प्रथम अंकुरण से उस नन्हे पौधे तक का विकास। अंकुरण के भी दो प्रभाग है- पौधे का ऊपरी भाग आकाश और निचला भाग पाताल की ओर चल पड़ता है। जन्मते ही उसकी जड़ें धरती में अपना जमाव और नमी खोजने निकल पड़ती है और ऊपरी भाग हवा और प्रकाश ढूँढने चल पड़ता है। जडें मजबूत हों, वृक्ष का जब तना पुष्ट हों और शाखाओं, फूलो, फलों से वह लदा हो तब वह वृक्ष स्वयं को सर्वाइव कर लेता है। नन्हे पौधे को संरक्षण, संस्कार और अत्यधिक संभालने की जरूरत होती है। ठीक इसी तरह मनुष्य को बचपन में यह सब आवश्यक होता है। इसलिये प्राथमिक स्तर और आयु में ही सम्यक शिक्षा की जरूरत है। मैं इन्हें गुरूजी मानता हूँ। मैं यह इसलिये भी कह रहा हूँ कि जब मैं अपने गांव जाता था तो अपने शिक्षकों के प्रति मेरा सम्बोधन होता था "गुरूजी प्रणाम!" और जब मैं उनके चरण स्पर्श करता था उस समय उनके चेहरे पर नितान्त सौम्य और आशीष के भाव आते थे, उसमें मुझे अलौकिक दिव्यता दिखाई देती थी। इन महत्वपूर्ण घटनाओं को मैं जीवन भर कभी नहीं भूला। बाद की शिक्षा में जो शिक्षक रहे वे सभी आदरणीय हैं पर वे गुरूजी सदैव मेरे लिये पूज्यनीय रहे हैं। मैं उन्हें प्रणत भाव से नमन करता हूँ।
मुझे अच्छी तरह याद है उस बाँस की जाफरी वाली उस पाठशाला का वह पहला दिन। जूट की टाटपट्टी पर माँ ने ले जा कर बैठा दिया था। हाथ के सिले जूट के झोले में थी बस एक स्लेट और खड़िया की कलम जिसे हम पेम-पट्टी कहते थे। एक पूर्ण आश्वस्ती के साथ  पाठशाला को और मेरे पूज्य गुरू को सौंप कर
माँ अपनी उँगली छुड़ा कर चली गई।
माँ के कहे अनुसार गुरूदेव के कक्षा में आने पर मैंने अपने प्रथम गुरुदेव पूज्यपाद श्री मदनलाल जी वर्मा के श्रीचरणों में षाष्टांग प्रणाम किया। वह एक रोमांच भरा क्षण था। मैं आज भी अपने भाल पर उन पावन चरणों का स्पर्श महसूस करता हूँ और श्रृद्धा भाव से लबालब भर जाता हूँ।
इस तरह से मैं अपने कुल से गुरुकुल में प्रविष्ट हो गया। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ और धन्यवाद करता हूँ कि मैं शिक्षा के उस मन्दिर में प्रतिष्ठित हुई उन प्रथम जड़ों को और गुरू के आशीर्वाद को कभी नहीं भूलूँ।

रामनारायण सोनी
५.०९ .२२

52

जरूरी क्या है?
यह प्रश्न जीवन का विस्तार के लिये जरूरी है पर 'क्या क्या जरूरी है?' यह एक बड़ी वितृष्णा को जन्म देने वाला है। क्या जरूरी है? यह जीवन की आवश्यकता है पर आवश्यकता की परिधि को पार कर जाना मरुस्थल भागते हुए उस हिरन की तरह है जिसके नसीब में सिर्फ दौड़ है। वह दौड़ जो सिद्ध कर देती है कि तुमने प्यास बढ़ाई है, बुझाई नहीं। इस से तो अच्छा था तुम आवश्यकता की उस परिधि के भीतर ही खड़े रहते। भौतिक सुखों की चाह और दुनिया का बाजार यह कहता है कि यह विचार तो मानव जाति का विकास रोकता है पर यह डिमान्ड एण्ड सप्लाय के सिद्धान्त को कहाँ मना करता है। अतः आवश्यकता की आपूर्ति के लिये मनाही नहीं है। जब हमें अच्छी तरह से पता है कि लास्ट रिक्वायरमेन्ट दो गज जमीन है तो फिर अन्धी दौड़ में हर कोई क्यों लगा है? "कबीर थोड़ा जीवना, मांडे बहुत मंड़ाण।" 

प्रकृति का हर अंग न तो प्रतिस्पर्धा करता है न प्रतिघात। एक पेड़ ने कभी नहीं चाहा कि बगल का पेड़ उससे ऊँचा न हो। बड़ी नदियाँ छोटी नदियों से कहती हैं आओ हम साथ मिल कर चलते हैं अपने उस गन्तव्य सागर की ओर। पवन कहती है कि चलो खुशबुओं से संसार को और सुगन्धमय बनाते हैं। सारे ग्रह उपग्रह अपने सूरज के परिवार में जुड़े हुए चल रहे हैं अपने अपने संयम से। कोई अतिक्रमण नहीं करता अपनी स्वयं की बनाई आचार सहिता का। पंछी आज सुबह उड़ेगा अपनी भूख प्यास ले कर और लौटेगा एक परितोष भरी तृप्ति ले कर। उस के अपने संग कोई संग्रह नहीं होगा। अपनी भूख के अनुसार ही अपना पेट भरेगा।

हम न वक्त की चाल रोक सकते है, न शरीर की यात्रा और न ही जन्म और मृत्यु की आवृत्तियाँ ही। विज्ञान ने हमें सुख तो कई दिये हैं पर संतोष नही उल्टे हमें तेज, और तेज दौड़ना सिखा दिया। जीवन तमाम आवश्यकताओं से भरा पड़ा है पर इसकी आपूर्ति के बीच संतोष तक सीमित रहे तो बेहतर होगा।
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।। श्रीमद्भगवद्गीता १६/१३।।

रामनारायण सोनी
१९.०८.२२

52
पतझर आया और सूख कर जर्द हुए पात सब के सब झर गये। फिर बिसर गई वह टहनी भी जिस पर उन्होंने पूरा जीवन जिया फिर इस करुणा भरी कथा को अब जग से क्यों कहनी?
इस करुणा के प्रस्फुटित बीजों में विगत का विरह और आगत का अन्तर्द्वन्द्व स्पष्ट देखा जा सकता है। नियति की तीखी तलवार इन सूखे पत्तों पर कच्चे धागे से लटकी दिखाई देती है।
ये कोपलें जो अभी अभी फूटी हैं उन विगत पत्तों की वंशज है।
संसृति के पोषण हेतु सृष्टि का यह अनवरत क्रम है और आगे भी चलता ही रहेगा। सब के सब उस क्रम में ही गुजर रहे हैं। संसार में चल रहे ये सब के सब रंगमंच के कोई न कोई पात्र हैं और अपना किरदार निभा रहे हैं। कबीर कह गया -"आया है तो जायगा राजा, रंक, फ़कीर।" एक उजागर सत्य है कि नव पल्लव एक दिन पुराना पड़ेगा और वही का वही इतिहास फिर फिर दोहराया जावेगा जो अपने पूर्व के पत्तों ने निभाया है। अगर ऐसा है ही तो फिर इसे बार बार क्यों याद दिलाया जावे? याद रखना चाहिये कि जो अवश्यंभावी है उसका प्रतिरोध कैसा?
इस तथ्य को अपने दिल में धारण कर फिर इस कल कल करती जीवन सरिता में स्वच्छन्द बहने का आनन्द क्यों न लें। आओ! चलो! मिल कर बहें! खुल कर बहें! धारा के संग बहें! जीवन के इन रास्तों में कई खूबसूरत मोड़ होंगे, सुन्दर झरने होंगे, कल कल करते प्रपात होंगे, धीर गंभीर मन्थर गतियाँ होंगी, सुहाने तट मिलेंगे। हम अगर नाव की तरह नहीं बन पावे तो एक अदने से तिनके की तरह ही सहज बहें! विश्वास करें कि इस जीवन का वह प्रदाता अतुल्य है, वैभवशाली है तो उसकी बनाई यह जीवन सरिता भी भव्य ही होगी। हमे स्वयं ही यह बोध हो जाना चाहिये। यह भी याद रहना चाहिये कि "हम से बेहतर हमें कोई और नहीं जानता।"
महसूस करें कि एक आनन्द से परिपूर्ण अन्तर्प्रवाह हमारे भीतर ही भीतर अनवरत चल रहा है। जो पल बीत गये सो बीत गए, उन्हें कोई नहीं लौटा पाएगा। जो आने वाले कल में होना है वह कल का सूरज ही बताएगा। यह भी याद रहे कि समय बड़ा बलशाली है, नियन्ता है सब वही लाएगा और समेट कर फिर वही ले भी जाएगा। इसलिये कल कोई सा भी हो, कैसा भी हो चिन्ता कैसी?
"हमारा वर्तमान हमारी मुट्ठी में है। जियें जी भर कर। आज में जिएं। अभी में जिएं।"

रामनारायण सोनी

53

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्त मध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।2/28।। श्रीमद्भगवद्गीता।।
बहती हुई उस नदी को ध्यान से देखो। हमारे जीवन में और इस नदी में कितनी बातें एक सी हैं यह नदी हमें अध्यात्म, दर्शन और जीने की राह बताती है।
नदी का जन्म नहीं होता है वह भूगर्भ से प्रकट होती है। नदी का अवसान भी नहीं होता है अपितु वह सागर में जा कर अदृश्य हो जाती है अर्थात् अप्रकट हो जाती है। बीच में ही वह बहती दिखाई देती है। हमारे जीवन की नदी भी हमारे जन्म और मृत्यु के दो सिरों के बीच बहती है। स्पष्ट है कि जन्म उद्गम है और मृत्यु अवसान। नदी के प्रवाह की तरह हमारे जीवन में भी गति है। यह 'गति' संकेत करती है उस चेतना और ऊर्जा की ओर जो सम्पूर्ण जीवन में साथ चलती है पर कहीं दिखाई नहीं देती है परन्तु इसी के कारण जीवन विद्यमान है। गतिमान होना ही जीवित होने का संकेत है। नदी का जीवन तात्विक रूप से देखा जाय तो उसकी देह का एक नैसर्गिक गुण है फिर यह नदी अन्त में सागर में समाहित होने के पूर्व मुहाने पर अन्तिम रूप से दिखाई देती है। किसी ने खूब कहा है-

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा,
मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा...!!

 हमारे जीवन के सम्पूर्ण सर्ग के उपसंहार में जीवन का संकुचन मात्र ही तो है। यह संकुचन मुट्ठी भर राख के रूप में दिखाई देता है और अन्त में या तो जल में प्रवाहित कर दिया जाता है या उसे हवा उड़ा ले जाती है।
इस गतिमान जीवन के द्वारा पीछे छोड़ी गई रेखाएँ ही जीवन के अभिलेख हैं जिसे जाने अनजाने में तुम ने ही लिखे हैं। इस प्रक्रिया में जो कुछ भी पीछे छूट गया है उसके साथ जुड़ा रहेगा तुम्हारा नाम, कथानक, यश और अपयश।

रामनारायण सोनी
२-०५-२३