मेरे पास एक तिजोरी है पर बिना ताले की। वह एक हलके से हेंडिल से खुलती है। इसमें अलग अलग चौखाने हैं। एक तहखाना भी है। जब भी मैं खाली हो कर बैठता हूँ तो इसे खोल कर देखता हूँ। इस तिजारी में मैंने मेरे अपने, हाँ निखालिस अपने पल सिलसिलेवार खानों में करीने से जमा रखे हैं। खूबसूरत पल, आनन्द के पल, जिन्दगी के अलग अलग मोड़ के पल, मिलन के बिछड़ने के पल, सुख के पल-दुःख के पल।
कुछ पल ऐसे भी हैं जिनका साया आज तक पीछा नहीं छोड़ रहे हैं और यह साया जिन्दगी के सफेद कागजों को भरने लगता है। जिन्दगी के इन पलों को भाग्य और प्रारब्ध ने मिल कर नौ रसों में अलग अलग डुबोया है। विधाता ने अपनी प्रकृति में छह रस बनाए पर धरती पर हमारा मन नौ रसों के ताप-शाप से गुजरता है।
पलों के भिन्न- भिन्न खाने मेरी जिन्दगी और उम्र के रास्ते से मील के पत्थरों की तरह जुड़े हैं। मैं उन्हें आज फिर से याद कर रहा हूँ , जहाँ जहाँ जिन्दगी ने मोड़ देखे हैं। एक अहसास हर मोड़ पर हुआ कि कुछ लोग जो मेरे अपने थे वे छूट गये और फिर एक नया समूह साथ जुड़ गया। लगभग हर मोड़ पर ऐसा ही हुआ। पर इन छूटे हुए लोगों के साथ बिताए वे पल मैंने इस तिजोरी में रख रखे हैं, चाहे वे किसी भी टेस्ट के हों। ये पल मात्र संस्मरण नहीं है अपितु जिन्दगी की चादर में धागों की तरह बुनावट में है।
आज मैं कुछ अन्तरंग पलों को अपने मित्रों, साथियों और पाठकों से शेयर करूँगा। तो चलो मैं शुरुआत करता हूँ उस पल से जिसका मुझे भान ही नहीं है। इस जगत में इस तरह के पल को देखने वाला तो हर सक्ष है पर उसे बोध बिल्कुल भी नहीं है। नौ दस मास गर्भ की अन्धेरी कोठरी में कैद रहता है और अचानक उस एक पल में आँख खोलते ही जगत देख लेता है। यह जिन्दगी का झीरो पॉइन्ट है। पर कैसा लगा होगा यहाँ यह किसी को भी याद नहीं। लोग कहते हैं तुम्हें उल्टा लटकाया गया, थाली पीटी गई और फिर रुलाया गया। तुम्हारे इस रुदन से लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई थी जैसे मैंने नहीं उनकी खुशियों ने जन्म लिया है। इस पल को मैंने लोगों के कथन के रूप में तिजोरी में रख रखा है। सब की तिजोरियाँ ऐसे पलों से आबाद है। जब तक हम होश सम्हालें तब तक हमें माँ-बाप अथवा परिवार के सम्पूर्ण दायित्व और लालन पालन में रहते हैं। हम में से ज्यादातर लोग इन पलों को लगभग भूल जाते हैं। अगर याद भी आये तो यह कह कर टाल देते हैं कि यह हजारों बरस से होता आया है, कोई नई बात नहीं है। लेकिन हमने ऐसी कल्पना कभी नहीं की कि यदि वैसा न हुआ होता तो क्या होता? हम कितने कृतघ्न हैं? बाद की जिन्दगी में इन पलों का की याद हमें अपनों के बहुत करीब ले जायगा। पर इन निर्बोध पलों में भी हम आत्मीयता और 'प्रेम' से पूर्णतया परिचित होते हैं। जीवन का यह कालखण्ड हमारी स्मृति में बहुत कम रहता है। जिन्दगी के इस मील के पत्थर तक हम सबका अपना जीवन लगभग एक सा ही होता है। इसलिये मेरे पलों का विवरण यहाँ से आगे की ओर चलता है।
एक खाने में बचपन के बहुत थोड़े से उजले पल भरे हैं, मैं जब जब इन्हें उलट-पलट कर देखता हूँ तो आनन्द से भर हो जाता हूँ। इनमें से वे बारी बारी से उठाता हूँ। घर में प्यारी सी दादी 'सूरज' माँ है। मालवा में दादी माँ सिर्फ 'माँ' कह कर बुलाया जाता है और माँ को 'जीजी' कह कर बुलाया जाता था। दादी का मैं बहुत लाड़ला था। बचपन अभी विदा भी नहीं हुआ था, माँ ने अलविदा कह दिया। पिता मेरे लिये शायद केवल कड़े अनुशासन वाले पालक ही थे। मेरा बचपन संयुक्त परिवार के घने वृक्ष की टहनी पर 'सूखे पत्ते' की तरह टँगा रहा और फिर वक्त बरगूले में घूमते-घूमते पता नहीं कहाँ जा गिरा। संयुक्त परिवार भी लम्बा नहीं चल सका। वह अकेलापन आज भी कटुदंश देता है।