Friday, 12 May 2023

कनिष्ठिकाएँ

कनिष्ठिकाएँ

1

ठहरे हुए पानी में कंकर फेंकते ही लहरें पैदा हो जाती है। यही कंकर पानी के अन्दरूनी हिस्से में ऐसा नहीं कर पाता। इसी तरह हमारे मन की ऊपरी तह में विचार तरंगें पैदा करते हैं जो हमें उद्विग्न कर देती हैं। हमारे मन की गहराई में असीम शान्ति का सागर है। आनन्द वहाँ नित्य निवास करता है। "आनन्द चाहिये तो मन के भीतर, और भीतर का अन्तर्नाद सुनें।"


2
हम एक मल्टीप्लेक्स जैसे हैं।  हम में क्रोध, शान्ति, संगीत, शोर, प्रेम, घृणा जैसे भिन्न भिन्न भाव भरे पड़े हैं। इनमें से केवल शान्ति ऐसा भाव है जो मानव मात्र में स्वभावतः मौजूद है और कई बार शोर, क्रोध, घृणा जैसे भाव कुछ समय के लिये ज्वार भाटे की तरह आते हैं और व्यक्ति अपने मूल स्वभाव की ओर लौट जाता है। कभी कभी इन विप्लवी भावों का रिमोट कन्ट्रोल किसी और के हाथ में चला जाता है और हम रोबोट हो जाते हैं। इसलिये तुम "जियो अपनी ही तरह से।"

3
जब जब मैं तुम्हें भूलना चाहता हूँ तब तब तुम और भी ज्यादा याद आने लगते हो। क्योंकि याद मिटाने का रबर हमारे पास नहीं है। यादें अतीत की गोपनीय कन्दराओं से निकल निकल कर आती हैं। उस समय तन बदन यहीं पड़ा रहता है और मन उन पुरातन गलियों में दौड़ दौड़ जाता है। उस आभासी रंगमंच में वे सारे परिदृश्य ऐसे सजीव हो उठते हैं जैसे सब वर्तमान में चल रहा हो। इसमें एक मजे दार बात यह भी है कि तुम्हारा मन बहुत सी यादों में से अच्छी और मधुर यादें चुनकर उनका आनन्द ले सकता है परन्तु आक्रान्त क्षणों में यह चुनाव संभव नहीं होता लेकिन इस आवेग के समाप्त होते ही फिर अपना चुनाव संभव है। "चलो स्वर्णिम अतीत से कुछ अच्छा सा ढूँढ लाएँ।"

4
हम शायद कुछ देर के लिये खुश तो हो लिये पर सुखी होना भूल ही गये हैं। ठहाका मारने के पहले हम आस पास देखते हैं कि हमें देख तो वहीं रहा है। "लोग क्या कहेंगे?" एक ऐसा छोटा सा किन्तु बहुत बड़ा प्रश्न है जो हमारी नैसर्गिक चेष्टाओं में विक्षोभ पैदा कर देता है और हम अनैच्छिक औपचारिकता में उतर पड़ते हैं। हम अगर तथाकथित संभ्रान्त लोगों के बीच बैठे हैं और छींक आ गयी, खाँसी आ गई, उबासी आ गई तो हम 'सॉरी' कहते हैं।  क्यूँ भाई? 

5
"सहनाववतु सह नौ भुनक्तु सहवीर्यं करवावहै, तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।" यह हमारी सामूहिकता की वैदिक प्रार्थना है जिसे छोड़ कर हम बच्चों को नं. वन आने के लिये तैयार कर रहे हैं। इसका सीधा सीधा मतलब उसे यह समझाना है कि बाकी सब तुम से नीचे हों, इन्फीरियर हों। तुम उन सब को पीछे छोड़ कर आगे निकलो। यह स्पर्धा की भावना बच्चों के अपने भीतर से निकल कर बाहर आ जाती है और वह अपने भीतर मौजूद श्रेष्ठ को निखारने के बजाय बाहर की प्रतिस्पर्धाओं में जूझने लगता है। नं. वन नहीं मिलने पर कई घातक परिणाम सामने आये हैं। इस स्पर्धा की प्रवृत्ति ने शिक्षा की रीति-नीति और पद्धति को बदल कर रख दिया है। कहाँ थे कहाँ आ गये हैं?

6
मेरे आने से पहले अनगिनत आये भी और चले भी गये। इनको मैने नहीं देखा। जाने के बाद भी आवेंगे और जाते भी रहेंगे उन्हें भी मैं देख नहीं सकूँगा। संसार एक रेलगाड़ी है। एक स्टेशन पर रुकती है तुम भी इसमें एक दिन चढ़े हो। कुछ लोग पहले से सफर में हैं, कुछ तुम्हारे संग बैठे हैं, अपनी अपनी तरह से सफर कर रहें है, कुछ स्टेशनों से चढ़-उतर रहे हैं। इनमें से कुछ लोग तुम पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। "क्या तुमने अपने किसी सहयात्री पर मधुर यादें छोड़ी हैं?

7
अगर कोई समझता है कि वह समय काट रहा है तो उसे ध्यान नहीं है कि असल में समय उसे काट रहा है। कुल उम्र में से तिल तिल कर क्षण घटा रहा है। यह एक दृष्टि है। दूसरी दृष्टि इसी बात के विषय में यह है कि समय ने ये क्षण हमें कुछ सकारात्मक और रचनात्मक कार्यों के लिये उपलब्ध कराये हैं जो अनुपयोगी छोड़ दिये तो ये फिर लौट कर नहीं आवेंगे।   
"समय का सदुपयोग जीवन के मूल्य बढ़ा देता है।"

8
एक मार्ग पर दो तरह की दौड़ चल रही है। एक हिरन की दूसरी शेर की। भय से हिरन जिस मार्ग पर भागता है वह वास्तव में शेर का 'विजयपथ' होता है। लेकिन शेर का शिकार झुण्ड में से केवल वही हिरन होता है जिसमें जिजीविषा की कमी होती है, जो जीवन की आस छोड़ देता है। इस दौड़ में जीवन उसी का शेष रहता है जो तेज दौड़ता है। शेर नहीं दौड़ा तो भूख से मर जावेगा, हिरन नहीं दौड़ा तो शेर का भोजन बन जावेगा। दूसरे शब्दों में "अपनी अपनी दौड़ जीवन की रक्षा की दौड़ है।"

9

एक मरीज जब किसी डॉक्टर के पास जाता है तो अपनी तकलीफें उसे बताता है। अधिकांशत: मामलों में वह डॉ को पूरी तरह नहीं जानता फिर भी वह अपना जीवन एक विश्वास के साथ डॉ के हाथ में सौंप देता है। इतना विश्वास कि डॉ उसे अमृत दे या जहर, वह पूर्ण निष्ठा के साथ उसके आदेश का पालन करता है। हो सकता है सर्जन उसका, सिर, हृदय अथवा किडनी खोल दे। गजब का विश्वास होता है मरीज में कि डॉ के सामने मृत्यु का भय भी कहीं फेंक देता है। ऐसे अधिकतर मरीज पुनर्जीवन और स्वास्थ्य पुनः प्राप्त करते है। यह उनके शरीर और तकनीक की ही नहीं एक परस्पर दृढ़ विश्वास की जीत है।

10
मेरे भीतर जो इच्छाएँ जन्म लेती है उसकी आपूर्ति मैं किसी संसाधन से अपने ढंग से करने लगता हूँ। इनमें से कुछ इच्छाएँ पूरी होती है और कुछ नहीं भी हो पाती है। यहाँ तक तो ठीक है परन्तु अगर मेरे आसपास बाजार के लोग कुछ सामान मेरी इच्छा पर जबरन लाद दें और मैं उसमें फँस जाता दूँ तो मैं बहुत बड़ा स्टुपिड हूँ। ऐसे समय में उस चौपाये की तरह हो जाता हूँ जिसे एक मालिक उसकी मर्जी से चारा खिलावे, बर्सिम खिलावे, भूसा खिलावे या भूखा ही रखे। आज कल "एक के साथ एक फ्री" भी इसी तरह का इन्द्रजाल है। श्याणे लोग इसमें ज्यादा फँसते हैं। 
इसलिये "हम अपना जीवन अपने विवेक और अपनी शर्तों पर जियें।"

11
जिन्दा रहने के लिये माल असबाब जरूरी है? या माल असबाब जुटाने के लिये जिन्दा रहना जरूरी है? छोटे छोटे इन प्रश्नों का उत्तर यदि हम स्वयं से पूछ लें तो हमारी जीवन शैली में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ सकते हैं।
प्रथम दृष्टया शायद दोनों एक दूसरे के लिये जरूरी है। पर दोनों में से पहला चुनाव कौनसा और अन्तिम चुनाव कौनसा होना चाहिये? निश्चित रूप से पहला जवाब है "जिन्दा रहना जरूरी है'। 
तो आप सिर्फ माल असबाब के लिये जिन्दगी दाँव पर लगाओगे क्या?

12
केक्टस में कॉंटे भी होते हैं और फूल भी और गुलाब के पौधे में भी काँटे भी होते हैं फूल भी पर केक्टस की पहचान काँटे से और गुलाब की पहचान फूल से होती है। क्यों? क्योंकि केक्टस के काँटे और गुलाब के फूल ज्यादा खूबसूरत हैं। महलों के टूटे फूटे खण्डहरों में भी कोई न कोई खूबसूरत इतिहास होता है। सूरज में सिर्फ आग ही का नहीं क्या हमें उसमें से जगत को पालन करने वाली जीवनी उर्जा का निरन्तर प्रदान करने वाली शक्ति का आभास नहीं है? चाँद में अगर हमने दाग ही दाग देखे हैं उसकी शीतल चाँदनी का आनन्द हमें नहीं लुभाता। जैसे प्रकृति की हर संरचना में कोई न कोई खूबसूरती है हम उसे उस नजरिये से देखते ही नहीं हैं। हमारे भीतर भी एक से बढ़ कर एक एब हो सकती है पर "जिन्दगी कितनी खूबसूरत है" इसे हम देख नहीं पावें तो हम से बड़ी चूक हो रही है।


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कनिष्ठिकाएँ (द्वितीय)
कनिष्ठिकाएँ  (तृतीय) 







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