भण्डार में पड़ा अनाज का दाना मात्र एक दाना ही है पर जब तक उसे उगाने के लिए तैयार न किया जाए। जब उसे अपने मूल स्रोत की ओर यात्रा करना है तब वह "बीज" कहलाता है, उसकी संज्ञा बदल जाती है, पहिचान बदल जाती है, उद्देश्य बदल जाता है। फिर भी इस दाने की यात्रा वृक्ष तक की तब तक असम्भव है जब तक वह बीज होने की प्रक्रिया से न गुजरे। जब उसकी यह यात्रा प्रारंभ होगी तब इस दाने को शीत, आतप और अंकुरण की प्रसव वेदना से गुजरना होता है।
बीज अपनी देह से अंकुरण की प्राथमिक ऊर्जा का उत्सर्जन करता है और स्वयं को समाप्त कर लेता है। फिर आगे की तैयारी के लिये उसे दोनो दिशाएँ ढूँढनी होती है एक धरती की कोख की ओर और दूसरी आकाश के विस्तीर्ण आयाम। एक दिशा अन्धकार की है और दूसरी प्रकाश की। एक से स्थायित्व और जीवन का सत्व मिलता है और दूसरे से विकास। यही संतुलन उसे वृक्ष की संपूर्ण यात्रा भर तक चलता है। पहले उसे ऊँचा उठना है फिर गहराना है। पहला ऊर्ध्व विकास और दूसरा क्षैतिज; अंग्रेजी में कहें तो वर्टीकल और हॉरीजेन्टल डेवलपमेन्ट। जीवन भर एक संघर्ष उसे धरती के गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध करना होगा तभी वृक्ष में जल की आपूर्ति संभव होगी और दूसरा उसे अपना भोजन बहती हवा से निकालना है। बीज का उत्सर्ग इसलिये कहा जा रहा है कि जैसे आम का बीज बोया और उसका वृक्ष बन जाने पर न तो बीज शेष रहता है न उस बीज का मूल नाम ही। अपने शरीर और नाम दोनों का त्याग यहाँ अपने आप हो जाता है। बीज अब इन दोनों से मुक्त है। बीज के इस संपूर्ण प्रक्रिया से गुजर कर जिस वृक्ष से वह बीज आया था आज फिर वही अपने मूल रूप वृक्ष तक पहुँच गया है। "आम से चल कर आम होना एक खास बात है।"
वस्तुतः तुम अगर बीज हो सकते हो तो रूपान्तरित हो कर अपने मूल रूप "वृक्ष" रूपी आत्म को प्राप्त हो सकते हो क्योंकि "बीज होना वृक्ष का सूक्ष्म स्वरूप में स्थित होना ही तो है।"
तो अब समझ लो कि तुम्हें बीज हो जाना है। अगर मुक्त होना है तो अपने "स्व" के उत्सर्ग की तैयारी करो। उत्सर्ग करो अपने स्व का, अपने साथ चल रही संज्ञा का, उपाधि स्वरूप चल रहे अपने नाम का। तुम्हें प्राप्त हाेना है अपने आत्म स्वरूप को।
इसलिए संकल्प करो इनसे मुक्त होने का, अपनी नैसर्गिक दिशाएँ पाने का, अपने मूल स्वरूप को प्राप्त होने का। "तत्वमसि"।
रामनारायण सोनी
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