Thursday, 11 May 2023

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लहर-लहर
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हमारे आँगन में

वे हमारे अतिथि हैं, मित्र है, सहचर हैं और हमारे ऑक्सीजन प्लान्ट हैं। अतिथी इसलिये कि ये सारे पेड़ पौधे कहीं न कहीं से हमारे आँगन मे पधारे हैं। ये सभी हमारे आँगन में बारी बारी से उतरे हैं। मित्र इस तरह कि वे हमारे सुख-दु:ख के साथी है। मौसमों के कोप से रक्षा करते हैं। सहचर इस तरह कि ये साथ ही रहते हैं।
देखो! यहाँ हारसिंगार हँसता है, पास ही सफेद अकउआ (आँक) वायव्य कोने में स्थित है जिसके सफेद पुष्पगुच्छ मेरे आराध्य देव शिव को परम प्रिय है। इसी के करीब में मीठा नीम अपनी केरेक्टर स्मेल और स्वाद ले कर खड़ा है और हमारे मनमोहन के रुचिरभोग के लिये अपनी सुगन्धित और स्वादिष्ट पत्तियाँ प्रदान करता है। फिर यह  बिल्व अपने त्रिदल से त्रिपुरारी शिव को बिल्वाष्टक सुनाता है। ये पत्र त्रयम्बकेश्वर को रात दिन लगा रहे हैं मानस-त्रिपुण्ड। मधुमालती स्वजन और अतिथियों के स्वागत में खड़ी है गुलाबी श्वेत पुष्पों की झालर लिये। क्यारी में दो महकते हैं मोगरे के फूल अपनी नैसर्गिक सुगन्ध से महकते हैं। यहीं पास में है तुलसाँ महारानी विराज रही है जो स्वामिनी है इस उपवन की पुण्य-प्रभा की। चीकू तो हमारे घर की पहचान बनी हुई है। इस पर मधुपरियाँ कभी कभी अपना घर बनाती रहती हैं। इसके पड़ोस में गिट्टेदार मोगरे का नन्हा पेड़ भी खड़ा है जो पावस में पुष्प देता है।
आँगन के केन्द्र में लंगड़ा आम खड़ा है जो हर बसन्त में अपनी आम्र-मंजरियों से महकाता है घर मोहल्ले को, कोकिला को मिठास भरी कुहक सुनाने के लिये निमन्त्रण देता है। हमने इसके आम कभी नहीं तोड़े, जो 'साग' बन कर गिरे वो हमारे बाकी सब पंछियों के होते हैं। इसकी एक डाल पर परमार्थ टँगा है, चिड़िया के दाने भर कर और साथ में एक सकोरा भी शीतल जल भर कर। गिलहरियों के चंचल दो जोड़े तिड़िप तिड़िप कर शोर करते रहते हैं। वहीं दाना, वहीं पानी और वहीं फल। नींबू का नन्हा सा पेड़ हमारे लिये विटामिन सी का प्रचुर भण्डार तैयार करता है। नैऋत्य कोण में द्वार से लगा हुआ रक्तपुष्प लिये गुड़हल माँ दुर्गा और गणाध्यक्ष के पूजन के लिये तत्पर है। समस्त संसार के कण कण को प्राण और ऊर्जा प्रदान करने वाले भुवन भास्कर अपनी सहस्रों किरणें ले कर छत पर उतरते हैं और बिजली के तार अनुप्राणि हो उठते हैं। दशहरी आम का पौधा अभी किशोर वय को प्राप्त कर चुका है। इन सभी पेड़ पौधों से हमारे मौन संवाद चलते ही रहते हैं। हम इनसे सिर्फ उतना ही लेते हैं जिससे हमारी पूजा-पुजापा संपन्न हो जावे। हम इनके ऋणी हैं इसलिये हम इनके सेवादार हैं।
कुछ इस तरह मैं "अपने बाहर के शहर में अपने भीतर का मेरा अपना गाँव ढूँढता रहता हूँ।"

रामनारायण सोनी
७.५.२३
 

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