लहर-लहर
संकल्प!!!
मित्रों! आज से चिन्तन का एक नया अध्याय शुरू करते हैं। ये अध्याय छोटी छोटी लहरों के जैसे हों और फिर मिलकर एक बड़ी लहर बना दे। इसकी स्क्रिप्ट बहुत छोटी छोटी (एक पेज से कम) रहेगी। हर एक के अन्त में उसका निहित उद्देश्य अंकित होगा।
इस धारावाहिक 'लहर लहर' की प्रतिदिन एक कड़ी, कुल -50 कड़ी, लिखी जा रही है जो अन्त में एक लघु पुस्तक का रूप ले लेगी।
यह एक प्रयोगात्मक प्रयास है।
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1
जिस प्रकार मैं बरसात में अपना छाता, कछुआ अपनी कढ़ाईनुमा पीठ अपने साथ ले कर चलता है मैं भी अपना क्षितिज साथ ले कर चलता हूँ। इस विषय में तुम मुझसे अलग नहीं हो। कितनी ही तेज दौड़ लगाएँ, कहीं भी चले जाएँ वहाँ फिर वही नया क्षितिज नजर आएगा। इसे आज तक कोई पकड़ नहीं पाया।
इसी तरह हम मान्यताओं, अवधारणाओं और विचारों का अपना क्षितिज ले कर चलते हैं। हम जहाँ जहाँ जाते हैं अपना अपना यह क्षितिज पल्ले बँधा पाते हैं। नया क्षितिज चाहिये तो हमें मान्यताओं, अवधारणाओं और विचारों के परिष्कृत आयाम ढूँढने होंगे। इस बदलाव में सावधानी बरतनी होगी। अगर कोहरा है तो उसे छँटने का इन्तजार करना होगा अन्यथा कहीं गिर-पड़ सकते हैं। तो चलो! एक बेहतर क्षितिज खोजते हैं।
2
तुम डर से डरते हो, सहमते हो और सोचते हो कि डर से आमना सामना न हो पर तुम जानते नहीं कि इसी डर के कारण दुनिया में बड़े बड़े काम हो रहे हैं। मौसम के डर से तुमने मकान बनाया। बरसात के डर से छाता खरीद लाए। भूख के डर से बड़े बड़े गोदाम बनाए। गर्मी के डर से पंखे ले आए जो लम्बे समय से छतों में व्यर्थ ही टँगे हुए हैं। जरा देखो तुमने डर डर कर अपने इर्द गिर्द सामानों का कितना जखीरा इकट्ठा कर लिया है। इस डर ने कई कई खोजें संसार को दी है। अगर दीपक बुझने का डर न होता तो बिजली के लट्टुओं की चकाचोंध की ईजाद नहीं होती। सब से बड़ा डर तो मौत का है। इस डर ने कई कई अस्पताल खोल दिये हैं। डरना बुरा नहीं है पर डर के परमानेन्ट डर में रहना बुरा है। डर को बुलाओ मत पर आए हुए को धैर्य से परख कर उसका निवारण ढूँढ लो।
3
भरोसा न हो तो दुनिया अभी के अभी थम जावेगी। कितने अनजान लोग अनजान वाहनों के संग संग या क्रास कर के हमारे चारों ओर से गुजर रहे हैं पर भरोसा है कि वे हमसे टकराएँगे नहीं। अगर भरोसा न होता तो हम सड़क पर कदापि नहीं जाते। भरोसा है कि भले ही मैं सोता रह जाऊँ तो भी सूरज उगेगा, दूध वाला दूध ले कर आवेगा। भरोसा है कि मेरे आसपास जो जो रिश्ते बन गए हैं वे कायम रहेंगे। मुझे जीने के लिये साँस लेते रहना है, तो मुझे यह भरोसा है कि अगर मैं भूल भी जाऊँ तो भी मेरा यह जीवन चलता रहेगा। भरोसा है कि मौसम और ऋतुएँ समय पर आवेंगी जावेंगी। रात और दिन इसी तरह अपने क्रम में चलते ही रहेंगे।
यह भी पक्का भरोसा है कि कहीं न कहीं आज के इस दिन मेरे खाने का इन्तज़ाम हो ही रहा होगा। प्यास बुझाने के लिये पानी मिलेगा ही। मेरे दिन भर के श्रम मिटाने के लिये रात आएगी। भरोसा शायद मेरे जीवन का अनजाने में ही मीत हो गया है। बहुत सारे ऐसे भरोसे हैं जिन्हें मैं प्रत्यक्ष में जानता तक नहीं।
"हर पल कोई न कोई भरोसा मेरे साथ चलता है, शायद मैं इसी आसरे में जिन्दा हूँ।
लहर लहर 4
प्यार की अपनी एक पुण्य गंध है, जिसे विज्ञान में केरेक्टरिस्टिक स्मेल कहते हैं। जैसे गुलाब की, चमेली की, मोगरे की, लकड़ी की, पसीने की, मिट्टी की उनकी अपनी अपनी है । प्यार की खुशबू प्यार के आगमन से पहले महकने लगती है। प्यार की सुगन्ध भीनी भीनी सी होती है। प्यार में शोर नहीं सागर जैसी प्रशान्ति है। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर तुम्हें एक अपनत्व भरी सुगन्ध महसूस हो रही है तो समझो एक प्रीति का सागर तुम्हारे आसपास ही कहीं मौजूद है। इसका आनन्द लेना हो तो वहाँ चले जाओ, उसमें डूब कर देखो। बारिश में भींगने का अपना मजा तो है पर देखो उस बादल को भी जो बरस रहा है। बहुत दूर से तुम तक चल कर आया है तुम्हें तरबतर करने को। यह मत सोचो कि कौन लाया है? कहाँ से आया है? बस देखो कि वह तुम्हारे सामने है। यह जरूरी नहीं है कि बादल रोज रोज आवेंगे। अब की बार चूके तो फिर न जाने कब मिलेंगे। तन भिंगोने के लिये तुम नकली शावर में रिमझिम बरसात सी तैयार तो कर लोगे पर उसके साथ मन भिंगोने के लिये वे बरसते सुहाने बादल नहीं होंगे। इसलिये चूक मत जाना।
"चलो! यही सुअवसर है, सुसंयोग है।"
5
जिस्म के इतिहास में एक भूगोल भी है, जिस्म की एक लम्बी सी कहानी होती है जिसे तुम जिन्दगी कह सकते हो। जिन्दगी के रोजनामचे में रोज कुछ न कुछ लिखा जाता है। हर दिन के पन्ने के आखिर में बारीक अक्षरों में नियति अपनी ओर से परिणाम लिखती है और उसकी समरी भी वही जोड़ती चली जाती है। इसे तुम 'लेखा-जोखा' कह सकते हो। इस समरी में तुम एक शब्द भी नहीं जोड़ सकते न ही घटा सकते हो पर तसल्ली और समझ से इसे पढ़ सकते हो। इसमें दिल्ली दूरदर्शन के "पाया-खोया" प्रोग्राम जैसा विवरण भी लिखा होता है।
कुछ रूमानी मायनों में हमारा जिस्म एक मकान भर है जिसमें जीवधारी किरायेदार जैसा रहने आता है। हमने इस मकान को बिगाड़ा तो यह सस्ते में जल्दी ही चला भी जाता है। जिन्दगी से प्यार करने वाले इसे करीने से रखते हैं, मेन्टेन करते हैं। जिस्म में लगी कर्मेन्द्रियाँ इसके कल पुर्जे हैं और पुरुषार्थ के संसाधन हैं। इसका इंजिन कमाल का है और ईंधन तो और भी गज़ब का है। जाने क्या क्या खा जाता है। वेज-नॉनवेज, भक्ष्य अभक्ष्य, पक्वान्न कच्चान्न।
परन्तु मजेदार बात तो यह है कि जिस्म न हो तो रूहें कहाँ रहेंगी? वहीं दूसरा अनिवार्य पहलू यह भी है कि रूह नहीं रहे तो यह दो कौड़ी का भी नहीं।
"जिस्म और रूह, दोनों हैं तो हम, तुम और सब हैं। इसे सम्हालो जरा।"
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6
तुम शायद यही सोचते हो कि जमीन पर बहुत भीड़ है। आदमियों की भीड़, रिश्तों की भीड़, अपनों परायों की भीड़, चारों तरफ बस भीड़ ही भीड़ । परन्तु तुम इसे भीड़ समझ कर बड़ी भूल कर रहे हो। इसी भीड़ में तुम्हारी संस्कृति, सोहार्द्र, आत्मीयता और प्रेम पल रहा है, और यह सब केवल इस जमीन पर ही मिलेगा। तुमने सोचा मैं इससे बड़ा होना चाहता हूँ, इनसे ऊपर उठना चाहता हूँ, इन पर शासन-प्रशासन करना चाहता हूँ। इसलिये तुम किसी एक मंच पर चढ़ गये या तुम्हें कोई पद मिल गया है, तब तुम थोड़े बड़े हो गये हो। तुम्हारे साथ वहाँ कुछ स्वार्थी लोग ही बचे हैं। चढ़ते चढ़ते तुम पहाड़ पर चढ़ गये यानी कि कुछ और बड़े हो गये। वहाँ जा कर तुम उन सबसे ऊँचे और बड़े लग रहे हो, तब से तुम बिल्कुल अकेले हो गए हो। तब जमीन पर खड़े वे तुम्हारे अपने ही सब लोग तुम्हें बहुत छोटे दिखने लगे। शायद तुम्हें उनसे संवाद करने में भी अपनापन नहीं लग रहा होगा।
बड़े होते होते एक दिन तुम सूरज हो गये। अगर तुम सचमुच सूरज हो गये हो तो तुम्हें दूसरों के लिये जीना और जलना होगा। दूसरों के लिये तपना होगा। दूसरों के लिये अपना समर्पण तैयार करना होगा। इस सब से बड़े 'बड़प्पन' के साइड इफेक्ट भी समझ लो। यहाँ तुम अपने मैदानी रिश्तों और अपनों से बहुत दूर आ गये हो। वे सब भी तुम्हारे ताप और प्रभुत्व के कारण तुमसे डरे डरे से हैं। यहाँ तुम न चाहते हुए भी बिल्कुल ही अकेले हो। क्यों? क्योंकि तुम सूरज बनना चाहते थे और तुम बन गये हो। तुम चाहते थे कि सारे ग्रह उपग्रह तुम्हारे इर्द-गिर्द चक्कर लगाएँ। सारे मौसम और ऋतुओं के तुम नियन्ता हो जाओ। तुम हो गये। पर नोट करो कि "तुम उन सभी अपनों के लिये किसी निर्जन में खो गये हो!" तुम उनसे इन परिस्थितियों में घुलने मिलने की सोच भी नहीं सकते। इसलिये सुनो!
"जमीन पर छूटे हुए उन लोगों और रिश्तों को फिर से पाना है तो दूरियाँ, अहंता और ताप छोड़ना पड़ेगा, बड़ा होने का अहसास भी।"
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7
यह संसार कैसा संसार है? यह सब कुछ भाग रहा है, सब ओर परिवर्तन है, यहाँ ठहराव कुछ नहीं है। सुबह हुई, थोड़ी देर में बदल गई। बरसात आई बरस कर चली गई, बचपन आया चला गया। जो हमेशा से है और रहेगा वह है 'परिवर्तन'। यह नैसर्गिक नियम है। यहाँ सब दौड़ रहे हैं कोई तेज तो कोई धीरे। कोई जीवन ले कर अभी अभी आया है, वह आते ही चल पड़ा है। याने जीवन चल पड़ा। कोई अभी अभी गया वह भी चलते चलते ही गया। ऐसा लगता है कि 'जन्म' स्वयं मृत्यु ले कर पैदा हुआ है। गिन कर सांसें लाया है, रोज उन्हीं में से कुछ खर्च कर रहा है। हम रोज नई माँग लेकर सोते हैं और जब अगली सुबह जागते हैं तो उसकी आपूर्ति में दौड़ने लगते है। पेट की आग, शरीर की माँग, और कभी मन में घुली भाँग हमें बैठने नहीं देती। यह माँग भी परिवर्तनशील है जब एक पूरी होती है तो यात्रा के मील का पत्थर बन कर पीछे छूट जाती है और लगता है कि वह हमसे पीछे दूर भाग रही है। हम आगे भाग रहे हैं। फिर कुछ दूसरी माँगें सामने मुँह बाये खड़ी हैं। "बेहिसाब हसरतें न पालिए, जो मिला है पहले उसे सम्भालिए।"
समस्त चर अचर और ब्रह्माण्ड का कण कण चलायमान है। किसी ने कहा यह पहाड़ तो अचल है, पर अन्तरिक्ष में जा कर देखो यह धरती पर सवार हो कर सूर्य के चारों तरफ परिक्रमा में लगा है।
तो स्थिर क्या है? कौन है? नित्य कौन है? अपरिवर्तनीय कौन है? कौन है जो काल अर्थात् समय की सीमाओं से परे है? जो सब बदलता है पर खुद नित्य एक रस है। जो अपरिमेय है। जो निर्माण में भी है और ध्वंस में भी है। जो अनन्त है।
जो कभी खाली नहीं होता ऐसा पूर्ण, जिसमे कुछ भरा नहीं जा सकता ऐसा पूर्ण, जो वहाँ भी है, यहाँ भी है। जिसमें सब है, जो सब में है। बनता भी है, बनाता भी है। इस सृष्टि के लय प्रलय के पहले भी था, है भी, रहेगा भी।
"चलो उस 'कौन' को जानने का प्रयास करें।"
उपनिषद् कहता है..
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
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8
मैं समुन्दर हूँ।
मैं खारा जरूर हूँ पर जगत के कल्याण और जीवन के लिये मीठे पानी के बादल भेजता हूँ। मेरी सतह पर शोर है पर मुझ जैसी नीरवता कहीं नहीं। तुम मेरे किनारे आओ मैं तुम्हारे पद प्रक्षालन करूँगा। तुम थोड़ा सा आगे बढ़े और तैरना नहीं जानते हो तो तुम्हें वापस किनारे पर फेंक दूँगा। जो नदियाँ मुझे अपना जल देती है, मैं वापस बादल भेज कर जो लिया उससे भी अधिक हर बरस लौटा देता हूँ। मैं बेरंग हूँ पर तुम्हें अच्छा लगूँ इसलिये नीला दिखाई देता हूँ। मैं जीवों और वनस्पतियों से बहुत प्यार करता हूँ इसलिये उन्हें अपने घर में रखता हूँ। तुम भले ही उसे ज्वार भाटा कहो पर वह मेरा चाँद के लिये उमड़ता हुआ प्यार है। मैं बस देता ही देता हूँ। मुझे मथ कर देखो मुझ में रत्न भरे पड़े हैं। मेरा स्वभाव अभेद है याने सब के लिये एक जैसा। मुझे बंधन की जरूरत नहीं इसलिये अपने खुद के बनाए तटबन्धों में स्वानुशासित रहता हूँ। केमिस्ट्री की भाषा में मेरी देह दो गैसों से मिल कर बना एक रसायन है। हाइड्रोजन जो सारणी का प्रथम तत्व और ऑक्सीन जो तुम्हें जीवित रखने वाला तत्व है।
"हो सके तो सागर बनो!
मुझ से अध्यात्म जानो! मैं सागर हूँ पर झूम इन करके देखो अन्तिम रूप से मैं एक बूँद हूँ। मेरी इस बूँद का विस्तार ही समुन्दर रूप में दिखाई देता है। इस बूँद की शक्ल में मैं हर जीव, जड़ और वनस्पतियों में और हे मानव तुम में भी मौजूद हूँ। मैं यहाँ भी हूँ और वहाँ भी हूँ। "महसूस करो, तुम्हारे भीतर भी हूँ और बाहर भी हूँ।" मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ।
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9
तान दो मस्तूल
सूरज ने जुगनुओं को कभी चमकते हुए नहीं देखा। उस ने कभी घोर अन्धकार भी नहीं देखा। वहीं जुगनू ने अँधेरा देखा भी है और उसमें वह रहा भी है। जुगनू उसकी अपनी दुनिया का शहंशाह है क्योंकि अपनी राह ढूँढने के लिये उसने सूरज के उजाले का इन्तजार कभी नहीं किया और न तारों के टिम टिम करते प्रकाश के भरोसे रहा। प्रकृति ने उसके साहस को देखते हुए उदात्त हो कर उसे बिना ईंधन का लालटेन दे दिया है। उसे सुलगाने की चिंगारी भी नहीं चाहिये। प्रकृति ने एक और वरदान उसे दिया है कि वह बिना ताप बढ़े उजाला कर सके। ऐसा लगता है कि प्रकृति उसे यह कह रही है कि तुम मेरी तरफ दो कदम साहस के चलो तो देखो मैं तुम्हारी तरफ चार कदम चल कर आई हूँ।
एक नन्हा दीपक भी इसी श्रेणी का योद्धा है। वह साहस से भरा हुआ, निर्भय हो कर समर्पण के लिये तैयार है। वह कहता है ''भले ही मैं अपने तले का अन्धकार दूर न कर पाऊँ, मैं अपने चारों ओर उजाला करने के लिये तैयार हूँ।
नचिकेता कठोपनिषद् का महानायक है जो मत्यु के देवता के सामने सहज भाव से अदम्य साहस ले कर खड़ा हो जाता है। उसका यह साहस यमराज को कोई चुनौती नहीं है पर उसे वहाँ भी भय कदापि नहीं है। फिर जो घटित हुआ वह अद्भुत था। नदी किनारे के बड़े मजबूत विशाल वृक्ष बाढ़ में बह जाते हैं पर बेंत का नन्हा सा साहसी पौधा साबुत खड़ा रह जाता है। एक साहस और उत्साह भरा नाविक अरब सागर पार करने के लिये मस्तूल बाँध कर निकल पड़ता है। फिर तो हवाएँ भी यही कहती हैं कि हम तुम्हारी नाव को हमारी शक्ति से चलावेंगी।
"साहस शक्ति का आमन्त्रण और कर्म का आधान और सफलता का प्रथम सोपान है।"
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लहर लहर 10
'वर्तमान चल रहा है'
कब से ढूँढ रहे हो रत्न? उम्र के कई पड़ाव देखे, कई अवसर मिले पर तुम और बेहतर संभावनाओं के द्वार खोजने में लगे रहे। खोजते खोजते तुम रत्नों की खदान के अन्तिम छोर तक निकल आए हो। तुम्हें कई रत्न मिले भी पर तुम उन्हें बस परखने में लगे रहे, निरस्त करते रहे पर और अधिक बेहतर की खोज में उन्हें रास्ते में ही छोड़ते चले गये। इसलिये कहता हूँ कि अभी भी वक्त है कि जो मिल रहा है उसे अपनी गिरह में रख लो।
जिन्दगी जुआँ नहीं है कि हारते जाओन तो भी बेहतर जीत के चक्कर में खेलते ही रहो। देखो! जितने जुआरी हैं वे कब धनपति हुए हैं? जो क्षण आया है वह अवसर है चूक गये तो समझो तुम चुक गये, जो बीत गया है वह इतिहास है इसे बदलने का सामर्थ्य स्वयं ब्रह्मा में भी नहीं है, जो आनेवाला है वह अन्धे की रेवड़ी है तुम्हारे हाथ लगे न लगे।
हर पल कुछ न कुछ सौगात ले कर आता है और वह तुम्हारे पुरुषार्थ, पराक्रम, समझ और क्रियात्मकता को चुनौती देता है। ये चुनौतियाँ अपने गर्भ में तरह तरह की संभावनाऍं और उपलब्धियाँ भर कर लाई हैं यदि इन चुनौतियों को आफत समझ लिया तो बैठे रह जाओगे। पहली बरसात हुई, अगर किसान बीज लिये खेतों के किनारे बैठा रहा और फिर बीज बोने का वक्त आया वह आसमान तकता रहा तो उसके लिये अवसर लौट कर नहीं आता है। एक बात और है यदि वह फसल बोने से चूक गया तो खरपतवारों को उगने को मौका मिल जावेगा। फसल गई सो गई खेत की सफाई अलग माथे पड़ गई।
"इस उपयोगी वर्तमान को कोरे अतीत के अन्धे गर्त में मत फेंको।"
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11
खुद के संग जरूर रहना
संसार गतिमान है। कोई आ रहा है कोई जा रहा है। कोई ला रहा है, कोई छोड़ रहा है। कोई कुछ कदम साथ चला फिर कहीं छूट गया। लोग मिलते गये, रिश्ते बनते गये। इस आपाधापी में सदैव जो संग रहा वह तुम स्वयं थे परन्तु कई बार तुम्हें लगा होगा कि तुम्हारे साथ कोई भी नहीं है तुम शून्य में हो। पर निश्चित रूप से जब जब भी ऐसा हुआ होगा वह तुम्हारी आत्मविस्मृति थी। एक और सच महसूस हुआ होगा कि जैसे ही कोई विपत्ति आयी तो कुछेक को छोड़ कर बाकी सब अगली बगली झाँकते नजर आयेंगे।
आत्मविस्मृति की यह भूल अर्जुन को भी हुई थी। महाभारत के समरांगण में उसके सामने लोग खड़े थे, रिश्ते खड़े थे, दुविधाएँ खड़ी थी, और एक संशय खड़ा था। इन सब का जो सम्मिलित मध्यम प्रभाव था वह 'विषाद' था। ऐसा तो सारा निर्मित परिदृश्य था पर इन सब के बावजूद सबसे विचित्र तो यह था कि विषाद का अन्तिम प्रभाव अर्जुन की "आत्मविस्मृति" होना था।
उसे पता ही नहीं रहा कि वह कौन है? क्यों समर में आया है? उसका कर्म-अकर्म क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर उसे खोजना नहीं था अपितु उसे इनका स्वयं बोध होना चाहिये था। यह तो स्पष्ट था कि अर्जुन उस प्रांगण में "वह सबके साथ खड़ा था पर खुद अपने ही साथ नहीं खड़ा था।" कर्म का सबसे बड़ा साधन तो पुरुषार्थ है और आत्मबोध के बगैर न धर्म होगा, न अर्थ मिलेगा, न कामना की आपूर्ति होगी, फिर मोक्ष की बात तो बड़ी दूर की है। न मार्ग का पता होगा न मंजिल का।
यह जरूरी नहीं कि जैसे हनुमान जी को जामवन्त मिले तुम्हारे जीवन में कोई मिल ही जावेगा, हर ग्वाले को चाणक्य मिल ही जावेगा।
श्रीमद्भगवद्गीता अर्जुन के विमोहन और आत्मविस्मृति के निक्षेप से शुरू होती है और "स्मृतिर्लब्ध्वा" अर्थात् आत्मबोध पर जा कर पूर्ण होती है। वह कह उठता है "यथेच्छसि तथा कुरू" अब आप जैसा चाहेंगे वैसा करूँगा।
तुम खुद को भूले तो तुम्हारे अन्तःकरण के सब द्वार बन्द हो जावेंगे।
सब से बड़ा सच तो यह है कि "तुम से अधिक तुम्हें कोई और नहीं जानता।"
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12
अन्तःकरण से जुड़े लोग।
"भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा"। अपनी आँखों से अच्छा देखो।
आँखों की पुतलियाँ एक गेट वे है जरूर पर हर किसी को दिल तक जाने नहीं देती। इस एक बारीक से छेद में पूरी दुनियाँ समा लेती है। तुमने कभी ध्यान नहीं दिया इस फर्स्ट गेट के आगे कॉमन हाल है जहाँ तक वे लोग पहुँचते हैं जो तुम्हारे साथ कोई न कोई रिश्ता रखते हैं या वहाँ पर ठहरने के लिये अपना स्थान बना लेता है। यह बहुत बड़ी जगह है जहाँ बहुत सारे लोग समा सकते हैं, रुक सकते हैं, बाहर भी निकल सकते हैं। इस कामन हॉल में कभी कभी बहुरूपिये, मुखौटेबाज, छलिया, और शरारती लोग भी पहुँच जाते हैं और विप्लव मचाते रहते हैं। इन्हें बेदखल करना बहुत मुश्किल होता है। उन्हें सम्हालने में बहुत सारी ऊर्जा खर्च हो जाती है। ये वायरस की तरह हमारे इम्यून सिस्टम पर ही अटेक कर देते हैं। ये बहुत बलशाली हैं और किसी भी एन्टीवायरस से भी मरते नहीं है पर इनके लिये क्वारन्टीन करने की जगह इसी हाल में रखना पड़ती है। यह हॉल भरता और खाली होता रहता है। फिर इसके आगे एक सिट आउट है यहाँ तक वे लोग आते हैं जो तुम्हारी इजाजत के इन्तेजार में रहते हैं। ये वे लोग है जो तुम्हारी मनोवृत्ति, रुचि अथवा पसन्द की कसौटी पर खरे उतरते हैं। यह सिट आउट इसलिये भी जरूरी है कि यहाँ फिर एक छ्ननी लगानी है। यहाँ से आगे का मार्ग बहुत महत्वपूर्ण है अन्यथा डेमेजकन्ट्रोल सम्भव नहीं होता है। ये वे लोग हैं जो तुम्हारे जीवन को, विकास को, गिरावट को, मन मस्तिष्क को पूरी तरह प्रभावित करते हैं। इस सिटआउट के के बाद एक लिविंग रूम हैं जहाँ तुम इन चहेते लोगों के साथ रह सकते हो, व्यवहार कर सकते हो, आदान प्रदान कर सकते हो। इनके साथ पूरा जीवन साझा करते हो।
सिटआउट से सँटा हुआ सबसे अलग थलग एक गलियारा है जो सीधे तुम्हारे अन्तःपुर में पहुँचता है। अन्तःपुर तुम्हारा अपना अन्तःकरण ही है इसमें जो लोग पहुँच गये उन्हें तुम जन्म जन्मान्तरों का भूल नहीं सकते। ये वे लोग हैं जो तुम्हें और तुम इन्हें अच्छे लगते हो। जरूरी नहीं कि दुनियाँ जान सके कि ये कौन कौन लोग हैं। कभी कभी इसमें रहने वाले सक्ष भी नहीं जानते कि तुम उन्हें एक तरफा पसन्द करते हो। यहाँ देवत्व उतर आवे तो तुम भक्त बन जाते हो, दानव उतर आवे तो विध्वंसकारी हो सकते हो और यहीं अनन्त संभावनाएँ निर्मित होती हैं जो तुम्हारे भीतर बाहर की तमाम गतिविधियों और सम्पूर्ण जीवन को नियन्त्रित करती हैं। यह गलियारा तुम्हारे अपने नियन्त्रण में है। यहाँ पहुँचने और रहने वाले लोग सब रिश्तों को लाँघ कर आते हैं और किसी भी प्रकार के बन्धनों-अनुबन्धों से मुक्त रहते हैं। ये इस तरह साथ रहते हैं जैसे आँखों से कान और मुँह सिले हुए हों। ये अगर बाहर निकल भी जावें तो इनकी अमिट स्मृतियाँ वहीं परमानेन्ट बनी रह जाती हैं और तुम इनके वर्चुअल इफेक्ट में रहते हो चाहे वह तुम्हारा गुरू हो, प्रेमी हो अथवा आदर्श हो। इनमें से भी कोई एकाध तुम्हारे संग दूध में घुली मिसरी की तरह रहता है। जिसे वह भी जानता है और तुम भी। वह अलेप है, लोभ आदि सभी विकारों से रहित है। चाहे वह पुरुष हो, प्रकृति हो या परमात्मा हो। इसे तुम से जुदा कोई नहीं कर सकता।
" तुम्हारा अपना अन्तःपुर सिर्फ तुम्हारा है इसे तुम ही अच्छी तरह सम्हालो"।
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13
लहर लहर 13
मन का बोझ
मन अमूर्त है, अभौतिक है, अदृश्य है, अश्पृश्य है लेकिन इन्द्रियों का सुरवाइजर, सुपरकन्ट्रोलर है और सुपरसोनिक स्पीड से भी तेज चलता है। करता कुछ नहीं पर करवाता सब है। जलेबी का स्वाद इसे चाहिये तो हाथ, दाँत और जबान को काम में लगा देता है। बेचारी इन्द्रियाँ नाचती है इसके इशारे पर। "नाच नटी इव सहित समाजा।" शरीर का सबसे जिद्दी, सबसे बलवान, सब से कमजोर प्रत्यंग भी यही है, नियन्ता भी यही है। कभी कभी यह बुद्धि को भी परास्त कर देता है, विवेक की भी नहीं सुनता है। कभी एवरेस्ट पर चढ़ा देता है, कभी रस्सी से पंखे पर लटकवा देता है, कभी आँख वाले को अन्धा बना देता है तो कभी आनन्द विभोर कर देता। लेकिन कुछ विशेष गुणों के चलते इसकी चार बड़ी विशेषताएँ ये हैं - वेग, आवेश, आवेग और संवेग।
जरा इन्हें विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में देखें -
वेग- इसे आप गति कह सकते हैं। समय के सापेक्ष्य में किसी की स्थिती के परिवर्तन को 'वेग' कहते हैं। साधारण बोल चाल की भाषा में कहें तो अभी यहाँ तथा कुछ पलों बाद कहीं और। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की गति ही वेग है इसी गुण के कारण इसे वेगवान कहते हैं।
आवेश- इलेक्ट्रीफाइड अर्थात् अपनी न्यट्रल पोजिशन से शिफ्ट हो जाना। जब इसमें कोई नया विचार तेजी से प्रवेश करता है तो इसमें उस विचार के अनुसार प्रबल ऊर्जा संचरित हो जाती है और यह उन्मत्त हाथी की तरह व्यवहार करने लगता है।
आवेग- बाढ़ की तरह बहना। आवेशित हो कर किसी भी दिशा में बेतहाशा दौड़ लगाना आवेग है।
संवेग- इसे मोमेन्टम कहते है। इस स्थिति में मात्रा और गति दोनो एक साथ काम करते हैं।
वेग, आवेश और आवेग को आसानी से समझा जा सकता है लेकिन संवेग इनका समन्वित फल है। एक बार गति पकड़ने के बाद नहीं रुक पाना संवेग है जैसे मोटर सायकल में एक्सीलेटर छोड़ देने पर भी गाड़ी चलती रहती है। और गतिशून्य हा कर न चल पाना भी संवेग है जिसे मोमेन्ट ऑफ इनर्शिया कहते हैं जैसे पार्किन्सन में होता है।
रामनारायण सोनी
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14
कोई आ जाता है कहीं से
जीवन को उत्सव रूप में परिवर्तित करने के लिये कुछ लोग कहीं से आ जाते हैं। जैसे दीपावली में दीपक, रंग और पटाखे आते हैं।
दीपावली उत्साह ले कर आती है। रांगोलियाँ सजती हैं, दीप जलते हैं, पटाखे चलते हैं। इनके बगैर दीपावली एक संवत्सर की तिथि तो है पर उसे उत्सव बनाने वाले ये दीप, रंग और पटाखे अपना सर्वस्व लगाने को तत्पर है। दीप अपना तैल और बाती समर्पित करता है, रंग मनोरमता परोस जाते हैं और पटाखे फूट जाते हैं और दीपावली को एक उत्सव में परिवर्तित कर देते हैं।
इनके बगैर दीपावली एक पर्व तो है पर "उत्सव" नहीं हो सकता। इन्होन हमें उत्सव के द्वार पर ला कर खड़ा कर दिया है। पटाखे फूट गए , रंग बिखर गया और दीपक तेल खत्म होते ही बुझ गया। उनकी अपनी कर्म रेखाएँ तो बची रहती हैं, इनसे हमारे संबंध भी टूटते नहीं हैं। एक सुखद संदेश यह है कि वे उनके अपने अपने निहित दायित्वों का इमानदारी से निर्वहन करते रहे।
इनके पावन उत्सर्ग में उल्लास के दर्शन होने चाहिये न कि किसी हताशा के। यहाँ उनकी समस्त ऊर्जा का रूपान्तरण है। वस्तुतः हमें पटाखों, रगों और दीपों का कृतज्ञ होना चाहिये।
"जो अपना कुछ खो कर भी हमें खुशी देते है हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिये।"
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बहारें फिर भी आएँगी
सूरज चुपचाप आता है जीवन देकर शाम को चला जाता है। चाँद आता है शीतल चाँदनी में नहला कर चला जाता है। ऋतुएँ दबे पाँव आती है अपना दायित्व पूरा कर चली जाती है। परन्तु यह सब क्यों होता है?
एक ऋतु इसलिये जाती है कि दूसरी को आना है। नदी, तालाब, झरने, पेड़ पौधे, वनस्पतियाँ सब चुपचाप हैं सब अपनी अपनी लय में हैं, सिर्फ सेवा में लगी है। ये सब समय के साथ बदलते रहते हैं। युवराज इसलिये नियुक्त होना है कि राजा के जाते ही उसे राजा बनना हैं। नदी अपनी धारा लिये बहती है ताकि ऊपर से आने वाले पानी को आने का मार्ग देना है। सूखे पत्तों को शाखा रिक्त करनी है ताकि वहाँ पत्तों की अगली पीढ़ी जन्म ले सके। बीज अंकुरित हो जाने के पश्चात अपना उत्सर्ग करता है ताकि अपने वंश की वृद्धि कर सके, उनकी जगह अगले बीज आ सकें।। ध्वंस, ह्रास, विनाश, क्षरण, परिवर्तन आदि इसलिये भी आवश्यक हो जाता है कि वहाँ अगला सृजन आने वाला है। मिट्टी को इसलिये जलना है कि उसे ईंट हो कर अगला भवन निर्माण करना है। यह विकास क्रम और प्रक्रिया अनन्त काल से अनवरत चल रही है। पशु पक्षी जीव जन्तु सब अपनी अपनी जद में हैं।
इनके परिक्रमण को देख कर निश्चित लगता है कि बहार के बाद भले ही पतझड़ आता हो "बहारें फिर भी आएँगी।"
रामनारायण सोनी
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अनुमान, अनुभव और संभावनाएँ
बड़े आश्चर्य की बात है कि पतंजलि योगसूत्र में अनुमान को प्रमाण माना गया है।
अनुमान का सामान्य अर्थ है अन्दाजा लगाना। यह अन्दाजा अतीत अथवा भविष्य के किसी आयाम से उठा कर लाया गया संभावित उत्तर है। यह उत्तर अनुभव की आधारशिला पर खड़ा होता है। अनुमान भूतकाल की किसी वास्तविक घटना के समानान्तर रख कर आकलन करता है जैसे नदी में आयी बाढ़ यह बताती है कि नदी की उद्गम दिशा में कहीं तेज बरसात हुई है। वहीं वर्तमान में चल रहे परिदृश्य को देख कर काल्पनिक अथवा वास्तविक अनुभवों के आधार पर की गई गणना भविष्य की किसी संभावित घटना का पूर्वाभास है जैसे कि जिस डाल पर खड़े हो कर उसी डाल को तने की तरफ से काटने पर स्वयं गिर जाना तय है। परन्तु जो घोषणा की गई है वे अपने समग्र अनुभवों का परम्यूटेशन कॉम्बीनेशन ही है। जितने अनुभव परिपक्व होते है घोषणाएँ उतनी ही सच्चाई के निकट होंगी।
अनुभव तुम्हारी चेतना में परिरक्षित और संचित कोष है। हम तुम और सभी लोग प्रत्येक क्षण किसी न किसी घटना के साक्षी होते हैं। कुछ घटनाएँ हमें प्रभावित करती हैं, कुछ हम इग्नोर करते हैं लेकिन कुछ घटनाएँ हमारे अन्तस में जाकर बैठ जाती है जिन्हें हम चाह कर भी भूल नहीं सकते। अनुभव इन्हीं घटनाओं और उनसे जन्य परिणामों का कोष है। पूर्वानुमान इस अनुभव से पकाई गई खिचड़ी है जो पक्वान्न है। वह पक्वान्न जो दाल, चावल, नमक, सब्जियों आदि कई इनग्रेडियेन्ट का समुचित अनुपात में मिलाया गया भेल है। इसे रुचि अनुसार चटखारों से भी तैयार किया जा सकता है। गलत अनुपात अथवा अपरिपक्वता इसे खराब भी बना सकते हैं। खैर जो भी हो हम अपने दैनिक जीवन में यह खिचड़ी रोज बनाते हैं जो हमारे जीवन को, जीवन शैली को और परिणाम को प्रभावित करती है।
"अपने अनुभव और अनुमान से अच्छी संभावनाएँ तलाशें"
रामनारायण सोनी
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बड़े अजीब थे ये लोग। इन्हे मैं जिद्दी नहीं धुनी कहता हूँ। ये वे लोग थे जो थार के मरुस्थल की ओर चल पड़े गन्ने की फसल उगाने, शैल शिखर को उँगली पर उठाने, तिल को ताड़ बनाने।
तुलसी जो रागी से वीतरागी हो गया। आततायी मुगलों की छाती पर रामचरितमानस लिखने का अद्भुत कार्य किया है जिसने। जैसे मन्दिर में पूजा ओर पुजापा रखा होता है वैसे हमारे घरों में यह पावन, अमर ग्रन्थ रख गया। जैसे वनाञ्चलों में ऋषियों ने ऋचायें गाई वैसी भक्ति की, ज्ञान की, वैराग्य की त्रिवेणी जन जन के हृदय में उतार गया। उपकृत हैं हम सब।
मन्दिरों में भजन सबने सुने होंगे। राजमहल और रंगमहल के भोग विलास में डूबे वातावरण में भी गोपाल के अनन्य प्रेम में पगी वह विरहिणी मीरा करताल ले कर गाने लगी "मैं तो साँवरे के रंग राची।" जिसकी श्रद्धा और भक्ति के प्रताप से विष भी प्रिय का प्रसाद बना होगा। उसकी गिरधर के विरह में की गई पुकार जन जन की अभ्यर्थना और अर्चना का मन्त्र बन गई। वह तरी और कईयों को तार गयी।
वह रैदास मरी खाल को सीते सीते कह गया कि हे परमेश्वर "तुम चंदन हम पानी" और घुल कर अपनी वह खुद ही घुल कर सुवास जन जन में छोड़ गया।
उस कबीर ने तो हद ही कर दी। उपनिषदों में वर्णित तुरीय को अपने करघे में लगे तानों बानों में बुन गया। ऐसी चादर बुनी कि बेदाग-बिंदास जैसी की तैसी धर गया। सत्य का निर्भीक पुजारी था वह।
और वह सूर बिन आँखों के ही विराट का दर्शन करते करते भक्ताकाश का सूरज बन कर चमक गया। उसकी प्रज्ञा तो चर्म चक्षुओं से परे मनश्चक्षुओं से ऐसा देखती थी कि कोई क्या देखेगा। उस धुनी ने असंख्य पद ऐसे गाये कि उसके 'सूरसागर' के सुरसागर में डूबने को मन करता है।
ये वे लोग थे जो पानी की उल्टी धार में टूना मछली की तरह तैरे और मिसाल छोड़ गये। उन्हें पता ही नहीं होगा कि जिन पगडण्डियों पर से गुजरे वे इस संसार के जन जन के लिये पुण्यशील राजपथ हो गये हैं।
"हो सके तो तुम भी ऐसी एक नन्ही सी पगडण्डी ढूँढ लो!"
रामनारायण सोनी
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