Sunday, 24 September 2023

Commentary 1, by Dr. Mathur


[24/09, 6:54 pm] P K Mathur: 
Lahar  Lahar 1

By undertaking a living example of an egocentric ocean wave and its inherent relationship with it's originator, the ocean and various other companions, the author has lucidly established that inspite of it's various egoistic postures, it is only a shape. If one takes a decision to withdraw the shape from the wave, the remainder will only be shapeless water. As a matter of fact water is able to get converted into various different shapes or states such as droplets, ice, steam, clouds, lakes, rivers and finally the ocean. 
One can, therefore, conclude that by extinguishing various egos and different relationships, developed by us during the big span of our lives, we can surely forget about the 'you-you' and 'I-I' phase and also the duality itself, leading to the enlightened path of 'Advaitwad', the 'Brahmatva'.
[24/09, 7:02 pm] P K Mathur: 
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[24/09, 7:46 pm] P K Mathur: Lahar Lahar  2  

Using a wonderful example of lovingly and carefully nurturing a small plant to a developed tree with dense green leaves for efficient photo synthesis , strong branches for domestic and industrial use, nutritional sweet fruits and lastly but not the least it's use as soothing shade provider to travellers, the author has tried to establish that for bringing out a self confident well educated and cultured, serious and dedicated individual for selfless service of the nation and the society at large, one requires to nurture him with care and good 'sanskars' from the beginning of his education in the early childhood itself for this purpose. The author has given his own example of early education in the small village of his birth by an affectionate and accomplished first teaher whom he adores and reveres from his heart till today.

[24/09, 7:52 pm] P K Mathur:

Tuesday, 16 May 2023

तिजोरी में पल

मेरे पास एक तिजोरी है पर बिना ताले की। वह एक हलके से हेंडिल से खुलती है। इसमें अलग अलग चौखाने हैं। एक तहखाना भी है। जब भी मैं खाली हो कर बैठता हूँ तो इसे खोल कर देखता हूँ। इस तिजारी में मैंने मेरे अपने, हाँ निखालिस अपने पल सिलसिलेवार खानों में करीने से जमा रखे हैं। खूबसूरत पल, आनन्द के पल, जिन्दगी के अलग अलग मोड़ के पल, मिलन के बिछड़ने के पल, सुख के पल-दुःख के पल। 

कुछ पल ऐसे भी हैं जिनका साया आज तक पीछा नहीं छोड़ रहे हैं और यह साया जिन्दगी के सफेद कागजों को भरने लगता है। जिन्दगी के इन पलों को भाग्य और प्रारब्ध ने मिल कर नौ रसों में अलग अलग डुबोया है। विधाता ने अपनी प्रकृति में छह रस बनाए पर धरती पर हमारा मन नौ रसों के ताप-शाप से गुजरता है। 

पलों के भिन्न- भिन्न खाने मेरी जिन्दगी और उम्र के रास्ते से मील के पत्थरों की तरह जुड़े हैं। मैं उन्हें आज फिर से याद कर  रहा हूँ , जहाँ जहाँ जिन्दगी ने मोड़ देखे हैं। एक अहसास हर मोड़ पर हुआ कि कुछ लोग जो मेरे अपने थे वे छूट गये और फिर एक नया समूह साथ जुड़ गया। लगभग हर मोड़ पर ऐसा ही हुआ। पर इन छूटे हुए लोगों के साथ बिताए वे पल मैंने इस तिजोरी में रख रखे हैं, चाहे वे किसी भी टेस्ट के हों। ये पल मात्र संस्मरण नहीं है अपितु जिन्दगी की चादर में धागों की तरह बुनावट में है।

आज मैं कुछ अन्तरंग पलों को अपने मित्रों, साथियों और पाठकों से शेयर करूँगा। तो चलो मैं शुरुआत करता हूँ उस पल से जिसका मुझे भान ही नहीं है। इस जगत में इस तरह के पल को देखने वाला तो हर सक्ष है पर उसे बोध बिल्कुल भी नहीं है। नौ दस मास गर्भ की अन्धेरी कोठरी में कैद रहता है और अचानक उस एक पल में आँख खोलते ही जगत देख लेता है। यह जिन्दगी का झीरो पॉइन्ट है। पर कैसा लगा होगा यहाँ यह किसी को भी याद नहीं। लोग कहते हैं तुम्हें उल्टा लटकाया गया, थाली पीटी गई और फिर रुलाया गया। तुम्हारे इस रुदन से लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई थी जैसे मैंने नहीं उनकी खुशियों ने जन्म लिया है। इस पल को मैंने लोगों के कथन के रूप में तिजोरी में रख रखा है। सब की तिजोरियाँ ऐसे पलों से आबाद है। जब तक हम होश सम्हालें तब तक हमें माँ-बाप अथवा परिवार के सम्पूर्ण दायित्व और लालन पालन में रहते हैं। हम में से ज्यादातर लोग इन पलों को लगभग भूल जाते हैं। अगर याद भी आये तो यह कह कर टाल देते हैं कि यह हजारों बरस से होता आया है, कोई नई बात नहीं है। लेकिन हमने ऐसी कल्पना कभी नहीं की कि यदि वैसा न हुआ होता तो क्या होता? हम कितने कृतघ्न हैं? बाद की जिन्दगी में इन पलों का की याद हमें अपनों के बहुत करीब ले जायगा। पर इन निर्बोध पलों में भी हम आत्मीयता और 'प्रेम' से पूर्णतया परिचित होते हैं। जीवन का यह कालखण्ड हमारी स्मृति में बहुत कम  रहता है। जिन्दगी के इस मील के पत्थर तक हम सबका अपना जीवन लगभग एक सा ही होता है। इसलिये मेरे पलों का विवरण यहाँ से आगे की ओर चलता है।



एक खाने में बचपन के बहुत थोड़े से उजले पल भरे हैं, मैं जब जब इन्हें उलट-पलट कर देखता हूँ तो आनन्द से भर हो जाता हूँ। इनमें से वे बारी बारी से उठाता हूँ। घर में प्यारी सी दादी 'सूरज' माँ है। मालवा में दादी माँ  सिर्फ 'माँ' कह कर बुलाया जाता है और माँ को 'जीजी' कह कर बुलाया जाता था। दादी का मैं बहुत लाड़ला था। बचपन अभी विदा भी नहीं हुआ था, माँ ने अलविदा कह दिया। पिता मेरे लिये शायद केवल कड़े अनुशासन वाले पालक ही थे। मेरा बचपन संयुक्त परिवार के घने वृक्ष की टहनी पर 'सूखे पत्ते' की तरह टँगा रहा और फिर वक्त बरगूले में घूमते-घूमते पता नहीं कहाँ जा गिरा। संयुक्त परिवार भी लम्बा नहीं चल सका। वह अकेलापन आज भी कटुदंश देता है। 


Friday, 12 May 2023

कनिष्ठिकाएँ

कनिष्ठिकाएँ

1

ठहरे हुए पानी में कंकर फेंकते ही लहरें पैदा हो जाती है। यही कंकर पानी के अन्दरूनी हिस्से में ऐसा नहीं कर पाता। इसी तरह हमारे मन की ऊपरी तह में विचार तरंगें पैदा करते हैं जो हमें उद्विग्न कर देती हैं। हमारे मन की गहराई में असीम शान्ति का सागर है। आनन्द वहाँ नित्य निवास करता है। "आनन्द चाहिये तो मन के भीतर, और भीतर का अन्तर्नाद सुनें।"


2
हम एक मल्टीप्लेक्स जैसे हैं।  हम में क्रोध, शान्ति, संगीत, शोर, प्रेम, घृणा जैसे भिन्न भिन्न भाव भरे पड़े हैं। इनमें से केवल शान्ति ऐसा भाव है जो मानव मात्र में स्वभावतः मौजूद है और कई बार शोर, क्रोध, घृणा जैसे भाव कुछ समय के लिये ज्वार भाटे की तरह आते हैं और व्यक्ति अपने मूल स्वभाव की ओर लौट जाता है। कभी कभी इन विप्लवी भावों का रिमोट कन्ट्रोल किसी और के हाथ में चला जाता है और हम रोबोट हो जाते हैं। इसलिये तुम "जियो अपनी ही तरह से।"

3
जब जब मैं तुम्हें भूलना चाहता हूँ तब तब तुम और भी ज्यादा याद आने लगते हो। क्योंकि याद मिटाने का रबर हमारे पास नहीं है। यादें अतीत की गोपनीय कन्दराओं से निकल निकल कर आती हैं। उस समय तन बदन यहीं पड़ा रहता है और मन उन पुरातन गलियों में दौड़ दौड़ जाता है। उस आभासी रंगमंच में वे सारे परिदृश्य ऐसे सजीव हो उठते हैं जैसे सब वर्तमान में चल रहा हो। इसमें एक मजे दार बात यह भी है कि तुम्हारा मन बहुत सी यादों में से अच्छी और मधुर यादें चुनकर उनका आनन्द ले सकता है परन्तु आक्रान्त क्षणों में यह चुनाव संभव नहीं होता लेकिन इस आवेग के समाप्त होते ही फिर अपना चुनाव संभव है। "चलो स्वर्णिम अतीत से कुछ अच्छा सा ढूँढ लाएँ।"

4
हम शायद कुछ देर के लिये खुश तो हो लिये पर सुखी होना भूल ही गये हैं। ठहाका मारने के पहले हम आस पास देखते हैं कि हमें देख तो वहीं रहा है। "लोग क्या कहेंगे?" एक ऐसा छोटा सा किन्तु बहुत बड़ा प्रश्न है जो हमारी नैसर्गिक चेष्टाओं में विक्षोभ पैदा कर देता है और हम अनैच्छिक औपचारिकता में उतर पड़ते हैं। हम अगर तथाकथित संभ्रान्त लोगों के बीच बैठे हैं और छींक आ गयी, खाँसी आ गई, उबासी आ गई तो हम 'सॉरी' कहते हैं।  क्यूँ भाई? 

5
"सहनाववतु सह नौ भुनक्तु सहवीर्यं करवावहै, तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।" यह हमारी सामूहिकता की वैदिक प्रार्थना है जिसे छोड़ कर हम बच्चों को नं. वन आने के लिये तैयार कर रहे हैं। इसका सीधा सीधा मतलब उसे यह समझाना है कि बाकी सब तुम से नीचे हों, इन्फीरियर हों। तुम उन सब को पीछे छोड़ कर आगे निकलो। यह स्पर्धा की भावना बच्चों के अपने भीतर से निकल कर बाहर आ जाती है और वह अपने भीतर मौजूद श्रेष्ठ को निखारने के बजाय बाहर की प्रतिस्पर्धाओं में जूझने लगता है। नं. वन नहीं मिलने पर कई घातक परिणाम सामने आये हैं। इस स्पर्धा की प्रवृत्ति ने शिक्षा की रीति-नीति और पद्धति को बदल कर रख दिया है। कहाँ थे कहाँ आ गये हैं?

6
मेरे आने से पहले अनगिनत आये भी और चले भी गये। इनको मैने नहीं देखा। जाने के बाद भी आवेंगे और जाते भी रहेंगे उन्हें भी मैं देख नहीं सकूँगा। संसार एक रेलगाड़ी है। एक स्टेशन पर रुकती है तुम भी इसमें एक दिन चढ़े हो। कुछ लोग पहले से सफर में हैं, कुछ तुम्हारे संग बैठे हैं, अपनी अपनी तरह से सफर कर रहें है, कुछ स्टेशनों से चढ़-उतर रहे हैं। इनमें से कुछ लोग तुम पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। "क्या तुमने अपने किसी सहयात्री पर मधुर यादें छोड़ी हैं?

7
अगर कोई समझता है कि वह समय काट रहा है तो उसे ध्यान नहीं है कि असल में समय उसे काट रहा है। कुल उम्र में से तिल तिल कर क्षण घटा रहा है। यह एक दृष्टि है। दूसरी दृष्टि इसी बात के विषय में यह है कि समय ने ये क्षण हमें कुछ सकारात्मक और रचनात्मक कार्यों के लिये उपलब्ध कराये हैं जो अनुपयोगी छोड़ दिये तो ये फिर लौट कर नहीं आवेंगे।   
"समय का सदुपयोग जीवन के मूल्य बढ़ा देता है।"

8
एक मार्ग पर दो तरह की दौड़ चल रही है। एक हिरन की दूसरी शेर की। भय से हिरन जिस मार्ग पर भागता है वह वास्तव में शेर का 'विजयपथ' होता है। लेकिन शेर का शिकार झुण्ड में से केवल वही हिरन होता है जिसमें जिजीविषा की कमी होती है, जो जीवन की आस छोड़ देता है। इस दौड़ में जीवन उसी का शेष रहता है जो तेज दौड़ता है। शेर नहीं दौड़ा तो भूख से मर जावेगा, हिरन नहीं दौड़ा तो शेर का भोजन बन जावेगा। दूसरे शब्दों में "अपनी अपनी दौड़ जीवन की रक्षा की दौड़ है।"

9

एक मरीज जब किसी डॉक्टर के पास जाता है तो अपनी तकलीफें उसे बताता है। अधिकांशत: मामलों में वह डॉ को पूरी तरह नहीं जानता फिर भी वह अपना जीवन एक विश्वास के साथ डॉ के हाथ में सौंप देता है। इतना विश्वास कि डॉ उसे अमृत दे या जहर, वह पूर्ण निष्ठा के साथ उसके आदेश का पालन करता है। हो सकता है सर्जन उसका, सिर, हृदय अथवा किडनी खोल दे। गजब का विश्वास होता है मरीज में कि डॉ के सामने मृत्यु का भय भी कहीं फेंक देता है। ऐसे अधिकतर मरीज पुनर्जीवन और स्वास्थ्य पुनः प्राप्त करते है। यह उनके शरीर और तकनीक की ही नहीं एक परस्पर दृढ़ विश्वास की जीत है।

10
मेरे भीतर जो इच्छाएँ जन्म लेती है उसकी आपूर्ति मैं किसी संसाधन से अपने ढंग से करने लगता हूँ। इनमें से कुछ इच्छाएँ पूरी होती है और कुछ नहीं भी हो पाती है। यहाँ तक तो ठीक है परन्तु अगर मेरे आसपास बाजार के लोग कुछ सामान मेरी इच्छा पर जबरन लाद दें और मैं उसमें फँस जाता दूँ तो मैं बहुत बड़ा स्टुपिड हूँ। ऐसे समय में उस चौपाये की तरह हो जाता हूँ जिसे एक मालिक उसकी मर्जी से चारा खिलावे, बर्सिम खिलावे, भूसा खिलावे या भूखा ही रखे। आज कल "एक के साथ एक फ्री" भी इसी तरह का इन्द्रजाल है। श्याणे लोग इसमें ज्यादा फँसते हैं। 
इसलिये "हम अपना जीवन अपने विवेक और अपनी शर्तों पर जियें।"

11
जिन्दा रहने के लिये माल असबाब जरूरी है? या माल असबाब जुटाने के लिये जिन्दा रहना जरूरी है? छोटे छोटे इन प्रश्नों का उत्तर यदि हम स्वयं से पूछ लें तो हमारी जीवन शैली में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ सकते हैं।
प्रथम दृष्टया शायद दोनों एक दूसरे के लिये जरूरी है। पर दोनों में से पहला चुनाव कौनसा और अन्तिम चुनाव कौनसा होना चाहिये? निश्चित रूप से पहला जवाब है "जिन्दा रहना जरूरी है'। 
तो आप सिर्फ माल असबाब के लिये जिन्दगी दाँव पर लगाओगे क्या?

12
केक्टस में कॉंटे भी होते हैं और फूल भी और गुलाब के पौधे में भी काँटे भी होते हैं फूल भी पर केक्टस की पहचान काँटे से और गुलाब की पहचान फूल से होती है। क्यों? क्योंकि केक्टस के काँटे और गुलाब के फूल ज्यादा खूबसूरत हैं। महलों के टूटे फूटे खण्डहरों में भी कोई न कोई खूबसूरत इतिहास होता है। सूरज में सिर्फ आग ही का नहीं क्या हमें उसमें से जगत को पालन करने वाली जीवनी उर्जा का निरन्तर प्रदान करने वाली शक्ति का आभास नहीं है? चाँद में अगर हमने दाग ही दाग देखे हैं उसकी शीतल चाँदनी का आनन्द हमें नहीं लुभाता। जैसे प्रकृति की हर संरचना में कोई न कोई खूबसूरती है हम उसे उस नजरिये से देखते ही नहीं हैं। हमारे भीतर भी एक से बढ़ कर एक एब हो सकती है पर "जिन्दगी कितनी खूबसूरत है" इसे हम देख नहीं पावें तो हम से बड़ी चूक हो रही है।


कनिष्ठिकाएँ (प्रथम) 
कनिष्ठिकाएँ (द्वितीय)
कनिष्ठिकाएँ  (तृतीय) 







Thursday, 11 May 2023

57

लहर-लहर
57
हमारे आँगन में

वे हमारे अतिथि हैं, मित्र है, सहचर हैं और हमारे ऑक्सीजन प्लान्ट हैं। अतिथी इसलिये कि ये सारे पेड़ पौधे कहीं न कहीं से हमारे आँगन मे पधारे हैं। ये सभी हमारे आँगन में बारी बारी से उतरे हैं। मित्र इस तरह कि वे हमारे सुख-दु:ख के साथी है। मौसमों के कोप से रक्षा करते हैं। सहचर इस तरह कि ये साथ ही रहते हैं।
देखो! यहाँ हारसिंगार हँसता है, पास ही सफेद अकउआ (आँक) वायव्य कोने में स्थित है जिसके सफेद पुष्पगुच्छ मेरे आराध्य देव शिव को परम प्रिय है। इसी के करीब में मीठा नीम अपनी केरेक्टर स्मेल और स्वाद ले कर खड़ा है और हमारे मनमोहन के रुचिरभोग के लिये अपनी सुगन्धित और स्वादिष्ट पत्तियाँ प्रदान करता है। फिर यह  बिल्व अपने त्रिदल से त्रिपुरारी शिव को बिल्वाष्टक सुनाता है। ये पत्र त्रयम्बकेश्वर को रात दिन लगा रहे हैं मानस-त्रिपुण्ड। मधुमालती स्वजन और अतिथियों के स्वागत में खड़ी है गुलाबी श्वेत पुष्पों की झालर लिये। क्यारी में दो महकते हैं मोगरे के फूल अपनी नैसर्गिक सुगन्ध से महकते हैं। यहीं पास में है तुलसाँ महारानी विराज रही है जो स्वामिनी है इस उपवन की पुण्य-प्रभा की। चीकू तो हमारे घर की पहचान बनी हुई है। इस पर मधुपरियाँ कभी कभी अपना घर बनाती रहती हैं। इसके पड़ोस में गिट्टेदार मोगरे का नन्हा पेड़ भी खड़ा है जो पावस में पुष्प देता है।
आँगन के केन्द्र में लंगड़ा आम खड़ा है जो हर बसन्त में अपनी आम्र-मंजरियों से महकाता है घर मोहल्ले को, कोकिला को मिठास भरी कुहक सुनाने के लिये निमन्त्रण देता है। हमने इसके आम कभी नहीं तोड़े, जो 'साग' बन कर गिरे वो हमारे बाकी सब पंछियों के होते हैं। इसकी एक डाल पर परमार्थ टँगा है, चिड़िया के दाने भर कर और साथ में एक सकोरा भी शीतल जल भर कर। गिलहरियों के चंचल दो जोड़े तिड़िप तिड़िप कर शोर करते रहते हैं। वहीं दाना, वहीं पानी और वहीं फल। नींबू का नन्हा सा पेड़ हमारे लिये विटामिन सी का प्रचुर भण्डार तैयार करता है। नैऋत्य कोण में द्वार से लगा हुआ रक्तपुष्प लिये गुड़हल माँ दुर्गा और गणाध्यक्ष के पूजन के लिये तत्पर है। समस्त संसार के कण कण को प्राण और ऊर्जा प्रदान करने वाले भुवन भास्कर अपनी सहस्रों किरणें ले कर छत पर उतरते हैं और बिजली के तार अनुप्राणि हो उठते हैं। दशहरी आम का पौधा अभी किशोर वय को प्राप्त कर चुका है। इन सभी पेड़ पौधों से हमारे मौन संवाद चलते ही रहते हैं। हम इनसे सिर्फ उतना ही लेते हैं जिससे हमारी पूजा-पुजापा संपन्न हो जावे। हम इनके ऋणी हैं इसलिये हम इनके सेवादार हैं।
कुछ इस तरह मैं "अपने बाहर के शहर में अपने भीतर का मेरा अपना गाँव ढूँढता रहता हूँ।"

रामनारायण सोनी
७.५.२३
 

Thursday, 4 May 2023

आत्मानुसन्धान 55

भण्डार में पड़ा अनाज का दाना मात्र एक दाना ही है पर जब तक उसे उगाने के लिए तैयार न किया जाए। जब उसे अपने मूल स्रोत की ओर यात्रा करना है तब वह "बीज" कहलाता है, उसकी संज्ञा बदल जाती है, पहिचान बदल जाती है, उद्देश्य बदल जाता है। फिर भी इस दाने की यात्रा वृक्ष तक की तब तक असम्भव है जब तक वह बीज होने की प्रक्रिया से न गुजरे। जब उसकी यह यात्रा प्रारंभ होगी तब इस दाने को शीत, आतप और अंकुरण की प्रसव वेदना से गुजरना होता है। 
बीज अपनी देह से अंकुरण की प्राथमिक ऊर्जा का उत्सर्जन करता है और स्वयं को समाप्त कर लेता है। फिर आगे की तैयारी के लिये उसे दोनो दिशाएँ ढूँढनी होती है एक धरती की कोख की ओर और दूसरी आकाश के विस्तीर्ण आयाम। एक दिशा अन्धकार की है और दूसरी प्रकाश की। एक से स्थायित्व और जीवन का सत्व मिलता है और दूसरे से विकास। यही संतुलन उसे वृक्ष की संपूर्ण यात्रा भर तक चलता है। पहले उसे ऊँचा उठना है फिर गहराना है। पहला ऊर्ध्व विकास और दूसरा क्षैतिज; अंग्रेजी में कहें तो वर्टीकल और हॉरीजेन्टल डेवलपमेन्ट। जीवन भर एक संघर्ष उसे धरती के गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध करना होगा तभी वृक्ष में जल की आपूर्ति संभव होगी और दूसरा उसे अपना भोजन बहती हवा से निकालना है। बीज का उत्सर्ग इसलिये कहा जा रहा है कि जैसे आम का बीज बोया और उसका वृक्ष बन जाने पर न तो बीज शेष रहता है न उस बीज का मूल नाम ही। अपने शरीर और नाम दोनों का त्याग यहाँ अपने आप हो जाता है। बीज अब इन दोनों से मुक्त है। बीज के इस संपूर्ण प्रक्रिया से गुजर कर जिस वृक्ष से वह बीज आया था आज फिर वही अपने मूल रूप वृक्ष तक पहुँच गया है। "आम से चल कर आम होना एक खास बात है।" 
वस्तुतः तुम अगर बीज हो सकते हो तो रूपान्तरित हो कर अपने मूल रूप "वृक्ष" रूपी आत्म को प्राप्त हो सकते हो क्योंकि "बीज होना वृक्ष का सूक्ष्म स्वरूप में स्थित होना ही तो है।" 
तो अब समझ लो कि तुम्हें बीज हो जाना है। अगर मुक्त होना है तो अपने "स्व" के उत्सर्ग की तैयारी करो। उत्सर्ग करो अपने स्व का, अपने साथ चल रही संज्ञा का, उपाधि स्वरूप चल रहे अपने नाम का। तुम्हें प्राप्त हाेना है अपने आत्म स्वरूप को।
इसलिए संकल्प करो इनसे मुक्त होने का, अपनी नैसर्गिक दिशाएँ पाने का, अपने मूल स्वरूप को प्राप्त होने का। "तत्वमसि"।

रामनारायण सोनी




Tuesday, 2 May 2023

3 posts

51
अंकुरण से ले कर विशाल वृक्ष होने तक की यात्रा में सब से महत्वपूर्ण समय है- प्रथम अंकुरण से उस नन्हे पौधे तक का विकास। अंकुरण के भी दो प्रभाग है- पौधे का ऊपरी भाग आकाश और निचला भाग पाताल की ओर चल पड़ता है। जन्मते ही उसकी जड़ें धरती में अपना जमाव और नमी खोजने निकल पड़ती है और ऊपरी भाग हवा और प्रकाश ढूँढने चल पड़ता है। जडें मजबूत हों, वृक्ष का जब तना पुष्ट हों और शाखाओं, फूलो, फलों से वह लदा हो तब वह वृक्ष स्वयं को सर्वाइव कर लेता है। नन्हे पौधे को संरक्षण, संस्कार और अत्यधिक संभालने की जरूरत होती है। ठीक इसी तरह मनुष्य को बचपन में यह सब आवश्यक होता है। इसलिये प्राथमिक स्तर और आयु में ही सम्यक शिक्षा की जरूरत है। मैं इन्हें गुरूजी मानता हूँ। मैं यह इसलिये भी कह रहा हूँ कि जब मैं अपने गांव जाता था तो अपने शिक्षकों के प्रति मेरा सम्बोधन होता था "गुरूजी प्रणाम!" और जब मैं उनके चरण स्पर्श करता था उस समय उनके चेहरे पर नितान्त सौम्य और आशीष के भाव आते थे, उसमें मुझे अलौकिक दिव्यता दिखाई देती थी। इन महत्वपूर्ण घटनाओं को मैं जीवन भर कभी नहीं भूला। बाद की शिक्षा में जो शिक्षक रहे वे सभी आदरणीय हैं पर वे गुरूजी सदैव मेरे लिये पूज्यनीय रहे हैं। मैं उन्हें प्रणत भाव से नमन करता हूँ।
मुझे अच्छी तरह याद है उस बाँस की जाफरी वाली उस पाठशाला का वह पहला दिन। जूट की टाटपट्टी पर माँ ने ले जा कर बैठा दिया था। हाथ के सिले जूट के झोले में थी बस एक स्लेट और खड़िया की कलम जिसे हम पेम-पट्टी कहते थे। एक पूर्ण आश्वस्ती के साथ  पाठशाला को और मेरे पूज्य गुरू को सौंप कर
माँ अपनी उँगली छुड़ा कर चली गई।
माँ के कहे अनुसार गुरूदेव के कक्षा में आने पर मैंने अपने प्रथम गुरुदेव पूज्यपाद श्री मदनलाल जी वर्मा के श्रीचरणों में षाष्टांग प्रणाम किया। वह एक रोमांच भरा क्षण था। मैं आज भी अपने भाल पर उन पावन चरणों का स्पर्श महसूस करता हूँ और श्रृद्धा भाव से लबालब भर जाता हूँ।
इस तरह से मैं अपने कुल से गुरुकुल में प्रविष्ट हो गया। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ और धन्यवाद करता हूँ कि मैं शिक्षा के उस मन्दिर में प्रतिष्ठित हुई उन प्रथम जड़ों को और गुरू के आशीर्वाद को कभी नहीं भूलूँ।

रामनारायण सोनी
५.०९ .२२

52

जरूरी क्या है?
यह प्रश्न जीवन का विस्तार के लिये जरूरी है पर 'क्या क्या जरूरी है?' यह एक बड़ी वितृष्णा को जन्म देने वाला है। क्या जरूरी है? यह जीवन की आवश्यकता है पर आवश्यकता की परिधि को पार कर जाना मरुस्थल भागते हुए उस हिरन की तरह है जिसके नसीब में सिर्फ दौड़ है। वह दौड़ जो सिद्ध कर देती है कि तुमने प्यास बढ़ाई है, बुझाई नहीं। इस से तो अच्छा था तुम आवश्यकता की उस परिधि के भीतर ही खड़े रहते। भौतिक सुखों की चाह और दुनिया का बाजार यह कहता है कि यह विचार तो मानव जाति का विकास रोकता है पर यह डिमान्ड एण्ड सप्लाय के सिद्धान्त को कहाँ मना करता है। अतः आवश्यकता की आपूर्ति के लिये मनाही नहीं है। जब हमें अच्छी तरह से पता है कि लास्ट रिक्वायरमेन्ट दो गज जमीन है तो फिर अन्धी दौड़ में हर कोई क्यों लगा है? "कबीर थोड़ा जीवना, मांडे बहुत मंड़ाण।" 

प्रकृति का हर अंग न तो प्रतिस्पर्धा करता है न प्रतिघात। एक पेड़ ने कभी नहीं चाहा कि बगल का पेड़ उससे ऊँचा न हो। बड़ी नदियाँ छोटी नदियों से कहती हैं आओ हम साथ मिल कर चलते हैं अपने उस गन्तव्य सागर की ओर। पवन कहती है कि चलो खुशबुओं से संसार को और सुगन्धमय बनाते हैं। सारे ग्रह उपग्रह अपने सूरज के परिवार में जुड़े हुए चल रहे हैं अपने अपने संयम से। कोई अतिक्रमण नहीं करता अपनी स्वयं की बनाई आचार सहिता का। पंछी आज सुबह उड़ेगा अपनी भूख प्यास ले कर और लौटेगा एक परितोष भरी तृप्ति ले कर। उस के अपने संग कोई संग्रह नहीं होगा। अपनी भूख के अनुसार ही अपना पेट भरेगा।

हम न वक्त की चाल रोक सकते है, न शरीर की यात्रा और न ही जन्म और मृत्यु की आवृत्तियाँ ही। विज्ञान ने हमें सुख तो कई दिये हैं पर संतोष नही उल्टे हमें तेज, और तेज दौड़ना सिखा दिया। जीवन तमाम आवश्यकताओं से भरा पड़ा है पर इसकी आपूर्ति के बीच संतोष तक सीमित रहे तो बेहतर होगा।
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।। श्रीमद्भगवद्गीता १६/१३।।

रामनारायण सोनी
१९.०८.२२

52
पतझर आया और सूख कर जर्द हुए पात सब के सब झर गये। फिर बिसर गई वह टहनी भी जिस पर उन्होंने पूरा जीवन जिया फिर इस करुणा भरी कथा को अब जग से क्यों कहनी?
इस करुणा के प्रस्फुटित बीजों में विगत का विरह और आगत का अन्तर्द्वन्द्व स्पष्ट देखा जा सकता है। नियति की तीखी तलवार इन सूखे पत्तों पर कच्चे धागे से लटकी दिखाई देती है।
ये कोपलें जो अभी अभी फूटी हैं उन विगत पत्तों की वंशज है।
संसृति के पोषण हेतु सृष्टि का यह अनवरत क्रम है और आगे भी चलता ही रहेगा। सब के सब उस क्रम में ही गुजर रहे हैं। संसार में चल रहे ये सब के सब रंगमंच के कोई न कोई पात्र हैं और अपना किरदार निभा रहे हैं। कबीर कह गया -"आया है तो जायगा राजा, रंक, फ़कीर।" एक उजागर सत्य है कि नव पल्लव एक दिन पुराना पड़ेगा और वही का वही इतिहास फिर फिर दोहराया जावेगा जो अपने पूर्व के पत्तों ने निभाया है। अगर ऐसा है ही तो फिर इसे बार बार क्यों याद दिलाया जावे? याद रखना चाहिये कि जो अवश्यंभावी है उसका प्रतिरोध कैसा?
इस तथ्य को अपने दिल में धारण कर फिर इस कल कल करती जीवन सरिता में स्वच्छन्द बहने का आनन्द क्यों न लें। आओ! चलो! मिल कर बहें! खुल कर बहें! धारा के संग बहें! जीवन के इन रास्तों में कई खूबसूरत मोड़ होंगे, सुन्दर झरने होंगे, कल कल करते प्रपात होंगे, धीर गंभीर मन्थर गतियाँ होंगी, सुहाने तट मिलेंगे। हम अगर नाव की तरह नहीं बन पावे तो एक अदने से तिनके की तरह ही सहज बहें! विश्वास करें कि इस जीवन का वह प्रदाता अतुल्य है, वैभवशाली है तो उसकी बनाई यह जीवन सरिता भी भव्य ही होगी। हमे स्वयं ही यह बोध हो जाना चाहिये। यह भी याद रहना चाहिये कि "हम से बेहतर हमें कोई और नहीं जानता।"
महसूस करें कि एक आनन्द से परिपूर्ण अन्तर्प्रवाह हमारे भीतर ही भीतर अनवरत चल रहा है। जो पल बीत गये सो बीत गए, उन्हें कोई नहीं लौटा पाएगा। जो आने वाले कल में होना है वह कल का सूरज ही बताएगा। यह भी याद रहे कि समय बड़ा बलशाली है, नियन्ता है सब वही लाएगा और समेट कर फिर वही ले भी जाएगा। इसलिये कल कोई सा भी हो, कैसा भी हो चिन्ता कैसी?
"हमारा वर्तमान हमारी मुट्ठी में है। जियें जी भर कर। आज में जिएं। अभी में जिएं।"

रामनारायण सोनी

53

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्त मध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।2/28।। श्रीमद्भगवद्गीता।।
बहती हुई उस नदी को ध्यान से देखो। हमारे जीवन में और इस नदी में कितनी बातें एक सी हैं यह नदी हमें अध्यात्म, दर्शन और जीने की राह बताती है।
नदी का जन्म नहीं होता है वह भूगर्भ से प्रकट होती है। नदी का अवसान भी नहीं होता है अपितु वह सागर में जा कर अदृश्य हो जाती है अर्थात् अप्रकट हो जाती है। बीच में ही वह बहती दिखाई देती है। हमारे जीवन की नदी भी हमारे जन्म और मृत्यु के दो सिरों के बीच बहती है। स्पष्ट है कि जन्म उद्गम है और मृत्यु अवसान। नदी के प्रवाह की तरह हमारे जीवन में भी गति है। यह 'गति' संकेत करती है उस चेतना और ऊर्जा की ओर जो सम्पूर्ण जीवन में साथ चलती है पर कहीं दिखाई नहीं देती है परन्तु इसी के कारण जीवन विद्यमान है। गतिमान होना ही जीवित होने का संकेत है। नदी का जीवन तात्विक रूप से देखा जाय तो उसकी देह का एक नैसर्गिक गुण है फिर यह नदी अन्त में सागर में समाहित होने के पूर्व मुहाने पर अन्तिम रूप से दिखाई देती है। किसी ने खूब कहा है-

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा,
मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा...!!

 हमारे जीवन के सम्पूर्ण सर्ग के उपसंहार में जीवन का संकुचन मात्र ही तो है। यह संकुचन मुट्ठी भर राख के रूप में दिखाई देता है और अन्त में या तो जल में प्रवाहित कर दिया जाता है या उसे हवा उड़ा ले जाती है।
इस गतिमान जीवन के द्वारा पीछे छोड़ी गई रेखाएँ ही जीवन के अभिलेख हैं जिसे जाने अनजाने में तुम ने ही लिखे हैं। इस प्रक्रिया में जो कुछ भी पीछे छूट गया है उसके साथ जुड़ा रहेगा तुम्हारा नाम, कथानक, यश और अपयश।

रामनारायण सोनी
२-०५-२३

Monday, 23 January 2023

१२ अन्तःकरण से जुड़े लोग

लहर लहर १२

अन्तःकरण से जुड़े लोग।

"भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:"। अपनी आँखों से अच्छा देखो।
आँखें एक गेट वे है जरूर पर हर किसी को दिल तक जाने नहीं देती। एक बारीक से छेद में से ही पूरी दुनियाँ समा लेती है। तुमने कभी ध्यान नहीं दिया इस फर्स्ट गेट के आगे कॉमन हाल है जहाँ तक वे लोग पहुँचते हैं जो तुम्हारे साथ कोई न कोई रिश्ता रखते हैं या वहाँ पर ठहरने के लिये अपना स्थान बना लेता है। यह बहुत बड़ी जगह है जहाँ बहुत सारे लोग समा सकते हैं, रुक सकते हैं, बाहर भी निकल सकते हैं। इस कामन हॉल में कभी कभी बहुरूपिये, मुखौटेबाज, छलिया, और शरारती लोग भी पहुँच जाते हैं और विप्लव मचाते रहते हैं। इन्हें बेदखल करना बहुत मुश्किल होता है। उन्हें सम्हालने में बहुत सारी ऊर्जा खर्च हो जाती है। ये वायरस की तरह हमारे इम्यून सिस्टम पर ही अटेक कर देते हैं। ये बहुत बलशाली हैं और किसी भी एन्टीवायरस से भी मरते नहीं है पर इनके लिये क्वारन्टीन करने की जगह इसी हाल में रखना पड़ती है। यह हॉल भरता और खाली होता रहता है। फिर इसके आगे एक सिट आउट है यहाँ तक वे लोग आते हैं जो तुम्हारी इजाजत के इन्तेजार में रहते हैं। ये वे लोग है जो तुम्हारी मनोवृत्ति, रुचि अथवा पसन्द की कसौटी पर खरे उतरते हैं। यह सिट आउट इसलिये भी जरूरी है कि यहाँ फिर एक छ्ननी लगानी है। यहाँ से आगे का मार्ग बहुत महत्वपूर्ण है अन्यथा डेमेजकन्ट्रोल सम्भव नहीं होता है। ये वे लोग हैं जो तुम्हारे जीवन को, विकास को, गिरावट को, मन मस्तिष्क को पूरी तरह प्रभावित करते हैं। इस सिटआउट के बाद एक लिविंग रूम हैं जहाँ तुम इन चहेते लोगों के साथ रह सकते हो, व्यवहार कर सकते हो, आदान प्रदान कर सकते हो।   तुम इनके साथ पूरा जीवन साझा करते हो।
सिटआउट से सँटा हुआ सबसे अलग थलग एक गलियारा है जो सीधे तुम्हारे अन्तःपुर में पहुँचता है। अन्तःपुर तुम्हारा अपना अन्तःकरण ही है इसमें जो लोग पहुँच गये उन्हें तुम जन्म जन्मान्तरों का भूल नहीं सकते। ये वे लोग हैं जो तुम्हें और तुम इन्हें अच्छे लगते हो। जरूरी नहीं कि दुनियाँ जान सके कि ये कौन कौन लोग हैं। कभी कभी इसमें रहने वाले सक्ष भी नहीं जानते कि तुम उन्हें एक तरफा पसन्द करते हो। यहाँ देवत्व उतर आवे तो तुम भक्त बन जाते हो, दानव उतर आवे तो विध्वंसकारी हो सकते हो और यहीं अनन्त संभावनाएँ निर्मित होती हैं जो तुम्हारे भीतर बाहर की तमाम गतिविधियों और सम्पूर्ण जीवन को नियन्त्रित करती हैं। यह गलियारा तुम्हारे अपने नियन्त्रण में है। यहाँ पहुँचने और रहने वाले लोग सब रिश्तों को लाँघ कर आते हैं और किसी भी प्रकार के बन्धनों-अनुबन्धों से मुक्त रहते हैं। ये इस तरह साथ रहते हैं जैसे आँखों से कान और मुँह सिले हुए हों। ये अगर बाहर निकल भी जावें तो इनकी अमिट स्मृतियाँ वहीं परमानेन्ट बनी रह जाती हैं और तुम इनके वर्चुअल इफेक्ट में हमेशा ही रहते हो चाहे वह तुम्हारा गुरू हो, प्रेमी हो अथवा आदर्श हो। इनमें से भी कोई एकाध तुम्हारे संग दूध में घुली मिसरी की तरह रहता है। जिसे वह भी जानता है और तुम भी। वह अलेप है, लोभ आदि सभी विकारों से रहित है। चाहे वह पुरुष हो, प्रकृति हो या परमात्मा हो। इसे तुम से जुदा कोई नहीं कर सकता। 
"तुम्हारा अपना अन्तःपुर सिर्फ तुम्हारा है इसे तुम ही अच्छी तरह सम्हालो"।

रामनारायण सोनी 

Friday, 20 January 2023

११ खुद के संग जरूर रहना

11

खुद के संग जरूर रहना

संसार गतिमान है। कोई आ रहा है कोई जा रहा है। कोई ला रहा है, कोई छोड़ रहा है। कोई कुछ कदम साथ चला फिर कहीं छूट गया। लोग मिलते गये, रिश्ते बनते गये। इस आपाधापी में सदैव जो संग रहा वह तुम स्वयं थे परन्तु कई बार तुम्हें लगा होगा कि तुम्हारे साथ कोई भी नहीं है तुम शून्य में हो। पर निश्चित रूप से जब जब भी ऐसा हुआ होगा वह तुम्हारी आत्मविस्मृति थी। एक और सच महसूस हुआ होगा कि जैसे ही कोई विपत्ति आयी तो कुछेक को छोड़ कर बाकी सब अगली बगली झाँकते नजर आयेंगे। 
आत्मविस्मृति की यह भूल अर्जुन को भी हुई थी। महाभारत के समरांगण में उसके सामने लोग खड़े थे, रिश्ते खड़े थे, दुविधाएँ खड़ी थी, और एक संशय खड़ा था। इन सब का जो सम्मिलित मध्यम प्रभाव था वह 'विषाद' था। ऐसा तो सारा निर्मित परिदृश्य था पर इन सब के बावजूद सबसे विचित्र तो यह था कि विषाद का अन्तिम प्रभाव अर्जुन की "आत्मविस्मृति" होना था। 
उसे पता ही नहीं रहा कि वह कौन है? क्यों समर में आया है? उसका कर्म-अकर्म क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर उसे खोजना नहीं था अपितु उसे इनका स्वयं बोध होना चाहिये था। यह तो स्पष्ट था कि अर्जुन उस प्रांगण में "वह सबके साथ खड़ा था पर खुद अपने ही साथ नहीं खड़ा था।" कर्म का सबसे बड़ा साधन तो पुरुषार्थ है और आत्मबोध के बगैर न धर्म होगा, न अर्थ मिलेगा, न कामना की आपूर्ति होगी, फिर मोक्ष की बात तो बड़ी दूर की है। न मार्ग का पता होगा न मंजिल का। 
यह जरूरी नहीं कि जैसे हनुमान जी को जामवन्त मिले तुम्हारे जीवन में कोई मिल ही जावेगा, हर ग्वाले को चाणक्य मिल ही जावेगा।
श्रीमद्भगवद्गीता अर्जुन के विमोहन और आत्मविस्मृति के निक्षेप से शुरू होती है और "स्मृतिर्लब्ध्वा" अर्थात् आत्मबोध पर जा कर पूर्ण होती है। वह कह उठता है "यथेच्छसि तथा कुरू" अब आप जैसा चाहेंगे वैसा करूँगा।
तुम खुद को भूले  तो तुम्हारे अन्तःकरण के सब द्वार बन्द हो जावेंगे। 
सब से बड़ा सच तो यह है कि "तुम से अधिक तुम्हें कोई और नहीं जानता।"

संकलित 4/2/23

लहर-लहर

संकल्प!!!
मित्रों! आज से चिन्तन का एक नया अध्याय शुरू करते हैं। ये अध्याय छोटी छोटी लहरों के जैसे हों और फिर मिलकर एक बड़ी लहर बना दे। इसकी स्क्रिप्ट बहुत छोटी छोटी (एक पेज से कम) रहेगी। हर एक के अन्त में उसका निहित उद्देश्य अंकित होगा।
इस धारावाहिक 'लहर लहर' की प्रतिदिन एक कड़ी, कुल -50 कड़ी, लिखी जा रही है जो अन्त में एक लघु पुस्तक का रूप ले लेगी।

यह एक प्रयोगात्मक प्रयास है।
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1
जिस प्रकार मैं बरसात में अपना छाता, कछुआ अपनी कढ़ाईनुमा पीठ अपने साथ ले कर चलता है मैं भी अपना क्षितिज साथ ले कर चलता हूँ। इस विषय में तुम मुझसे अलग नहीं हो। कितनी ही तेज दौड़ लगाएँ, कहीं भी चले जाएँ वहाँ फिर वही नया क्षितिज नजर आएगा। इसे आज तक कोई पकड़ नहीं पाया। 
इसी तरह हम मान्यताओं, अवधारणाओं और विचारों का अपना क्षितिज ले कर चलते हैं। हम जहाँ जहाँ जाते हैं अपना अपना यह क्षितिज पल्ले बँधा पाते हैं। नया क्षितिज चाहिये तो हमें मान्यताओं, अवधारणाओं और विचारों के परिष्कृत आयाम ढूँढने होंगे। इस बदलाव में सावधानी बरतनी होगी। अगर कोहरा है तो उसे छँटने का इन्तजार करना होगा अन्यथा कहीं गिर-पड़ सकते हैं। तो चलो! एक बेहतर क्षितिज खोजते हैं।

2
तुम डर से डरते हो, सहमते हो और सोचते हो कि डर से आमना सामना न हो पर तुम जानते नहीं कि इसी डर के कारण दुनिया में बड़े बड़े काम हो रहे हैं। मौसम के डर से तुमने मकान बनाया। बरसात के डर से छाता खरीद लाए। भूख के डर से बड़े बड़े गोदाम बनाए। गर्मी के डर से पंखे ले आए जो लम्बे समय से छतों में व्यर्थ ही टँगे हुए हैं। जरा देखो तुमने डर डर कर अपने इर्द गिर्द सामानों का कितना जखीरा इकट्ठा कर लिया है। इस डर ने कई कई खोजें संसार को दी है। अगर दीपक बुझने का डर न होता तो बिजली के लट्टुओं की चकाचोंध की ईजाद नहीं होती। सब से बड़ा डर तो मौत का है। इस डर ने कई कई अस्पताल खोल दिये हैं। डरना बुरा नहीं है पर डर के परमानेन्ट डर में रहना बुरा है। डर को बुलाओ मत पर आए हुए को धैर्य से परख कर उसका निवारण ढूँढ लो। 

3
भरोसा न हो तो दुनिया अभी के अभी थम जावेगी। कितने अनजान लोग अनजान वाहनों के संग संग या क्रास कर के हमारे चारों ओर से गुजर रहे हैं पर भरोसा है कि वे हमसे टकराएँगे नहीं। अगर भरोसा न होता तो हम सड़क पर कदापि नहीं जाते। भरोसा है कि भले ही मैं सोता रह जाऊँ तो भी सूरज उगेगा, दूध वाला दूध ले कर आवेगा। भरोसा है कि मेरे आसपास जो जो रिश्ते बन गए हैं वे कायम रहेंगे। मुझे जीने के लिये साँस लेते रहना है, तो मुझे यह भरोसा है कि अगर मैं भूल भी जाऊँ तो भी मेरा यह जीवन चलता रहेगा। भरोसा है कि मौसम और ऋतुएँ समय पर आवेंगी जावेंगी। रात और दिन इसी तरह अपने क्रम में चलते ही रहेंगे।
यह भी पक्का भरोसा है कि कहीं न कहीं आज के इस दिन मेरे खाने का इन्तज़ाम हो ही रहा होगा। प्यास बुझाने के लिये पानी मिलेगा ही। मेरे दिन भर के श्रम मिटाने के लिये रात आएगी। भरोसा शायद मेरे जीवन का अनजाने में ही मीत हो गया है। बहुत सारे ऐसे भरोसे हैं जिन्हें मैं प्रत्यक्ष में जानता तक नहीं।
"हर पल कोई न कोई भरोसा मेरे साथ चलता है, शायद मैं इसी आसरे में जिन्दा हूँ।

लहर लहर 4

प्यार की अपनी एक पुण्य गंध है, जिसे विज्ञान में केरेक्टरिस्टिक स्मेल कहते हैं। जैसे गुलाब की, चमेली की, मोगरे की, लकड़ी की, पसीने की, मिट्टी की उनकी अपनी अपनी है । प्यार की खुशबू प्यार के आगमन से पहले महकने लगती है। प्यार की सुगन्ध भीनी भीनी सी होती है। प्यार में शोर नहीं सागर जैसी प्रशान्ति है। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर तुम्हें एक अपनत्व भरी सुगन्ध महसूस हो रही है तो समझो एक प्रीति का सागर तुम्हारे आसपास ही कहीं मौजूद है। इसका आनन्द लेना हो तो वहाँ चले जाओ, उसमें डूब कर देखो। बारिश में भींगने का अपना मजा तो है पर देखो उस बादल को भी जो बरस रहा है। बहुत दूर से तुम तक चल कर आया है तुम्हें तरबतर करने को। यह मत सोचो कि कौन लाया है? कहाँ से आया है? बस देखो कि वह तुम्हारे सामने है। यह जरूरी नहीं है कि बादल रोज रोज आवेंगे। अब की बार चूके तो फिर न जाने कब मिलेंगे। तन भिंगोने के लिये तुम नकली शावर में रिमझिम बरसात सी तैयार तो कर लोगे पर उसके साथ मन भिंगोने के लिये वे बरसते सुहाने बादल नहीं होंगे। इसलिये चूक मत जाना। 
"चलो! यही सुअवसर है, सुसंयोग है।"


5
जिस्म के इतिहास में एक भूगोल भी है, जिस्म की एक लम्बी सी कहानी होती है जिसे तुम जिन्दगी कह सकते हो। जिन्दगी के रोजनामचे में रोज कुछ न कुछ लिखा जाता है। हर दिन के पन्ने के आखिर में बारीक अक्षरों में नियति अपनी ओर से परिणाम लिखती है और उसकी समरी भी वही जोड़ती चली जाती है। इसे तुम 'लेखा-जोखा' कह सकते हो। इस समरी में तुम एक शब्द भी नहीं जोड़ सकते न ही घटा सकते हो पर तसल्ली और समझ से इसे पढ़ सकते हो। इसमें दिल्ली दूरदर्शन के "पाया-खोया" प्रोग्राम जैसा विवरण भी लिखा होता है। 
कुछ रूमानी मायनों में हमारा जिस्म एक मकान भर है जिसमें जीवधारी किरायेदार जैसा रहने आता है। हमने इस मकान को बिगाड़ा तो यह सस्ते में जल्दी ही चला भी जाता है। जिन्दगी से प्यार करने वाले इसे करीने से रखते हैं, मेन्टेन करते हैं। जिस्म में लगी कर्मेन्द्रियाँ इसके कल पुर्जे हैं और पुरुषार्थ के संसाधन हैं। इसका इंजिन कमाल का है और ईंधन तो और भी गज़ब का है। जाने क्या क्या खा जाता है। वेज-नॉनवेज, भक्ष्य अभक्ष्य, पक्वान्न कच्चान्न।
परन्तु मजेदार बात तो यह है कि जिस्म न हो तो रूहें कहाँ रहेंगी? वहीं दूसरा अनिवार्य पहलू यह भी है कि रूह नहीं रहे तो यह दो कौड़ी का भी नहीं।  
"जिस्म और रूह, दोनों हैं तो हम, तुम और सब हैं। इसे सम्हालो जरा।"

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6

तुम शायद यही सोचते हो कि जमीन पर बहुत भीड़ है। आदमियों की भीड़, रिश्तों की भीड़, अपनों परायों की भीड़, चारों तरफ बस भीड़ ही भीड़ । परन्तु तुम इसे भीड़ समझ कर बड़ी भूल कर रहे हो। इसी भीड़ में तुम्हारी संस्कृति, सोहार्द्र, आत्मीयता और प्रेम पल रहा है, और यह सब केवल इस जमीन पर ही मिलेगा। तुमने सोचा मैं इससे बड़ा होना चाहता हूँ, इनसे ऊपर उठना चाहता हूँ, इन पर शासन-प्रशासन करना चाहता हूँ। इसलिये तुम किसी एक मंच पर चढ़ गये या तुम्हें कोई पद मिल गया है, तब तुम थोड़े बड़े हो गये हो। तुम्हारे साथ वहाँ कुछ स्वार्थी लोग ही बचे हैं। चढ़ते चढ़ते तुम पहाड़ पर चढ़ गये यानी कि कुछ और बड़े हो गये। वहाँ जा कर तुम उन सबसे ऊँचे और बड़े लग रहे हो, तब से तुम बिल्कुल अकेले हो गए हो। तब जमीन पर खड़े वे तुम्हारे अपने ही सब लोग तुम्हें बहुत छोटे दिखने लगे। शायद तुम्हें उनसे संवाद करने में भी अपनापन नहीं लग रहा होगा। 
बड़े होते होते एक दिन तुम सूरज हो गये। अगर तुम सचमुच सूरज हो गये हो तो तुम्हें दूसरों के लिये जीना और जलना होगा। दूसरों के लिये तपना होगा। दूसरों के लिये अपना समर्पण तैयार करना होगा। इस सब से बड़े 'बड़प्पन' के साइड इफेक्ट भी समझ लो। यहाँ तुम अपने मैदानी रिश्तों और अपनों से बहुत दूर आ गये हो। वे सब भी तुम्हारे ताप और प्रभुत्व के कारण तुमसे डरे डरे से हैं। यहाँ तुम न चाहते हुए भी बिल्कुल ही अकेले हो। क्यों? क्योंकि तुम सूरज बनना चाहते थे और तुम बन गये हो। तुम चाहते थे कि सारे ग्रह उपग्रह तुम्हारे इर्द-गिर्द चक्कर लगाएँ। सारे मौसम और ऋतुओं के तुम नियन्ता हो जाओ। तुम हो गये। पर नोट करो कि "तुम उन सभी अपनों के लिये किसी निर्जन में खो गये हो!" तुम उनसे इन परिस्थितियों में घुलने मिलने की सोच भी नहीं सकते। इसलिये सुनो! 
"जमीन पर छूटे हुए उन लोगों और रिश्तों को फिर से पाना है तो दूरियाँ, अहंता और ताप छोड़ना पड़ेगा, बड़ा होने का अहसास भी।"

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7

यह संसार कैसा संसार है? यह सब कुछ भाग रहा है, सब ओर परिवर्तन है, यहाँ ठहराव कुछ नहीं है। सुबह हुई, थोड़ी देर में बदल गई। बरसात आई बरस कर चली गई, बचपन आया चला गया। जो हमेशा से है और रहेगा वह है 'परिवर्तन'। यह नैसर्गिक नियम है। यहाँ सब दौड़ रहे हैं कोई तेज तो कोई धीरे। कोई जीवन ले कर अभी अभी आया है, वह आते ही चल पड़ा है। याने जीवन चल पड़ा। कोई अभी अभी गया वह भी चलते चलते ही गया। ऐसा लगता है कि 'जन्म' स्वयं मृत्यु ले कर पैदा हुआ है। गिन कर सांसें लाया है, रोज उन्हीं में से कुछ खर्च कर रहा है। हम रोज नई माँग लेकर सोते हैं और जब अगली सुबह जागते हैं तो उसकी आपूर्ति में दौड़ने लगते है। पेट की आग, शरीर की माँग, और कभी मन में घुली भाँग हमें बैठने नहीं देती। यह माँग भी परिवर्तनशील है जब एक पूरी होती है तो यात्रा के मील का पत्थर बन कर पीछे छूट जाती है और लगता है कि वह हमसे पीछे दूर भाग रही है। हम आगे भाग रहे हैं। फिर कुछ दूसरी माँगें सामने मुँह बाये खड़ी हैं। "बेहिसाब हसरतें न पालिए, जो मिला है पहले उसे सम्भालिए।"
समस्त चर अचर और ब्रह्माण्ड का कण कण चलायमान है। किसी ने कहा यह पहाड़ तो अचल है, पर अन्तरिक्ष में जा कर देखो यह धरती पर सवार हो कर सूर्य के चारों तरफ परिक्रमा में लगा है।
तो स्थिर क्या है? कौन है? नित्य कौन है? अपरिवर्तनीय कौन है? कौन है जो काल अर्थात् समय की सीमाओं से परे है? जो सब बदलता है पर खुद नित्य एक रस है। जो अपरिमेय है। जो निर्माण में भी है और ध्वंस में भी है। जो अनन्त है। 
जो कभी खाली नहीं होता ऐसा पूर्ण, जिसमे कुछ भरा नहीं जा सकता ऐसा पूर्ण, जो वहाँ भी है, यहाँ भी है। जिसमें सब है, जो सब में है। बनता भी है, बनाता भी है। इस सृष्टि के लय प्रलय के पहले भी था, है भी, रहेगा भी।
"चलो उस 'कौन' को जानने का प्रयास करें।"
उपनिषद् कहता है..
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।

💐💐🌻🌻🌺🌺🙏🙏


8

मैं समुन्दर हूँ। 
मैं खारा जरूर हूँ पर जगत के कल्याण और जीवन के लिये मीठे पानी के बादल भेजता हूँ। मेरी सतह पर शोर है पर मुझ जैसी नीरवता कहीं नहीं। तुम मेरे किनारे आओ मैं तुम्हारे पद प्रक्षालन करूँगा। तुम थोड़ा सा आगे बढ़े और तैरना नहीं जानते हो तो तुम्हें वापस किनारे पर फेंक दूँगा। जो नदियाँ मुझे अपना जल देती है, मैं वापस बादल भेज कर जो लिया उससे भी अधिक हर बरस लौटा देता हूँ। मैं बेरंग हूँ पर तुम्हें अच्छा लगूँ इसलिये नीला दिखाई देता हूँ। मैं जीवों और वनस्पतियों से बहुत प्यार करता हूँ इसलिये उन्हें अपने घर में रखता हूँ। तुम भले ही उसे ज्वार भाटा कहो पर वह मेरा चाँद के लिये उमड़ता हुआ प्यार है। मैं बस देता ही देता हूँ। मुझे मथ कर देखो मुझ में रत्न भरे पड़े हैं। मेरा स्वभाव अभेद है याने सब के लिये एक जैसा। मुझे बंधन की जरूरत नहीं इसलिये अपने खुद के बनाए तटबन्धों में स्वानुशासित रहता हूँ। केमिस्ट्री की भाषा में मेरी देह दो गैसों से मिल कर बना एक रसायन है। हाइड्रोजन जो सारणी का प्रथम तत्व और ऑक्सीन जो तुम्हें जीवित रखने वाला तत्व है।
"हो सके तो सागर बनो!
मुझ से अध्यात्म जानो! मैं सागर हूँ पर झूम इन करके देखो अन्तिम रूप से मैं एक बूँद हूँ। मेरी इस बूँद का विस्तार ही समुन्दर रूप में दिखाई देता है। इस बूँद की शक्ल में मैं हर जीव, जड़ और वनस्पतियों में और हे मानव तुम में भी मौजूद हूँ। मैं यहाँ भी हूँ और वहाँ भी हूँ। "महसूस करो, तुम्हारे भीतर भी हूँ और बाहर भी हूँ।" मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ।

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9

तान दो मस्तूल

सूरज ने जुगनुओं को कभी चमकते हुए नहीं देखा। उस ने कभी घोर अन्धकार भी नहीं देखा। वहीं जुगनू ने अँधेरा देखा भी है और उसमें वह रहा भी है। जुगनू उसकी अपनी दुनिया का शहंशाह है क्योंकि अपनी राह ढूँढने के लिये उसने सूरज के उजाले का इन्तजार कभी नहीं किया और न तारों के टिम टिम करते प्रकाश के भरोसे रहा। प्रकृति ने उसके साहस को देखते हुए उदात्त हो कर उसे बिना ईंधन का लालटेन दे दिया है। उसे सुलगाने की चिंगारी भी नहीं चाहिये। प्रकृति ने एक और वरदान उसे दिया है कि वह बिना ताप बढ़े उजाला कर सके। ऐसा लगता है कि प्रकृति उसे यह कह रही है कि तुम मेरी तरफ दो कदम साहस के चलो तो देखो मैं तुम्हारी तरफ चार कदम चल कर आई हूँ।
एक नन्हा दीपक भी इसी श्रेणी का योद्धा है। वह साहस से भरा हुआ, निर्भय हो कर समर्पण के लिये तैयार है। वह कहता है ''भले ही मैं अपने तले का अन्धकार दूर न कर पाऊँ, मैं अपने चारों ओर उजाला करने के लिये तैयार हूँ।

नचिकेता कठोपनिषद् का महानायक है जो मत्यु के देवता के सामने सहज भाव से अदम्य साहस ले कर खड़ा हो जाता है। उसका यह साहस यमराज को कोई चुनौती नहीं है पर उसे वहाँ भी भय कदापि नहीं है। फिर जो घटित हुआ वह अद्भुत था। नदी किनारे के बड़े मजबूत विशाल वृक्ष बाढ़ में बह जाते हैं पर बेंत का नन्हा सा साहसी पौधा साबुत खड़ा रह जाता है। एक साहस और उत्साह भरा नाविक अरब सागर पार करने के लिये मस्तूल बाँध कर निकल पड़ता है। फिर तो हवाएँ भी यही कहती हैं कि हम तुम्हारी नाव को हमारी शक्ति से चलावेंगी। 

"साहस शक्ति का आमन्त्रण और कर्म का आधान और सफलता का प्रथम सोपान है।"


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लहर लहर  10

'वर्तमान चल रहा है'

कब से ढूँढ रहे हो रत्न? उम्र के कई पड़ाव देखे, कई अवसर मिले पर तुम और बेहतर संभावनाओं के द्वार खोजने में लगे रहे। खोजते खोजते तुम रत्नों की खदान के अन्तिम छोर तक निकल आए हो। तुम्हें कई रत्न मिले भी पर तुम उन्हें बस परखने में लगे रहे, निरस्त करते रहे पर और अधिक बेहतर की खोज में उन्हें रास्ते में ही छोड़ते चले गये। इसलिये कहता हूँ कि अभी भी वक्त है कि जो मिल रहा है उसे अपनी गिरह में रख लो। 
जिन्दगी जुआँ नहीं है कि हारते जाओन तो भी बेहतर जीत के चक्कर में खेलते ही रहो। देखो! जितने जुआरी हैं वे कब धनपति हुए हैं? जो क्षण आया है वह अवसर है चूक गये तो समझो तुम चुक गये, जो बीत गया है वह इतिहास है इसे बदलने का सामर्थ्य स्वयं ब्रह्मा में भी नहीं है, जो आनेवाला है वह अन्धे की रेवड़ी है तुम्हारे हाथ लगे न लगे। 
हर पल कुछ न कुछ सौगात ले कर आता है और वह तुम्हारे पुरुषार्थ, पराक्रम, समझ और क्रियात्मकता को चुनौती देता है। ये चुनौतियाँ अपने गर्भ में तरह तरह की संभावनाऍं और उपलब्धियाँ भर कर लाई हैं यदि इन चुनौतियों को आफत समझ लिया तो बैठे रह जाओगे। पहली बरसात हुई, अगर किसान बीज लिये खेतों के किनारे बैठा रहा और फिर बीज बोने का वक्त आया वह आसमान तकता रहा तो उसके लिये अवसर लौट कर नहीं आता है। एक बात और है यदि वह फसल बोने से चूक गया तो खरपतवारों को उगने को मौका मिल जावेगा। फसल गई सो गई खेत की सफाई अलग माथे पड़ गई।
"इस उपयोगी वर्तमान को कोरे अतीत के अन्धे गर्त में मत फेंको।"


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11

खुद के संग जरूर रहना

संसार गतिमान है। कोई आ रहा है कोई जा रहा है। कोई ला रहा है, कोई छोड़ रहा है। कोई कुछ कदम साथ चला फिर कहीं छूट गया। लोग मिलते गये, रिश्ते बनते गये। इस आपाधापी में सदैव जो संग रहा वह तुम स्वयं थे परन्तु कई बार तुम्हें लगा होगा कि तुम्हारे साथ कोई भी नहीं है तुम शून्य में हो। पर निश्चित रूप से जब जब भी ऐसा हुआ होगा वह तुम्हारी आत्मविस्मृति थी। एक और सच महसूस हुआ होगा कि जैसे ही कोई विपत्ति आयी तो कुछेक को छोड़ कर बाकी सब अगली बगली झाँकते नजर आयेंगे। 
आत्मविस्मृति की यह भूल अर्जुन को भी हुई थी। महाभारत के समरांगण में उसके सामने लोग खड़े थे, रिश्ते खड़े थे, दुविधाएँ खड़ी थी, और एक संशय खड़ा था। इन सब का जो सम्मिलित मध्यम प्रभाव था वह 'विषाद' था। ऐसा तो सारा निर्मित परिदृश्य था पर इन सब के बावजूद सबसे विचित्र तो यह था कि विषाद का अन्तिम प्रभाव अर्जुन की "आत्मविस्मृति" होना था। 
उसे पता ही नहीं रहा कि वह कौन है? क्यों समर में आया है? उसका कर्म-अकर्म क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर उसे खोजना नहीं था अपितु उसे इनका स्वयं बोध होना चाहिये था। यह तो स्पष्ट था कि अर्जुन उस प्रांगण में "वह सबके साथ खड़ा था पर खुद अपने ही साथ नहीं खड़ा था।" कर्म का सबसे बड़ा साधन तो पुरुषार्थ है और आत्मबोध के बगैर न धर्म होगा, न अर्थ मिलेगा, न कामना की आपूर्ति होगी, फिर मोक्ष की बात तो बड़ी दूर की है। न मार्ग का पता होगा न मंजिल का। 
यह जरूरी नहीं कि जैसे हनुमान जी को जामवन्त मिले तुम्हारे जीवन में कोई मिल ही जावेगा, हर ग्वाले को चाणक्य मिल ही जावेगा।
श्रीमद्भगवद्गीता अर्जुन के विमोहन और आत्मविस्मृति के निक्षेप से शुरू होती है और "स्मृतिर्लब्ध्वा" अर्थात् आत्मबोध पर जा कर पूर्ण होती है। वह कह उठता है "यथेच्छसि तथा कुरू" अब आप जैसा चाहेंगे वैसा करूँगा।
तुम खुद को भूले  तो तुम्हारे अन्तःकरण के सब द्वार बन्द हो जावेंगे। 
सब से बड़ा सच तो यह है कि "तुम से अधिक तुम्हें कोई और नहीं जानता।"  


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12

अन्तःकरण से जुड़े लोग।

"भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा"। अपनी आँखों से अच्छा देखो।
आँखों की पुतलियाँ एक गेट वे है जरूर पर हर किसी को दिल तक जाने नहीं देती। इस एक बारीक से छेद में पूरी दुनियाँ समा लेती है। तुमने कभी ध्यान नहीं दिया इस फर्स्ट गेट के आगे कॉमन हाल है जहाँ तक वे लोग पहुँचते हैं जो तुम्हारे साथ कोई न कोई रिश्ता रखते हैं या वहाँ पर ठहरने के लिये अपना स्थान बना लेता है। यह बहुत बड़ी जगह है जहाँ बहुत सारे लोग समा सकते हैं, रुक सकते हैं, बाहर भी निकल सकते हैं। इस कामन हॉल में कभी कभी बहुरूपिये, मुखौटेबाज, छलिया, और शरारती लोग भी पहुँच जाते हैं और विप्लव मचाते रहते हैं। इन्हें बेदखल करना बहुत मुश्किल होता है। उन्हें सम्हालने में बहुत सारी ऊर्जा खर्च हो जाती है। ये वायरस की तरह हमारे इम्यून सिस्टम पर ही अटेक कर देते हैं। ये बहुत बलशाली हैं और किसी भी एन्टीवायरस से भी मरते नहीं है पर इनके लिये क्वारन्टीन करने की जगह इसी हाल में रखना पड़ती है। यह हॉल भरता और खाली होता रहता है। फिर इसके आगे एक सिट आउट है यहाँ तक वे लोग आते हैं जो तुम्हारी इजाजत के इन्तेजार में रहते हैं। ये वे लोग है जो तुम्हारी मनोवृत्ति, रुचि अथवा पसन्द की कसौटी पर खरे उतरते हैं। यह सिट आउट इसलिये भी जरूरी है कि यहाँ फिर एक छ्ननी लगानी है। यहाँ से आगे का मार्ग बहुत महत्वपूर्ण है अन्यथा डेमेजकन्ट्रोल सम्भव नहीं होता है। ये वे लोग हैं जो तुम्हारे जीवन को, विकास को, गिरावट को, मन मस्तिष्क को पूरी तरह प्रभावित करते हैं। इस सिटआउट के के बाद एक लिविंग रूम हैं जहाँ तुम इन चहेते लोगों के साथ रह सकते हो, व्यवहार कर सकते हो, आदान प्रदान कर सकते हो। इनके साथ पूरा जीवन साझा करते हो।
सिटआउट से सँटा हुआ सबसे अलग थलग एक गलियारा है जो सीधे तुम्हारे अन्तःपुर में पहुँचता है। अन्तःपुर तुम्हारा अपना अन्तःकरण ही है इसमें जो लोग पहुँच गये उन्हें तुम जन्म जन्मान्तरों का भूल नहीं सकते। ये वे लोग हैं जो तुम्हें और तुम इन्हें अच्छे लगते हो। जरूरी नहीं कि दुनियाँ जान सके कि ये कौन कौन लोग हैं। कभी कभी इसमें रहने वाले सक्ष भी नहीं जानते कि तुम उन्हें एक तरफा पसन्द करते हो। यहाँ देवत्व उतर आवे तो तुम भक्त बन जाते हो, दानव उतर आवे तो विध्वंसकारी हो सकते हो और यहीं अनन्त संभावनाएँ निर्मित होती हैं जो तुम्हारे भीतर बाहर की तमाम गतिविधियों और सम्पूर्ण जीवन को नियन्त्रित करती हैं। यह गलियारा तुम्हारे अपने नियन्त्रण में है। यहाँ पहुँचने और रहने वाले लोग सब रिश्तों को लाँघ कर आते हैं और किसी भी प्रकार के बन्धनों-अनुबन्धों से मुक्त रहते हैं। ये इस तरह साथ रहते हैं जैसे आँखों से कान और मुँह सिले हुए हों। ये अगर बाहर निकल भी जावें तो इनकी अमिट स्मृतियाँ वहीं परमानेन्ट बनी रह जाती हैं और तुम इनके वर्चुअल इफेक्ट में रहते हो चाहे वह तुम्हारा गुरू हो, प्रेमी हो अथवा आदर्श हो। इनमें से भी कोई एकाध तुम्हारे संग दूध में घुली मिसरी की तरह रहता है। जिसे वह भी जानता है और तुम भी। वह अलेप है, लोभ आदि सभी विकारों से रहित है। चाहे वह पुरुष हो, प्रकृति हो या परमात्मा हो। इसे तुम से जुदा कोई नहीं कर सकता। 
" तुम्हारा अपना अन्तःपुर सिर्फ तुम्हारा है इसे तुम ही अच्छी तरह सम्हालो"।

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लहर लहर 13

मन का बोझ

मन अमूर्त है, अभौतिक है, अदृश्य है, अश्पृश्य है लेकिन इन्द्रियों का सुरवाइजर, सुपरकन्ट्रोलर है और सुपरसोनिक स्पीड से भी तेज चलता है। करता कुछ नहीं पर करवाता सब है। जलेबी का स्वाद इसे चाहिये तो हाथ, दाँत और जबान को काम में लगा देता है। बेचारी इन्द्रियाँ नाचती है इसके इशारे पर। "नाच नटी इव सहित समाजा।" शरीर का सबसे जिद्दी, सबसे बलवान, सब से कमजोर प्रत्यंग भी यही है, नियन्ता भी यही है। कभी कभी यह बुद्धि को भी परास्त कर देता है, विवेक की भी नहीं सुनता है। कभी एवरेस्ट पर चढ़ा देता है, कभी रस्सी से पंखे पर लटकवा देता है, कभी आँख वाले को अन्धा बना देता है तो कभी आनन्द विभोर कर देता। लेकिन कुछ विशेष गुणों के चलते इसकी चार बड़ी विशेषताएँ ये हैं - वेग, आवेश, आवेग और संवेग। 
जरा इन्हें विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में देखें -
वेग- इसे आप गति कह सकते हैं। समय के सापेक्ष्य में किसी की स्थिती के परिवर्तन को 'वेग' कहते हैं। साधारण बोल चाल की भाषा में कहें तो अभी यहाँ तथा कुछ पलों बाद कहीं और। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की गति ही वेग है इसी गुण के कारण इसे वेगवान कहते हैं।
आवेश- इलेक्ट्रीफाइड अर्थात् अपनी न्यट्रल पोजिशन से शिफ्ट हो जाना। जब इसमें कोई नया विचार तेजी से प्रवेश करता है तो इसमें उस विचार के अनुसार प्रबल ऊर्जा संचरित हो जाती है और यह उन्मत्त हाथी की तरह व्यवहार करने लगता है।
आवेग- बाढ़ की तरह बहना। आवेशित हो कर किसी भी दिशा में बेतहाशा दौड़ लगाना आवेग है।
संवेग- इसे मोमेन्टम कहते है। इस स्थिति में मात्रा और गति दोनो एक साथ काम करते हैं। 
वेग, आवेश और आवेग को आसानी से समझा जा सकता है लेकिन संवेग इनका समन्वित फल है। एक बार गति पकड़ने के बाद नहीं रुक पाना संवेग है जैसे मोटर सायकल में एक्सीलेटर छोड़ देने पर भी गाड़ी चलती रहती है। और गतिशून्य हा कर न चल पाना भी संवेग है जिसे मोमेन्ट ऑफ इनर्शिया कहते हैं जैसे पार्किन्सन में होता है।

रामनारायण सोनी
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कोई आ जाता है कहीं से

जीवन को उत्सव रूप में परिवर्तित करने के लिये कुछ लोग कहीं से आ जाते हैं। जैसे दीपावली में दीपक, रंग और पटाखे आते हैं।
दीपावली उत्साह ले कर आती है। रांगोलियाँ सजती हैं, दीप जलते हैं, पटाखे चलते हैं।  इनके बगैर दीपावली एक संवत्सर की तिथि तो है पर उसे उत्सव बनाने वाले ये दीप, रंग और पटाखे अपना सर्वस्व लगाने को तत्पर है। दीप अपना तैल और बाती समर्पित करता है, रंग मनोरमता परोस जाते हैं और पटाखे फूट जाते हैं और दीपावली को एक उत्सव में परिवर्तित कर देते हैं। 
इनके बगैर दीपावली एक पर्व तो है पर "उत्सव" नहीं हो सकता। इन्होन हमें उत्सव के द्वार पर ला कर खड़ा कर दिया है। पटाखे फूट गए , रंग बिखर गया और दीपक तेल खत्म होते ही बुझ गया। उनकी अपनी कर्म रेखाएँ तो बची रहती हैं, इनसे हमारे संबंध भी टूटते नहीं हैं। एक सुखद संदेश यह है कि वे उनके अपने अपने निहित दायित्वों का इमानदारी से निर्वहन करते रहे। 
इनके पावन उत्सर्ग में उल्लास के दर्शन होने चाहिये न कि किसी हताशा के। यहाँ उनकी समस्त ऊर्जा का रूपान्तरण है। वस्तुतः हमें पटाखों, रगों और दीपों का कृतज्ञ होना चाहिये। 
"जो अपना कुछ खो कर भी हमें खुशी देते है हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिये।"


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बहारें फिर भी आएँगी

सूरज चुपचाप आता है जीवन देकर शाम को चला जाता है। चाँद आता है शीतल चाँदनी में नहला कर चला जाता है। ऋतुएँ दबे पाँव आती है अपना दायित्व पूरा कर चली जाती है। परन्तु यह सब क्यों होता है?
एक ऋतु इसलिये जाती है कि दूसरी को आना है। नदी, तालाब, झरने, पेड़ पौधे, वनस्पतियाँ सब चुपचाप हैं सब अपनी अपनी लय में हैं, सिर्फ सेवा में लगी है। ये सब समय के साथ बदलते रहते हैं। युवराज इसलिये नियुक्त होना है कि राजा के जाते ही उसे राजा बनना हैं। नदी अपनी धारा लिये बहती है ताकि ऊपर से आने वाले पानी को आने का मार्ग देना है। सूखे पत्तों को शाखा रिक्त करनी है ताकि वहाँ पत्तों की अगली पीढ़ी जन्म ले सके। बीज अंकुरित हो जाने के पश्चात अपना उत्सर्ग करता है ताकि अपने वंश की वृद्धि कर सके, उनकी जगह अगले बीज आ सकें।। ध्वंस, ह्रास, विनाश, क्षरण, परिवर्तन आदि इसलिये भी आवश्यक हो जाता है कि वहाँ अगला सृजन आने वाला है। मिट्टी को इसलिये जलना है कि उसे ईंट हो कर अगला भवन निर्माण करना है। यह विकास क्रम और प्रक्रिया अनन्त काल से अनवरत चल रही है। पशु पक्षी जीव जन्तु सब अपनी अपनी जद में हैं। 
इनके परिक्रमण को देख कर निश्चित लगता है कि बहार के बाद भले ही पतझड़ आता हो "बहारें फिर भी आएँगी।"

रामनारायण सोनी 
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अनुमान, अनुभव और संभावनाएँ

बड़े आश्चर्य की बात है कि पतंजलि योगसूत्र में अनुमान को प्रमाण माना गया है। 
अनुमान का सामान्य अर्थ है अन्दाजा लगाना। यह अन्दाजा अतीत अथवा भविष्य के किसी आयाम से उठा कर लाया गया संभावित उत्तर है। यह उत्तर अनुभव की आधारशिला पर खड़ा होता है। अनुमान भूतकाल की किसी वास्तविक घटना के समानान्तर रख कर आकलन करता है जैसे नदी में आयी बाढ़ यह बताती है कि नदी की उद्गम दिशा में कहीं तेज बरसात हुई है। वहीं वर्तमान में चल रहे परिदृश्य को देख कर काल्पनिक अथवा वास्तविक अनुभवों के आधार पर की गई गणना भविष्य की किसी संभावित घटना का पूर्वाभास है जैसे कि जिस डाल पर खड़े हो कर उसी डाल को तने की तरफ से काटने पर स्वयं गिर जाना तय है। परन्तु जो घोषणा की गई है वे अपने समग्र अनुभवों का परम्यूटेशन कॉम्बीनेशन ही है। जितने अनुभव परिपक्व होते है घोषणाएँ उतनी ही सच्चाई के निकट होंगी।
अनुभव तुम्हारी चेतना में परिरक्षित और संचित कोष है। हम तुम और सभी लोग प्रत्येक क्षण किसी न किसी घटना के साक्षी होते हैं। कुछ घटनाएँ हमें प्रभावित करती हैं, कुछ हम इग्नोर करते हैं लेकिन कुछ घटनाएँ हमारे अन्तस में जाकर बैठ जाती है जिन्हें हम चाह कर भी भूल नहीं सकते। अनुभव इन्हीं घटनाओं और उनसे जन्य परिणामों का कोष है। पूर्वानुमान इस अनुभव से पकाई गई खिचड़ी है जो पक्वान्न है। वह पक्वान्न जो दाल, चावल, नमक, सब्जियों आदि कई इनग्रेडियेन्ट का समुचित अनुपात में मिलाया गया भेल है। इसे रुचि अनुसार चटखारों से भी तैयार किया जा सकता है। गलत अनुपात अथवा अपरिपक्वता इसे खराब भी बना सकते हैं। खैर जो भी हो हम अपने दैनिक जीवन में यह खिचड़ी रोज बनाते हैं जो हमारे जीवन को, जीवन शैली को और परिणाम को प्रभावित करती है।
"अपने अनुभव और अनुमान से अच्छी संभावनाएँ तलाशें"

रामनारायण सोनी
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बड़े अजीब थे ये लोग। इन्हे मैं जिद्दी नहीं धुनी कहता हूँ। ये वे लोग थे जो थार के मरुस्थल की ओर चल पड़े गन्ने की फसल उगाने, शैल शिखर को उँगली पर उठाने, तिल को ताड़ बनाने।
तुलसी जो रागी से वीतरागी हो गया। आततायी मुगलों की छाती पर रामचरितमानस लिखने का अद्भुत कार्य किया है जिसने। जैसे मन्दिर में पूजा ओर पुजापा रखा होता है वैसे हमारे घरों में यह पावन, अमर ग्रन्थ रख गया। जैसे वनाञ्चलों में ऋषियों ने ऋचायें गाई वैसी भक्ति की, ज्ञान की, वैराग्य की त्रिवेणी जन जन के हृदय में उतार गया। उपकृत हैं हम सब।
मन्दिरों में भजन सबने सुने होंगे। राजमहल और रंगमहल के भोग विलास में डूबे वातावरण में भी गोपाल के अनन्य प्रेम में पगी वह विरहिणी मीरा करताल ले कर गाने लगी "मैं तो साँवरे के रंग राची।" जिसकी श्रद्धा और भक्ति के प्रताप से विष भी प्रिय का प्रसाद बना होगा। उसकी गिरधर के विरह में की गई पुकार जन जन की अभ्यर्थना और अर्चना का मन्त्र बन गई। वह तरी और कईयों को तार गयी।
वह रैदास मरी खाल को सीते सीते कह गया कि हे परमेश्वर "तुम चंदन हम पानी" और घुल कर अपनी वह खुद ही घुल कर सुवास जन जन में छोड़ गया।
उस कबीर ने तो हद ही कर दी। उपनिषदों में वर्णित तुरीय को अपने करघे में लगे तानों बानों में बुन गया। ऐसी चादर बुनी कि बेदाग-बिंदास जैसी की तैसी धर गया। सत्य का निर्भीक पुजारी था वह। 
और वह सूर बिन आँखों के ही विराट का दर्शन करते करते भक्ताकाश का सूरज बन कर चमक गया। उसकी प्रज्ञा तो चर्म चक्षुओं से परे मनश्चक्षुओं से ऐसा देखती थी कि कोई क्या देखेगा। उस धुनी ने असंख्य पद ऐसे गाये कि उसके 'सूरसागर' के सुरसागर में डूबने को मन करता है।
ये वे लोग थे जो पानी की उल्टी धार में टूना मछली की तरह तैरे और मिसाल छोड़ गये। उन्हें पता ही नहीं होगा कि जिन पगडण्डियों पर से गुजरे वे इस संसार के जन जन के लिये पुण्यशील राजपथ हो गये हैं।
"हो सके तो तुम भी ऐसी एक नन्ही सी पगडण्डी ढूँढ लो!"

रामनारायण सोनी


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