Friday, 20 January 2023

११ खुद के संग जरूर रहना

11

खुद के संग जरूर रहना

संसार गतिमान है। कोई आ रहा है कोई जा रहा है। कोई ला रहा है, कोई छोड़ रहा है। कोई कुछ कदम साथ चला फिर कहीं छूट गया। लोग मिलते गये, रिश्ते बनते गये। इस आपाधापी में सदैव जो संग रहा वह तुम स्वयं थे परन्तु कई बार तुम्हें लगा होगा कि तुम्हारे साथ कोई भी नहीं है तुम शून्य में हो। पर निश्चित रूप से जब जब भी ऐसा हुआ होगा वह तुम्हारी आत्मविस्मृति थी। एक और सच महसूस हुआ होगा कि जैसे ही कोई विपत्ति आयी तो कुछेक को छोड़ कर बाकी सब अगली बगली झाँकते नजर आयेंगे। 
आत्मविस्मृति की यह भूल अर्जुन को भी हुई थी। महाभारत के समरांगण में उसके सामने लोग खड़े थे, रिश्ते खड़े थे, दुविधाएँ खड़ी थी, और एक संशय खड़ा था। इन सब का जो सम्मिलित मध्यम प्रभाव था वह 'विषाद' था। ऐसा तो सारा निर्मित परिदृश्य था पर इन सब के बावजूद सबसे विचित्र तो यह था कि विषाद का अन्तिम प्रभाव अर्जुन की "आत्मविस्मृति" होना था। 
उसे पता ही नहीं रहा कि वह कौन है? क्यों समर में आया है? उसका कर्म-अकर्म क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर उसे खोजना नहीं था अपितु उसे इनका स्वयं बोध होना चाहिये था। यह तो स्पष्ट था कि अर्जुन उस प्रांगण में "वह सबके साथ खड़ा था पर खुद अपने ही साथ नहीं खड़ा था।" कर्म का सबसे बड़ा साधन तो पुरुषार्थ है और आत्मबोध के बगैर न धर्म होगा, न अर्थ मिलेगा, न कामना की आपूर्ति होगी, फिर मोक्ष की बात तो बड़ी दूर की है। न मार्ग का पता होगा न मंजिल का। 
यह जरूरी नहीं कि जैसे हनुमान जी को जामवन्त मिले तुम्हारे जीवन में कोई मिल ही जावेगा, हर ग्वाले को चाणक्य मिल ही जावेगा।
श्रीमद्भगवद्गीता अर्जुन के विमोहन और आत्मविस्मृति के निक्षेप से शुरू होती है और "स्मृतिर्लब्ध्वा" अर्थात् आत्मबोध पर जा कर पूर्ण होती है। वह कह उठता है "यथेच्छसि तथा कुरू" अब आप जैसा चाहेंगे वैसा करूँगा।
तुम खुद को भूले  तो तुम्हारे अन्तःकरण के सब द्वार बन्द हो जावेंगे। 
सब से बड़ा सच तो यह है कि "तुम से अधिक तुम्हें कोई और नहीं जानता।"

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